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महंगे सोने का काला खेल: बिना बिल कैश में सोना खरीदने पर मिल रही 10 ग्राम पर 5000 रुपये तक की भारी छूट

देश में सोने की आसमान छूती कीमतों और भारी-भरकम टैक्स के बोझ से बचने के लिए लोग अब समानांतर और अनौपचारिक बाजार का रुख कर रहे हैं। कैश में बिना किसी रसीद और पक्के बिल के सोना खरीदने पर थोक और खुदरा खरीदारों को भारी डिस्काउंट का लालच दिया जा रहा है, जिससे सरकारी राजस्व को करोड़ों का चूना लग रहा है।
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नेशनल डेस्क, द फ्रीलांस
राष्ट्रीय संपादकीय ब्यूरो•30 सितंबर 2026 • अपडेटेड•29
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महंगे सोने का काला खेल: बिना बिल कैश में सोना खरीदने पर मिल रही 10 ग्राम पर 5000 रुपये तक की भारी छूट
📷 महंगे सोने का काला खेल: बिना बिल कैश में सोना खरीदने पर मिल रही 10 ग्राम पर 5000 रुपये तक की भारी छूट — मुख्य घटनाक्रमफोटो साभार: रॉयटर्स / एजेंसीज़ / सोशल मीडिया

खबर की बड़ी बातें (Key Highlights)

  • भारत में सोने की कीमतें रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंचने और भारी टैक्स के कारण कैश में बिना बिल की खरीद बढ़ रही है।
  • थोक और खुदरा खरीदार बिना पक्की रसीद के सोना खरीदकर प्रति 10 ग्राम पर 5,000 रुपये तक की बचत कर रहे हैं।
  • सरकार द्वारा सोने-चांदी पर आयात शुल्क बढ़ाकर 15% किए जाने के बाद से अनौपचारिक बाजार और टैक्स चोरी का दायरा तेजी से फैला है।

सोने की रिकॉर्ड कीमतों और भारी टैक्स के बीच पनपता समानांतर बाजार

भारतीय सर्राफा बाजार में इन दिनों एक अजीब और हैरान करने वाला ट्रेंड तेजी से पैर पसार रहा है। देश में सोने के दाम जिस तरह से आसमान छू रहे हैं और सरकार ने जो भारी-भरकम टैक्स लगा रखे हैं, उसने आम आदमी से लेकर बड़े खरीदारों तक की जेब पर तगड़ा प्रहार किया है। इस आर्थिक दबाव के बीच बाजार का एक ऐसा समानांतर रूप सामने आया है जहाँ नियमों को ताक पर रखकर बिना बिल और बिना किसी सरकारी रिकॉर्ड के सोने की खरीद-फरोख्त धड़ल्ले से की जा रही है। इस अनौपचारिक चैनल का सबसे बड़ा आकर्षण यह है कि खरीदारों को बाजार भाव से काफी कम कीमत पर सोना मिल जाता है, जिससे वे इस जोखिम भरे रास्ते पर चलने को मजबूर हो रहे हैं।

विशेषज्ञों और बाजार के जानकारों के अनुसार, जब भी किसी वस्तु पर करों का बोझ अत्यधिक बढ़ जाता है, तो अर्थव्यवस्था में समानांतर रास्ते स्वतः ही सक्रिय हो जाते हैं। सर्राफा बाजार में भी कुछ ऐसा ही हाल है। दुनिया भर में भू-राजनीतिक तनाव और आर्थिक अनिश्चितता के कारण सोने के भाव रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुके हैं। हालांकि कीमतों में थोड़ी बहुत नरमी जरूर दर्ज की गई है, फिर भी बीते वर्ष के मुकाबले आज भी दाम करीब 28% तक ऊपर बने हुए हैं। ऐसे में शादी-ब्याह या अन्य आयोजनों के लिए गहने खरीदने वाले मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए यह महंगाई एक बहुत बड़ा सिरदर्द बन चुकी है।

इसी मजबूरी का फायदा उठाकर गैर-पारदर्शी नेटवर्क और अनौपचारिक डीलर सक्रिय हो गए हैं। ब्लूमबर्ग और अन्य वित्तीय रिपोर्टों से यह खुलासा हुआ है कि थोक स्तर पर सोना खरीदने वाले बड़े व्यापारी यदि कैश का इस्तेमाल करते हैं और किसी भी प्रकार का पक्का बिल नहीं लेते हैं, तो उन्हें मौजूदा बाजार भाव से 6% तक की सीधी छूट मिल जाती है। यह छूट कोई मामूली बात नहीं है, क्योंकि करोड़ों रुपये के सोने के सौदों में यह मार्जिन बहुत बड़ा मुनाफा या बचत साबित होता है।

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कैश और बिना रसीद के सोने की खरीद पर मिल रही बंपर छूट

आम ग्राहकों की बात करें तो उन्हें भी स्थानीय स्तर पर ज्वैलर्स के साथ मोलभाव करने पर भारी रियायतें मिल रही हैं। उदाहरण के तौर पर, देश के विभिन्न हिस्सों में खरीदारी करने वाली गृहणियों और आम नागरिकों ने स्वीकार किया है कि उन्हें बिना रसीद के नकद भुगतान करने पर प्रति 10 ग्राम सोने पर 5,000 रुपये से लेकर 10,000 रुपये तक की छूट ऑफर की जा रही है। यह बचत लगभग 52 डॉलर प्रति 10 ग्राम के आसपास बैठती है, जिसे मौजूदा महंगाई के दौर में नजरअंदाज करना आम खरीदार के लिए बेहद मुश्किल हो गया है।

इस पूरी प्रक्रिया का गणित बेहद सरल लेकिन पूरी तरह से गैरकानूनी है। जब कोई ग्राहक बिना पक्के बिल के कैश में सोना खरीदता है, तो दुकानदार उस सौदे को अपनी आधिकारिक बही-खातों या डिजिटल रिकॉर्ड में दर्ज नहीं करता है। इससे व्यापारी को उस सौदे पर लगने वाला गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (GST) और अन्य आयकर बचाने का मौका मिल जाता है। चूंकि व्यापारी की पूरी टैक्स देयता बच जाती है, इसलिए वह अपनी अवैध बचत का एक हिस्सा ग्राहक को छूट के रूप में थमा देता है। इस प्रकार ग्राहक और विक्रेता दोनों का तात्कालिक रूप से फायदा हो जाता है, लेकिन देश की अर्थव्यवस्था और राजकोष को इसका भारी नुकसान उठाना पड़ता है।

बाजार के जानकारों का कहना है कि अनौपचारिक बाजार का यह दायरा पूरी तरह से बिखरा हुआ है और यहां कोई एक तय मानक या बेंचमार्क काम नहीं करता है। सौदे पूरी तरह से आपसी भरोसे, मोलभाव और ज्वैलर्स के साथ पुराने संबंधों के आधार पर तय होते हैं। लंदन स्थित मॉनेटरी मेटल्स के मैनेजिंग डायरेक्टर हिरेन चंदारिया का इस बारे में कहना है कि समानांतर बाजार में नजर आने वाली इतनी बड़ी छूट मुख्य रूप से अनौपचारिक सप्लाई चेन के गणित को दर्शाती है, जहाँ भारी आयात शुल्क के चलते व्यापारी टैक्स बचाने के नए रास्ते तलाशने के लिए प्रेरित होते हैं।

"समानांतर बाजार में इतनी बड़ी छूट मुख्य रूप से अनौपचारिक सप्लाई के गणित को दिखाती है। ज्यादा आयात शुल्क से सोने को सरकारी टैक्स वाले चैनल से बाहर लाने की प्रेरणा बढ़ती है।" — हिरेन चंदारिया, मैनेजिंग डायरेक्टर, मॉनेटरी मेटल्स

सरकार के आयात शुल्क और टैक्स नीतियों का असर

भारत में सोने की इस समानांतर अर्थव्यवस्था के फलने-फूलने के पीछे सरकार की नीतियां और आयात शुल्क की शर्तें भी एक बड़ा कारण मानी जा रही हैं। गौरतलब है कि देश में सोने की मांग को नियंत्रित करने और बढ़ते व्यापार घाटे पर लगाम कसने के उद्देश्य से सरकार ने सोने और चांदी पर लगने वाले आयात शुल्क को दोगुने से भी ज्यादा बढ़ाकर 15% कर दिया था। इसके अलावा खुदरा ग्राहकों को खरीद के वक्त 3% का अतिरिक्त जीएसटी भी चुकाना पड़ता है। इन तमाम शुल्कों के जुड़ जाने के बाद सोने की लैंडेड कीमत काफी ज्यादा हो जाती है, जिससे आम आदमी की पहुंच से यह पीली धातु दूर होने लगती है।

चीन के बाद भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा सोने का उपभोक्ता देश है। भारतीय संस्कृति में सोने का विशेष स्थान है, जहाँ इसे केवल आभूषण या सजावट की वस्तु नहीं बल्कि जन्म, उत्सव, त्योहार और विशेष तौर पर शादियों के समय परिवार की सबसे बड़ी सुरक्षा और निवेश माना जाता है। चूंकि देश के भीतर सोने का घरेलू उत्पादन न के बराबर है, इसलिए हमारी अधिकांश मांग पूरी तरह से आयात पर निर्भर करती है। बड़े पैमाने पर होने वाले इस आयात से देश की विदेशी मुद्रा पर भारी दबाव पड़ता है और व्यापार घाटा भी लगातार बढ़ता जाता है।

कंसल्टेंसी मेटल्स फोकस की एक रिपोर्ट के अनुसार, आधिकारिक चैनलों के माध्यम से आयात किए जाने वाले सोने की कीमतों पर भी कई बार अलग-अलग तरह के प्रीमियम या डिस्काउंट देखने को मिलते हैं। सितंबर महीने के आंकड़ों पर गौर करें तो सरकारी चैनलों से आने वाले सोने पर औसतन 50 डॉलर प्रति औंस तक की छूट का अनुमान लगाया गया था, लेकिन अनौपचारिक कैश बाजारों में यह अंतर और भी ज्यादा बड़ा हो जाता है, जहाँ व्यापारी घरेलू कीमतों के मुकाबले 200 डॉलर प्रति औंस तक सस्ता सोना बाजार में खपा रहे हैं।

भरोसे का सौदा और टैक्स चोरी का बढ़ता जाल

इस तरह के अवैध और अनौपचारिक सौदों में सबसे बड़ा आधार 'भरोसा' होता है। खरीदार और ज्वैलर के बीच यदि वर्षों पुराना संबंध है, तो ग्राहक आंख मूंदकर बिना रसीद के भुगतान कर देता है। कई बार लोगों का तर्क होता है कि जब बाजार में कीमतें पहले से ही आसमान छू रही हैं, ऐसे में यदि पांच से दस हजार रुपये की बचत हो रही है, तो बिना बिल के सामान लेने में कोई बुराई नहीं है। हालांकि, वे इस बात को नजरअंदाज कर देते हैं कि भविष्य में जब वे इस सोने को बेचने जाएंगे या इसे अपनी संपत्ति के रूप में कानूनी तौर पर दिखाना चाहेंगे, तो बिना रसीद का यह सोना उनके लिए बड़ी मुसीबत बन सकता है।

बिना पक्के बिल के खरीदे गए आभूषणों का कोई सरकारी रिकॉर्ड नहीं होता है, जिसके कारण आयकर विभाग या अन्य वित्तीय एजेंसियां जब भी जांच करती हैं, तो ऐसे मामलों में बड़ी कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है। इसके अलावा, चोरी या लूटपाट जैसी घटनाओं की स्थिति में बीमा कंपनियों से क्लेम लेने में भी बिना बिल का सोना पूरी तरह से बेकार साबित होता है। बावजूद इसके, तात्कालिक बचत के लालच में आम लोग इस कानूनी जोखिम को उठाने से पीछे नहीं हट रहे हैं।

निष्कर्ष और भविष्य की राह

सोने के इस समानांतर बाजार पर लगाम कसने के लिए प्रशासनिक स्तर पर लगातार निगरानी की आवश्यकता है। जब तक सोने पर करों का बोझ कम नहीं होगा और खरीदारों के लिए पारदर्शी प्रक्रिया को सुगम नहीं बनाया जाएगा, तब तक टैक्स चोरी और बिना बिल के नकद कारोबार का यह काला खेल यूं ही जारी रहने की पूरी संभावना है। सरकार और नीति निर्माताओं को यह समझना होगा कि अत्यधिक टैक्स केवल वैध व्यापार को हतोत्साहित करता है और अवैध रास्तों को बढ़ावा देता है। उपभोक्ताओं को भी यह समझना चाहिए कि थोड़े से पैसों की तात्कालिक बचत भविष्य में उनके लिए बहुत बड़ी कानूनी और वित्तीय परेशानी का सबब बन सकती है।

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