ब्रह्मांड की शुरुआत और एक ही बादल से दो अलग ग्रहों का जन्म
हमारे सौरमंडल के दो अहम सदस्य यानी पृथ्वी और मंगल ग्रह भले ही आज एक-दूसरे से काफी अलग दिखते हों, लेकिन इनका शुरुआती इतिहास एक ही जगह से जुड़ा हुआ है। अंतरिक्ष विज्ञान से जुड़े जानकारों और खगोलविदों के अनुसार, आज से लगभग साढ़े चार अरब साल पहले ब्रह्मांड में धूल और गैस का एक बहुत बड़ा बादल घूम रहा था। इसी घूमते हुए विशाल बादल से हमारे सौरमंडल के कई ग्रहों ने आकार लिया। हैरानी की बात यह है कि एक ही स्रोत और एक ही समय पर बने होने के बावजूद पृथ्वी और मंगल का विकास एक ही दिशा में आगे नहीं बढ़ा।
हाल ही में विज्ञान जगत की प्रतिष्ठित पत्रिका 'नेचर एस्ट्रोनामी' में एक ऐसा अध्ययन प्रकाशित हुआ है जिसने खगोल विज्ञान के कई पुराने समीकरणों को नए सिरे से सोचने पर मजबूर कर दिया है। इस ताज़ा रिसर्च से यह साफ पता चलता है कि जन्म के शुरुआती दौर में ही दोनों ग्रहों ने अलग-अलग तरह के पदार्थों को अपनी तरफ खींचना शुरू कर दिया था। यही वजह है कि आज दोनों ग्रहों की बनावट, उनका आकार और आंतरिक संरचना एक-दूसरे से काफी जुदा नजर आती है।
वैज्ञानिकों ने इन दोनों ग्रहों के इतिहास को खंगालने के लिए आधुनिक तकनीक और कंप्यूटर सिमुलेशन का सहारा लिया। अंतरिक्ष अनुसंधान में रुचि रखने वाले लोगों के लिए यह जानना बेहद दिलचस्प है कि जिन दो ग्रहों पर इंसानी भविष्य की उम्मीदें टिकी हैं, उनकी नींव रखने वाली प्रक्रियाएं शुरू से ही एक जैसी नहीं थीं।
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पेबल एक्रीशन और प्लैनेटेसिमल्स की अनोखी भूमिका
कोपेनहेगन विश्वविद्यालय के ग्लोब इंस्टीट्यूट के शोधकर्ताओं ने अपनी स्टडी में इस बात से पर्दा उठाया है कि ग्रहों के निर्माण के दौरान छोटे-छोटे कणों के जमा होने की प्रक्रिया बहुत मायने रखती है। रिसर्च के मुताबिक, हमारी पृथ्वी के कुल द्रव्यमान का कम से कम 75 प्रतिशत हिस्सा दो बड़े युवा ग्रहों या जिन्हें प्रोटोप्लैनेट कहा जाता है, उनके जरिए आए पदार्थों से मिलकर बना है। ये शुरुआती प्रोटोप्लैनेट अंतरिक्ष में तैर रहे छोटे ठोस कणों और कंकड़ जैसे पदार्थों को अपने गुरुत्वाकर्षण बल से खींचकर लगातार बड़े होते चले गए।
विज्ञान की भाषा में कणों के इस तरह आपस में जुड़ने और बड़े पिंड बनने की प्रक्रिया को ‘पेबल एक्रीशन’ का नाम दिया गया है। इसके उलट, अगर मंगल ग्रह की बात की जाए तो उसकी कहानी थोड़ी जुदा है। मंगल के कुल द्रव्यमान का करीब 75 प्रतिशत हिस्सा प्लैनेटेसिमल्स यानी बड़े उल्कापिंड नुमा टुकड़ों के मिलने से तैयार हुआ है। जबकि इसके निर्माण का केवल 25 प्रतिशत हिस्सा ही छोटे कणों के जमा होने से पूरा हुआ था।
यही बुनियादी अंतर दोनों ग्रहों के विकास में एक बहुत बड़ी दीवार साबित हुआ। एक तरफ जहां पृथ्वी को बनाने में छोटे-छोटे पत्थरों और कणों का बड़ा योगदान रहा, वहीं मंगल ग्रह का अधिकतर हिस्सा भारी और बड़े अंतरिक्षीय पिंडों के आपस में टकराने और जुड़ने से बना।
वाष्पशील तत्वों की मदद से खुले अंतरिक्ष के कई बड़े राज़
वैज्ञानिकों ने इस पूरी गुत्थी को सुलझाने के लिए केवल ग्रहों के बाहरी आकार को नहीं परखा, बल्कि उनके भीतर मौजूद रासायनिक घटकों की भी गहरी जांच की। शोधकर्ताओं ने पृथ्वी और मंगल दोनों की क्रस्ट और मेंटल यानी बाहरी व भीतरी सतह में मौजूद सोडियम, जिंक और पोटैशियम जैसे वाष्पशील तत्वों का बारीकी से अध्ययन किया। ये ऐसे तत्व होते हैं जो अंतरिक्ष की अत्यधिक गर्मी और उथल-पुथल के दौरान रासायनिक संकेतों को सुरक्षित रखने की क्षमता रखते हैं।
जब अंतरिक्ष वैज्ञानिकों ने इन तत्वों के रासायनिक इतिहास को डिकोड किया, तो उन्हें पता चला कि शुरुआती दौर में इन दोनों ग्रहों के पास मौजूद तापमान और सामग्री में कितना बड़ा फर्क था। इस विश्लेषण से यह समझने में आसानी हुई कि कैसे एक ही गैस के बादल से निकले दो भाई-बंद ग्रह आगे चलकर बिल्कुल अलग स्वभाव और बनावट वाले बन गए।
"पृथ्वी और मंगल का यह नया अध्ययन हमें यह सिखाता है कि अंतरिक्ष में एक ही सामग्री से शुरू होने वाली यात्राएं भी अपनी आंतरिक प्राथमिकताओं और बाहरी गुरुत्वाकर्षण के चलते बिल्कुल अलग मुकाम पर पहुंच सकती हैं।" — अंतरिक्ष अनुसंधान विशेषज्ञ, कोपेनहेगन विश्वविद्यालय
कंप्यूटर मॉडल और अंतरिक्ष अनुसंधान के आधुनिक रास्ते
इस आधुनिक रिसर्च को मुकाम तक पहुंचाने में कंप्यूटर मॉडल की भूमिका सबसे अहम रही। वैज्ञानिकों ने अंतरिक्ष के पुराने हालातों को रीक्रिएट करने के लिए शक्तिशाली कंप्यूटर प्रोग्राम्स का इस्तेमाल किया। इन मॉडल्स के जरिए अलग-अलग परिस्थितियों का परीक्षण किया गया ताकि यह जाना जा सके कि अगर गुरुत्वाकर्षण का दायरा थोड़ा भी बदलता, तो क्या ग्रहों का रूप कुछ और होता।
इन सिमुलेशन से यह बात पुख्ता हुई कि शुरुआती दौर में अंतरिक्षीय पदार्थों का वितरण हर जगह एक जैसा नहीं था। जैसे-जैसे बादल घूम रहे थे, वैसे-वैसे अलग-अलग हिस्सों में भारी और हल्के तत्व अलग हो रहे थे। यही वजह है कि पास-पास होने के बावजूद पृथ्वी और मंगल की रासायनिक कुंडली में जमीन-आसमान का फर्क आ गया।
निष्कर्ष: भविष्य की अंतरिक्ष उड़ानों के लिए क्यों जरूरी है यह ज्ञान
पृथ्वी और मंगल के निर्माण से जुड़े इन नए रहस्यों का सामने आना केवल खगोल शास्त्र के लिए ही नहीं, बल्कि भविष्य के अंतरिक्ष मिशनों के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण है। जब वैज्ञानिक यह समझ जाते हैं कि कोई ग्रह भीतर से कैसे बना है, तो वहां जीवन की संभावनाओं को तलाशना और भी आसान हो जाता है। मंगल ग्रह पर इंसानी बस्तियां बसाने की कोशिशों के बीच यह जानना जरूरी है कि वह हमारी धरती से किन मायनों में अलग है। आने वाले समय में अंतरिक्ष विज्ञान की ऐसी ही नई खोजें हमारे सामने ब्रह्मांड के कई और अनछुए पहलुओं को लाकर रख देंगी।








