यूरोपीय राजनीति के गलियारों में मचा हड़कंप
यूरोप के सबसे ताकतवर और आर्थिक रूप से समृद्ध देशों में शुमार जर्मनी की राजनीति इन दिनों एक ऐसे मोड़ पर आ खड़ी है, जहां से भविष्य का पूरा परिदृश्य बदलता हुआ दिखाई दे रहा है। मध्य-पूर्व जर्मनी के एक छोटे से हिस्से में संपन्न हुए प्रांतीय चुनावों के नतीजे आने के बाद से ही राजनीतिक पंडितों और नीति निर्माताओं के माथे पर बल पड़ गए हैं। इन परिणामों ने न केवल पारंपरिक राजनीतिक समीकरणों को झकझोर कर रख दिया है, बल्कि उस अनलिखे समझौते को भी कठघरे में ला खड़ा किया है जिसे दशकों से देश की मुख्यधारा की पार्टियां पूरी सख्ती के साथ मानती आ रही थीं।
इस चुनाव में अल्टरनेटिव फॉर जर्मनी यानी AfD नाम के धुर दक्षिणपंथी संगठन ने अभूतपूर्व सफलता हासिल की है। पार्टी के पक्ष में पड़े मतों का प्रतिशत इतना अधिक है कि उसने वहां की स्थापित और पुरानी मध्य-दक्षिणपंथी पार्टी को मीलों पीछे छोड़ दिया है। चुनाव परिणामों के आंकड़े बताते हैं कि इस राजनीतिक दल को लगभग तिवाली से भी अधिक बढ़त हासिल हुई है, जो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के जर्मन इतिहास में एक बेहद दुर्लभ और चौंकाने वाली घटना मानी जा रही है।
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कैसे हुई थी इस धुर दक्षिणपंथी ताकत की शुरुआत?
अगर इस सियासी दल की यात्रा पर नजर डाली जाए तो इसकी पृष्ठभूमि उतनी पुरानी नहीं है जितनी आज इसकी ताकत नजर आती है। इसकी स्थापना एक दशक पहले कुछ अर्थशास्त्रियों, शिक्षाविदों और कारोबारियों के एक समूह द्वारा की गई थी। उस दौर में इस संगठन का मुख्य उद्देश्य यूरोपीय संघ की साझा मुद्रा और आर्थिक नीतियों पर सवाल उठाना भर था। शुरुआती दिनों में इन्हें आम मतदाताओं का बहुत बड़ा समर्थन नहीं मिल पाया था और ये संसद में प्रवेश के लिए जरूरी न्यूनतम मतों का आंकड़ा भी पार करने से चूक गए थे।
लेकिन वक्त का पहिया घूमा और महाद्वीप में आए शरणार्थी संकट ने इस छोटे से समूह को एक नया और आक्रामक वैचारिक रास्ता दे दिया। इसके बाद से पार्टी ने खुलकर आव्रजन विरोध और राष्ट्रवाद का झंडा बुलंद करना शुरू कर दिया। इस वैचारिक कायाकल्प के चलते संगठन के भीतर के नरमपंथी और उदारवादी धड़े इससे अलग हो गए, लेकिन कट्टरपंथियों के हाथ में कमान आते ही इसका जनाधार तेजी से फैलने लगा। खुफिया एजेंसियों की कड़ी नजर और तमाम विरोध के बावजूद इस दल ने धीरे-धीरे देश के विभिन्न हिस्सों में अपनी जड़े गहरी कर लीं और आज यह मुख्यधारा की राजनीति के सामने सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभर चुका है।
'सुरक्षा घेरा' बनाम जनता की नाराजगी का सच
जर्मनी के राजनीतिक गलियारों में एक दशक से भी ज्यादा समय से 'ब्रांडमाउर' यानी एक अदृश्य सुरक्षा दीवार की अवधारणा चली आ रही है। इस अघोषित नियम के तहत देश की तमाम मध्यमार्गी और स्थापित पार्टियां यह कसम खाती हैं कि वे किसी भी सूरत में धुर दक्षिणपंथी ताकतों के साथ गठबंधन नहीं करेंगी और उन्हें सत्ता से कोसों दूर रखेंगी। मकसद साफ था कि देश के इतिहास के काले अध्यायों को फिर से मुख्य राजनीतिक मंच पर जगह न मिलने पाए।
लेकिन आज विश्लेષक यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या यह रणनीति पूरी तरह विफल हो चुकी है। मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग मानता है कि मुख्यधारा की पार्टियों द्वारा लगातार दरकिनार किए जाने के कारण उनमें व्यवस्था के प्रति गहरी नाराजगी पैदा हो गई है। जब भी कोई राजनीतिक दल भारी जनसमर्थन हासिल करने के बावजूद सत्ता की रेस से बाहर कर दिया जाता है, तो जनता के एक वर्ग में यह भावना घर कर जाती है कि उनके वोटों का कोई वास्तविक मोल नहीं है। पूर्वी जर्मनी के इलाकों में यह असंतोष और भी अधिक गहरा है, जहां लंबे समय से चली आ रही आर्थिक असमानता ने इस विद्रोह को और हवा दी है।
"मुख्यधारा के दलों द्वारा राजनीतिक विरोधियों को हमेशा के लिए अछूत मान लेना दरअसल उनके लिए जनता के बीच सहानुभूति बटोरने का एक आसान जरिया बन जाता है। जब लोकतांत्रिक आकांक्षाओं को दबाया जाता है, तो असंतोष और अधिक मुखर होकर सामने आता है।"— रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञ
यूरोपीय संघ की स्थिरता पर मंडराता संकट
इस राजनीतिक बदलाव का असर केवल जर्मनी की सीमाओं तक सीमित नहीं रहने वाला है। यूरोप महाद्वीप के आर्थिक और कूटनीतिक इंजन के रूप में पहचाने जाने वाले इस देश में यदि अस्थिरता बढ़ती है, तो उसका सीधा प्रभाव पूरे यूरोपीय संघ की कार्यप्रणाली पर पड़ना तय है। वर्तमान समय में जब पूरा यूरोप तमाम भू-राजनीतिक और आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहा है, ऐसे में जर्मनी का आंतरिक राजनीतिक असमंजस वैश्विक मंच पर उसकी नेतृत्व क्षमता को कमजोर कर सकता है।
आने वाले समय में होने वाले बड़े चुनावों से पहले यदि यह रुझान थमता नहीं है, तो पारंपरिक पार्टियों के लिए अपने उस सुरक्षा घेरे को बचाए रखना लगभग असंभव हो जाएगा। राजनेताओं के सामने अब यह गंभीर पहेली है कि वे लोकतांत्रिक रूप से उभर रहे इस भारी जनादेश का सामना कैसे करें। यदि इस बढ़ती हुई राजनीतिक धारा को समय रहते सही तरीके से संबोधित नहीं किया गया, तो देश की शासन व्यवस्था और सामाजिक ताने-बाने को आने वाले दिनों में और भी बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।







