नई दिल्ली से ग्राउंड रिपोर्ट — देश के मुख्य चुनाव आयोग के कामकाज और उसके फैसलों पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं। पिछले कुछ दिनों से मीडिया रिपोर्ट्स में यह बात सामने आई है कि आयोग के भीतर ही फैसलों को लेकर मतभेद उभर रहे हैं। अंग्रेजी अखबार 'द इंडियन एक्सप्रेस' की एक रिपोर्ट के अनुसार, आयोग के अंदर दो सदस्यों द्वारा उठाए गए गंभीर मुद्दों और आपत्तियों पर साफ जवाब देने के बजाय इसे सामान्य मतभेद बताकर टालने की कोशिश की गई है। इस स्थिति ने राजनीतिक गलियारों में खलबली मचा दी है और विपक्ष को सरकार तथा आयोग पर निशाना साधने का मौका मिल गया है।
दूसरी ओर, चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया है कि एसआईआर यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन का आदेश सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में सबकी सहमति से ही पास किया गया है। इसके तहत बूथ लेवल अफसरों यानी बीएलओ को निर्देश दिए गए हैं कि वे सीधे मतदाताओं के घर जाएं और जरूरी दस्तावेज एकत्र करें। आयोग का दावा है कि इस पूरी प्रक्रिया का मकसद मतदाता सूची को पूरी तरह साफ और दुरुस्त करना है ताकि चुनाव प्रक्रिया में किसी भी तरह की गड़बड़ी की कोई गुंजाइश न बचे। हालांकि, इस घर-घर जाकर दस्तावेज जुटाने वाली प्रक्रिया को लेकर जमीनी स्तर पर कुछ असमंजस की स्थिति भी देखने को मिल रही है।
आयोग के अंदरूनी मतभेद और फैसलों पर उठते सवाल
चुनाव आयोग जैसी स्वतंत्र और संवैधानिक संस्था के भीतर असहमति के स्वर बाहर आना लोकतंत्र के लिहाज से एक बड़ा घटनाक्रम माना जा रहा है। जानकारों का कहना है कि जब देश के सर्वोच्च चुनाव निकाय के भीतर ही फैसलों को लेकर दो राय बनने लगे, तो आम जनता के बीच संस्था की निष्पक्षता को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है। हाल ही में विपक्षी नेताओं ने भी इस मामले को जोर-शोर से उठाया है। पूर्व मंत्री रघुवीरा रेड्डी ने सार्वजनिक रूप से बयान दिया है कि चुनाव आयोग को अपनी कार्यप्रणाली में पारदर्शिता लानी चाहिए और यदि कहीं कोई गलती हुई है तो उसे स्वीकार करना चाहिए।
राजधानी दिल्ली समेत कई अन्य राज्यों में चुनाव आयोग के कुछ फैसलों और नीतियों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन भी देखने को मिले हैं। हाल ही में सीजेपी के बैनर तले हो रहे प्रदर्शनों के दौरान पुलिस द्वारा सख्ती बरते जाने और गिरफ्तारियां होने की खबरें भी सामने आई हैं। इन प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखना भी अब मुश्किल होता जा रहा है और चुनाव से जुड़े मामलों में आम नागरिकों की चिंताओं को नजरअंदाज किया जा रहा है। जमीनी स्तर पर कार्यकर्ता इन मुद्दों को लेकर लगातार धरने और प्रदर्शन की रणनीति बना रहे हैं ताकि प्रशासन पर दबाव बनाया जा सके।
आगामी विधानसभा चुनावों की सरगर्मी और प्रशासनिक तैयारियां
एक तरफ जहां आयोग के फैसलों पर राजनीतिक बहस छिड़ी है, वहीं दूसरी तरफ केरल, असम और पुडुचेरी में साल 2026 में होने वाले विधानसभा चुनावों की तैयारियां भी युद्ध स्तर पर शुरू हो चुकी हैं। इन राज्यों में चुनावी पारा अभी से चढ़ने लगा है और सभी राजनीतिक दल अपनी जमीन मजबूत करने में जुट गए हैं। चुनाव आयोग के अधिकारियों का कहना है कि समय रहते मतदाता सूचियों का शुद्धिकरण और सुरक्षा के कड़े इंतजाम करना उनकी पहली प्राथमिकता है ताकि चुनाव पूरी तरह निष्पक्ष और शांतिपूर्ण माहौल में संपन्न हो सकें।
लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि बीएलओ के जरिए घर-घर जाकर दस्तावेज इकट्ठा करने के इस नए आदेश के लागू होने से प्रशासनिक अमले पर भी काम का दबाव काफी बढ़ गया है। कई इलाकों से रिपोर्ट मिल रही है कि मतदाताओं के पास सही दस्तावेज न होने की वजह से बीएलओ को भी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। आम लोग इस बात को लेकर उलझन में हैं कि उन्हें अपने कौन से दस्तावेज दिखाने होंगे और प्रक्रिया में कितनी देर लगेगी। प्रशासन की यह कोशिश है कि चुनाव की तारीखों के ऐलान से पहले इन सभी व्यावहारिक परेशानियों को दूर कर लिया जाए।
निष्कर्ष और आगे की चुनौतियां
कुल मिलाकर, चुनाव आयोग इस समय एक साथ कई मोर्चों पर चुनौतियों का सामना कर रहा है। एक तरफ जहाँ उसे अपने आंतरिक मामलों में पारदर्शिता बनाकर रखनी है, वहीं दूसरी तरफ देश के विभिन्न राज्यों में होने वाले आगामी चुनावों को शांतिपूर्ण ढंग से कराना भी उसकी बड़ी जिम्मेदारी है। 'द फ्रीलान्स' की इस जमीनी पड़ताल से साफ है कि आने वाले दिनों में चुनाव सुधारों और आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर सियासत और तेज होने वाली है। जनता की नजरें अब इस बात पर टिकी हैं कि आयोग इन तमाम विवादों के बीच कितनी निष्पक्षता और मजबूती के साथ अपनी जिम्मेदारी निभा पाता है।












