सोने के आसमान छूते दाम और टैक्स का बढ़ता बोझ
भारत में सोने के प्रति प्रेम किसी से छिपा नहीं है। यहां हर शुभ अवसर, त्योहार और विशेषकर शादियों के सीजन में सोने की खरीदारी को अनिवार्य माना जाता है। हालांकि, पिछले कुछ समय से सर्राफा बाजार में सोने की कीमतें रिकॉर्ड ऊंचाई पर बनी हुई हैं, जिससे आम आदमी के लिए आभूषण खरीदना बेहद चुनौतीपूर्ण हो गया है। मौजूदा समय में प्रति 10 ग्राम सोने की कीमत डेढ़ लाख रुपये के आसपास पहुंच चुकी है, जिसने मध्यम वर्ग के बजट को पूरी तरह से बिगाड़ दिया है।
इस बीच, सरकार द्वारा सोने के आयात पर लगने वाले शुल्क यानी कस्टम ड्यूटी को बढ़ाकर 15% तक कर दिया गया है। इसके अलावा, खुदरा बिक्री पर 3% का वस्तु एवं सेवा कर (GST) भी चुकाना पड़ता है। इन तमाम शुल्कों और टैक्स के जुड़ जाने के कारण सोने के गहने आम खरीदार की पहुंच से दूर होते जा रहे हैं। इसी का फायदा उठाने के लिए देश के अनौपचारिक बाजारों में एक समानांतर अर्थव्यवस्था पनपने लगी है, जहां बिना रसीद और कैश के जरिए सोने का बड़ा कारोबार हो रहा है।
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कैश और बिना रसीद के सोने की खरीद का खेल
हाल ही में आई विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स और बाजार विश्लेषकों के आंकड़ों से यह खुलासा हुआ है कि महंगे सोने से बचने के लिए खरीदार अब औपचारिक बैंकिंग चैनलों और पक्की रसीद के बजाय कैश ट्रांजैक्शन की तरफ रुख कर रहे हैं। इस अनौपचारिक बाजार में न तो कोई कागजी कार्रवाई होती है और न ही सरकार के पास इस लेनदेन का कोई आधिकारिक रिकॉर्ड पहुंचता है। व्यापारी और ज्वैलर्स इस तरह के सौदों में ग्राहकों को लुभावनी छूट की पेशकश कर रहे हैं।
बाजार सूत्रों के अनुसार, जो ग्राहक नकद भुगतान करते हैं और पक्का बिल नहीं लेते हैं, उन्हें बाजार भाव से काफी कम कीमत पर सोना मिल जाता है। थोक कारोबारियों के स्तर पर यह छूट लगभग 6% तक आंकी गई है, जबकि खुदरा स्तर पर मोलभाव और आपसी भरोसे के आधार पर ग्राहकों को प्रति 10 ग्राम पर 10,000 रुपये तक की भारी बचत का लालच दिया जा रहा है। यही वजह है कि बड़ी संख्या में लोग इस समानांतर बाजार की ओर आकर्षित हो रहे हैं।
टैक्स चोरी और व्यापारियों का गणित
इस पूरे खेल के पीछे सबसे बड़ा गणित टैक्स की चोरी और भारी-भरकम लेवी से बचना है। जब कोई ज्वैलर बिना बिल के नकद में सोना बेचता है, तो वह 15% आयात शुल्क और 3% जीएसटी जैसे करों के दायरे से बाहर रहता है। चूंकि यह पूरा लेनदेन कागजों पर दर्ज नहीं होता, इसलिए व्यापारी को सरकार के पास कोई टैक्स जमा नहीं करना पड़ता। इसी भारी टैक्स की बचत में से एक हिस्सा वह ग्राहक को डिस्काउंट के रूप में थमा देता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक आयात शुल्क और अन्य कर ऊंचे स्तर पर बने रहेंगे, तब तक इस तरह के अनौपचारिक और समानांतर बाजारों का वजूद बना रहेगा। यह स्थिति न केवल सरकारी खजाने को राजस्व का बड़ा नुकसान पहुंचाती है, बल्कि देश की समग्र वित्तीय व्यवस्था के लिए भी एक बड़ी चुनौती पेश करती है।
"समानांतर बाजार में इतनी बड़ी छूट मुख्य रूप से अनौपचारिक सप्लाई के गणित को दर्शाती है। ज्यादा आयात शुल्क से सोने को सरकारी टैक्स वाले चैनल से बाहर लाने की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ती है।" — हिरेन चंदारिया, मैनेजिंग डायरेक्टर, मॉनेटरी मेटल्स (लंदन)
आम ग्राहकों के लिए छिपा है बड़ा जोखिम
भले ही बिना रसीद और कैश में सोना खरीदने पर शुरुआती तौर पर 10,000 रुपये तक की बचत होती दिख रही हो, लेकिन यह सौदा भविष्य में भारी पड़ सकता है। इस तरह के अनौपचारिक बाजार से खरीदे गए सोने पर कोई बीआईएस (BIS) हॉलमार्क सर्टिफिकेट नहीं मिलता है। इसका मतलब यह है कि उस सोने की शुद्धता की कोई कानूनी गारंटी नहीं होती।
कम कैरेट का सोना थमाए जाने या मिलावटी धातु मिलने की संभावना इस तरह के मामलों में सबसे अधिक होती है। इसके अलावा, यदि भविष्य में ग्राहक इस सोने को बेचने या बदलने जाता है, तो उसे कोई अधिकृत रसीद न होने के कारण भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। इसलिए, थोड़ी सी बचत के चक्कर में बिना बिल का सोना खरीदना आर्थिक रूप से एक बड़ा जोखिम साबित हो सकता है।





