मतदाता सूची से नाम कटने पर चुनाव आयोग का सख्त और बड़ा निर्देश
देशभर में मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण और स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी एसआईआर (SIR) की प्रक्रिया के दौरान बड़ी संख्या में नागरिकों के नाम हटाए जाने को लेकर लगातार सवाल खड़े हो रहे थे। इन तमाम आपत्तियों और चिंताओं के बीच भारतीय निर्वाचन आयोग ने एक बेहद महत्वपूर्ण और राहत भरा कदम उठाया है। आयोग ने देश के उन 20 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में विशेष अभियान यानी ‘स्पेशल ड्राइव’ चलाने का आधिकारिक निर्देश जारी किया है, जहां एसआईआर की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। इस पहल का मुख्य उद्देश्य उन सभी योग्य और पात्र मतदाताओं के नाम फिर से वोटर लिस्ट में शामिल करना है, जो किसी तकनीकी खामी, प्रशासनिक चूक या अन्य कारणों से इस प्रक्रिया के दौरान छूट गए थे। इसके अलावा, उन युवाओं को भी प्राथमिकता दी जा रही है जो हाल ही में मतदान करने की आयु सीमा पूरी कर चुके हैं।
निर्वाचन आयोग की ओर से यह निर्देश सभी राज्यों के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों को एक आधिकारिक पत्र के माध्यम से भेजा गया था। बाद में एक उच्च स्तरीय वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिए भी इस बात पर जोर दिया गया कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया में किसी भी योग्य नागरिक का मताधिकार सुरक्षित रहना चाहिए। आयोग ने स्पष्ट किया है कि स्थानीय जिला निर्वाचन अधिकारियों और बूथ लेवल अधिकारियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि कोई भी पात्र मतदाता बिना किसी वैध कारण के सूची से बाहर न रहे। चुनाव प्रक्रिया को पारदर्शी और सुगम बनाने के लिहाज से इसे एक बड़ा सुधारात्मक कदम माना जा रहा है, जिससे उन लाखों मतदाताओं को राहत मिलने की उम्मीद है जिनके नाम हालिया संशोधनों के दौरान सूची से गायब हो गए थे।
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अब सामान्य फॉर्म 6 के जरिए होगा आवेदन, अतिरिक्त घोषणा पत्र की अनिवार्यता खत्म
पूर्व में एसआईआर प्रक्रिया के दौरान मतदाताओं को कई तरह की जटिलताओं का सामना करना पड़ा था, जिनमें अतिरिक्त घोषणा पत्र भरने की शर्त भी शामिल थी। हालांकि, अब निर्वाचन आयोग ने स्थिति स्पष्ट करते हुए राहत का रास्ता साफ कर दिया है। जिन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन का काम पूरा हो चुका है, वहां मतदाता सूची में दोबारा नाम दर्ज कराने के लिए नागरिकों को केवल सामान्य ‘फॉर्म 6’ का उपयोग करना होगा। इसके लिए किसी भी अतिरिक्त और जटिल घोषणा पत्र की आवश्यकता नहीं होगी। आयोग के नए निर्देशों के मुताबिक, एसआईआर के दौरान लागू किए गए विशेष प्रावधान केवल उसी समयावधि तक सीमित थे और उस अवधि के समाप्त होने के बाद वोटर रजिस्ट्रेशन नियम, 1960 के तहत निर्धारित मानक प्रक्रिया ही लागू रहेगी।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ऑनलाइन फॉर्म 6 में पहले एक ऐसा सवाल शामिल किया गया था जिसमें यह पूछा जाता था कि क्या आवेदक या उसके माता-पिता पिछले एसआईआर के बाद मतदाता सूची में शामिल थे। इस विशेष बदलाव को लेकर चुनाव आयोग के भीतर भी अलग-अलग स्तर पर आपत्तियां दर्ज कराई गई थीं। चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों और जमीनी स्तर पर आ रही दिक्कतों को ध्यान में रखते हुए आयोग ने नियमों को सरल बना दिया है। अब सामान्य फॉर्म के जरिए आवेदन स्वीकार किए जाएंगे, जिससे प्रक्रिया काफी आसान हो गई है और आम नागरिकों को अनावश्यक कागजी कार्रवाई से मुक्ति मिल गई है।
बूथ लेवल अधिकारियों और राजनीतिक दलों की मदद से होगी छूटे हुए वोटर्स की पहचान
चुनावी तंत्र को और अधिक जवाबदेह बनाते हुए निर्वाचन आयोग ने राज्य के चुनाव अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि वे एसआईआर से पहले और बाद की मतदाता सूचियों का गहन मिलान करें। इस तुलनात्मक अध्ययन का मुख्य मकसद उन मतदाताओं की पहचान करना है जिनके नाम सूची से तो हटा दिए गए हैं, लेकिन उनके हटाए जाने के पीछे कोई भी ठोस या वैध कारण रिकॉर्ड में मौजूद नहीं है। अधिकारियों को खास तौर पर उन मामलों की गहन जांच करने को कहा गया है जहां मतदाता का नाम किसी अन्य क्षेत्र की सूची में भी स्थानांतरित नहीं हुआ है, जो डुप्लीकेट भी नहीं पाए गए हैं और जिनकी मृत्यु की कोई पुष्टि नहीं हुई है। ऐसे संदिग्ध और अस्पष्ट मामलों की पहचान कर बूथ लेवल अधिकारियों को सीधे मतदाताओं के घर भेजा जा रहा है।
"निर्वाचन आयोग ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि वोटर लिस्ट से छूटे योग्य नागरिकों की पहचान के कार्य में राजनीतिक दलों और उनके बूथ लेवल एजेंटों की भी सक्रिय सहभागिता सुनिश्चित की जाए, ताकि कोई भी पात्र मतदाता अपने मताधिकार से वंचित न रहे।" — निर्वाचन आयोग के निर्देश
इस पूरी प्रक्रिया में राजनीतिक दलों और उनके जमीनी कार्यकर्ताओं की मदद लेने से पारदर्शिता और बढ़ जाएगी। हाल ही में विभिन्न राज्यों से आई रिपोर्टों के मुताबिक ड्राफ्ट सूचियों से भारी संख्या में नाम हटाए जाने के बाद से विपक्षी दलों और सामाजिक संगठनों द्वारा सवाल उठाए जा रहे थे। ऐसे में आयोग का यह विशेष अभियान प्रशासनिक स्तर पर उन त्रुटियों को सुधारने का एक बड़ा प्रयास साबित हो सकता है। गोवा जैसे राज्यों का उदाहरण सामने है जहां जिला अधिकारियों द्वारा योग्य पाए जाने के बाद भी कई लोगों के नाम अंतिम सूची में नहीं आ सके थे, जिन्हें अब इस विशेष अभियान के जरिए ठीक किया जा रहा है।
गोवा का उदाहरण और जमीनी स्तर पर सुधार के प्रयास
इस विशेष अभियान की महत्ता को समझने के लिए गोवा का हालिया मामला एक बड़ा उदाहरण पेश करता है। वहां निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों द्वारा योग्य पाए जाने के बावजूद लगभग 97 लोगों के नाम अंतिम मतदाता सूची में शामिल नहीं हो पाए थे। इस त्रुटि का संज्ञान लेते हुए चुनाव आयोग ने बूथ लेवल अधिकारियों को सीधे इन नागरिकों के घर जाकर नए सिरे से फॉर्म जमा कराने के निर्देश दिए। युद्धस्तर पर चले इस अभियान के परिणामस्वरूप अधिकांश लोगों ने अपने फॉर्म समय पर जमा करा दिए, जिसके बाद उनके आवेदन स्वीकार कर लिए गए। आयोग की इस सक्रियता ने यह साबित कर दिया है कि प्रशासनिक स्तर पर यदि थोड़ी मुस्तैदी दिखाई जाए, तो आम नागरिकों को होने वाली परेशानियों को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
छूटे हुए नामों की इस समस्या का समाधान केवल एक राज्य तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के उन सभी बीस से अधिक राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में यह अभियान चलाया जा रहा है जहां एसआईआर का चरण पूरा हो चुका है। विश्लेषकों का मानना है कि लोकतंत्र की मजबूती के लिए मतदाता सूची का त्रुटिहीन होना सबसे पहली शर्त है। जब तक हर एक योग्य मतदाता के पास मतदान का अधिकार सुरक्षित नहीं रहता, तब तक निष्पक्ष चुनाव की परिकल्पना पूरी नहीं हो सकती। चुनाव आयोग के इस नए निर्देश और स्पेशल ड्राइव से देश के करोड़ों ऐसे मतदाताओं को उम्मीद की किरण नजर आई है, जो किन्हीं प्रशासनिक भूलों के कारण खुद को सूची से बाहर पा रहे थे।





