देसी गायों के डीएनए में छिपा है लंपी वायरस से सुरक्षा का राज
देश के पशुधन को गंभीर संक्रामक बीमारियों से बचाने की दिशा में वैज्ञानिकों ने एक बहुत बड़ी सफलता हासिल की है। राष्ट्रीय पशु आनुवांशिक संसाधन ब्यूरो (NBAGR) के वैज्ञानिकों ने स्वदेशी गायों में लंपी रोग के प्रति प्राकृतिक प्रतिरोधक क्षमता से जुड़े विशेष आनुवंशिक संकेतों (जेनेटिक सिग्नेचर) की पहचान कर ली है। यह खोज भविष्य में गोवंश को बचाने और पशुपालकों के आर्थिक नुकसान को रोकने के लिए एक बड़ा वरदान साबित हो सकती है।
लंपी स्किन डिजीज ने पिछले कुछ वर्षों में देश के कई राज्यों में पशुपालकों की रातों की नींद उड़ा दी थी। इस खतरनाक बीमारी से हजारों मवेशियों की जान चली गई थी और दूध उत्पादन में भी भारी गिरावट दर्ज की गई थी। ऐसे में वैज्ञानिकों द्वारा डीएनए स्तर पर इस बीमारी से लड़ने की क्षमता तलाश लिया जाना एक ऐतिहासिक उपलब्धि है।
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साल 2022 से 2024 तक चला विशेष शोध अभियान
हरियाणा के करनाल स्थित राष्ट्रीय पशु आनुवांशिक संसाधन ब्यूरो के पशु जैव प्रौद्योगिकी प्रभाग के वैज्ञानिकों ने इस दिशा में एक विशेष परियोजना पर काम किया। यह अध्ययन वर्ष 2022 से 2024 के बीच चलाया गया। इस शोध के दौरान परियोजना प्रमुख एवं प्रधान विज्ञानी डॉ. रवि कुमार गंधम के नेतृत्व में वैज्ञानिकों की टीम ने स्वदेशी और विदेशी नस्लों के आनुवंशिक गुणों का बारीकी से विश्लेषण किया।
शोध का मुख्य उद्देश्य यह समझना था कि जब लंपी वायरस किसी पशु के शरीर पर हमला करता है, तो अलग-अलग नस्लों के मवेशियों की प्रतिरोधक क्षमता किस तरह से प्रतिक्रिया देती है। वैज्ञानिकों ने पाया कि देसी नस्लों और विदेशी नस्लों की रोग से लड़ने की क्षमता में जमीन-आसमान का फर्क होता है, और यहीं से इस पूरी खोज की शुरुआत हुई।
क्यों खतरनाक साबित होता है लंपी वायरस और कैसे करता है हमला?
लंपी स्किन डिजीज एक खतरनाक वायरल संक्रमण है जो मुख्य रूप से गोवंशियों को अपना शिकार बनाता है। यह बीमारी मच्छर, मक्खी और अन्य खून चूसने वाले कीटों के जरिए एक संक्रमित पशु से स्वस्थ पशु तक पहुंचती है। संक्रमण की चपेट में आते ही पशु को तेज बुखार आ जाता है और उसकी पूरी त्वचा पर कठोर गांठें उभरने लगती हैं।
गंभीर मामलों में ये गांठें बड़े और दर्दनाक जख्मों में बदल जाती हैं। इसके अलावा पशुओं के शरीर में सूजन, अत्यधिक कमजोरी और दूध उत्पादन में भारी गिरावट जैसी समस्याएं पैदा हो जाती हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि किसी भी वायरस से लड़ने की क्षमता केवल बाहरी खान-पान या मौसम पर निर्भर नहीं करती, बल्कि पशु के डीएनए में मौजूद आंतरिक बदलाव भी यह तय करते हैं कि उसका शरीर बीमारी के खिलाफ कैसी प्रतिक्रिया देगा।
स्वदेशी नस्लों में दिखे बीमारी से लड़ने के अनूठे लक्षण
लंपी रोग के प्रकोप के दौरान वैज्ञानिकों ने जमीनी स्तर पर यह गौर किया कि विभिन्न नस्लों की गायों पर इस संक्रमण का प्रभाव एक जैसा नहीं था। कुछ स्वदेशी नस्लों की गायों में बीमारी के लक्षण या तो बहुत हल्के थे या फिर वे अन्य पशुओं की तुलना में बहुत तेजी से इस संक्रमण से उबरकर स्वस्थ हो गए थे।
इसी अंतर ने वैज्ञानिकों का ध्यान देसी गायों की आनुवंशिक संरचना की ओर खींचा। शोधकर्ताओं ने डीएनए के उन खास हिस्सों का अध्ययन किया, जिनका सीधा संबंध शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्यून सिस्टम) से होता है। इन खास संकेतों की पहचान होने से अब यह समझना बहुत आसान हो जाएगा कि अलग-अलग नस्लों के पशुओं में इस वायरस के प्रति संवेदनशीलता इतनी अलग क्यों होती है।
भविष्य के प्रजनन कार्यक्रमों और पशुधन सुरक्षा के लिए नई उम्मीद
इस महत्वपूर्ण शोध के निष्कर्षों का उपयोग आने वाले समय में आनुवंशिक चयन आधारित प्रजनन कार्यक्रमों में किया जा सकेगा। जिन पशुओं के डीएनए में लंपी रोग के खिलाफ बेहतर प्रतिरोधक क्षमता से जुड़े लक्षण पाए जाएंगे, उन्हें चुनकर अगली पीढ़ी के प्रजनन में इस्तेमाल किया जाएगा। इससे भविष्य में ऐसे गोवंश तैयार किए जा सकेंगे जो इस तरह की गंभीर बीमारियों से खुद मुकाबला करने में सक्षम होंगे।
"यह अध्ययन देश के पशुधन को भविष्य में संक्रामक रोगों से बचाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। हमने यह समझने का प्रयास किया है कि लंपी विषाणु के संक्रमण के दौरान स्वदेशी और विदेशी नस्लों के आनुवंशिक गुण किस प्रकार प्रतिक्रिया करते हैं। स्वदेशी नस्लों में मिले विशेष आनुवंशिक संकेतों की पहचान से भविष्य में रोग प्रतिरोधी पशुओं के चयन और प्रजनन कार्यक्रमों को वैज्ञानिक आधार मिल सकता है।" — डॉ. एनएन मोहन, निदेशक, एनबीएजीआर, करनाल
पशुपालकों के लिए आर्थिक संकट से राहत का बड़ा जरिया
वर्ष 2022 और 2023 के दौरान देश के कई राज्यों जैसे हरियाणा, पंजाब, राजस्थान और गुजरात में लंपी रोग ने विकराल रूप धारण कर लिया था। इस बीमारी की वजह से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भारी झटका लगा था क्योंकि किसानों की आजीविका का मुख्य साधन दूध उत्पादन बुरी तरह प्रभावित हुआ था। वैज्ञानिकों की यह नई खोज आने वाले दिनों में देश के डेयरी उद्योग और पशुपालकों के लिए एक बड़ा सुरक्षा कवच साबित हो सकती है। हालांकि, इन आनुवंशिक संकेतों के व्यापक इस्तेमाल और प्रमाण के लिए अभी बड़े पैमाने पर और परीक्षण किए जाने बाकी हैं।






