नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश की राजनीति में एक बार फिर चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार सीधे तौर पर केंद्र में आ गए हैं। चुनाव आयोग के कामकाज और फैसलों को लेकर देश के अलग-अलग हिस्सों में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए हैं। मुंबई में 'सिटीजन्स फॉर जस्टिस एंड पीस' (सीजेपी) संगठन ने सड़क पर उतरकर ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की है। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि चुनाव आयोग निष्पक्ष रूप से काम नहीं कर रहा है और चुनावी प्रक्रियाओं में पारदर्शिता की भारी कमी देखी जा रही है। इस तीखे राजनीतिक और सामाजिक माहौल के बीच अब न्यायपालिका से जुड़े लोग भी खुलकर सामने आ गए हैं।
इन बढ़ते विरोध प्रदर्शनों और राजनीतिक हमलों के बीच अब देश के 42 पूर्व जजों ने एक खुला मोर्चा संभाल लिया है। इन पूर्व जजों का कहना है कि ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग के खिलाफ चल रहा यह अभियान पूरी तरह से प्रायोजित और दुर्भावनापूर्ण है। पूर्व जजों ने साफ शब्दों में कहा है कि इस तरह के प्रदर्शन देश की सबसे बड़ी स्वतंत्र संवैधानिक संस्था को कमजोर करने की साजिश हैं। उनका मानना है कि बिना किसी ठोस सबूत के संवैधानिक पदों पर बैठे अधिकारियों पर दबाव बनाना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए बेहद खतरनाक साबित हो सकता है।
मुंबई में सीजेपी का प्रदर्शन और इस्तीफे की उठी मांग
राजधानी दिल्ली से लेकर वित्तीय राजधानी मुंबई तक चुनाव आयोग के खिलाफ रोष साफ दिखाई दे रहा है। मुंबई में आयोजित एक बड़े प्रदर्शन के दौरान नागरिक अधिकार समूहों और कार्यकर्ताओं ने ज्ञानेश कुमार को तुरंत पद छोड़ने के लिए कहा। प्रदर्शनकारियों ने फॉर्म छह, सात और आठ जैसे अहम दस्तावेजों में हालिया बदलावों पर भी गंभीर सवाल उठाए। उनका कहना है कि इन बदलावों से मतदाता सूची की शुद्धता पर बड़ा असर पड़ रहा है। इस दौरान पुलिस ने सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए थे और प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए हल्की सख्ती भी बरतनी पड़ी ताकि कानून-व्यवस्था की स्थिति नियंत्रण से बाहर न हो.
दूसरी तरफ, राजनीतिक गलियारों में राहुल गांधी की नौ घंटे लंबी रणनीति और चुनाव आयोग के जवाब को लेकर भी चर्चाएं तेज हैं। विपक्ष लगातार यह साबित करने की कोशिश कर रहा है कि चुनाव आयोग सत्ताधारी पार्टी के इशारों पर काम कर रहा है। फॉर्म छह और अन्य चुनावी फॉर्मों में किए गए बदलावों को लेकर विपक्षी दल कानूनी जानकारों के साथ मिलकर नई रणनीति तैयार कर रहे हैं। विपक्ष का मुख्य तर्क यह है कि चुनाव आयोग को यह स्पष्ट करना चाहिए कि इन फॉर्मों में संशोधन करने का अधिकार किसके पास था और यह बदलाव किसके कहने पर किए गए हैं।
पूर्व जजों का खुला समर्थन और चुनाव आयोग का बचाव
विपक्ष के इन तीखे हमलों का जवाब देने के लिए अब देश के दिग्गज कानूनी चेहरे मैदान में उतर आए हैं। 42 पूर्व जजों ने एक संयुक्त बयान जारी कर कहा है कि चुनाव आयोग ने हमेशा से अपनी निष्पक्षता साबित की है और हालिया विवादों को तूल देना केवल राजनीतिक फायदे के लिए किया जा रहा है। इन पूर्व जजों का तर्क है कि अगर किसी को चुनाव आयोग के किसी फैसले से आपत्ति है, तो उसके लिए देश में अदालतें और कानूनी रास्ते खुले हैं। सड़क पर उतरकर इस तरह का दबाव बनाना लोकतंत्र की गरिमा के खिलाफ है और इससे जनता का संवैधानिक संस्थाओं से भरोसा उठ सकता है।
मैदान पर उतरी पुलिस और प्रशासन के सामने इस समय कानून-व्यवस्था बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती है। एक तरफ जहां नागरिक समूह और विपक्षी कार्यकर्ता सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ सुरक्षाबल हर स्थिति पर पैनी नजर रखे हुए हैं। ज्ञानेश कुमार के कार्यकाल और चुनाव आयोग के आंतरिक कामकाज को लेकर पिछले कुछ दिनों से मीडिया में मतभेद की खबरें भी सामने आई थीं। इन खबरों के बाद से ही राजनीतिक दलों को चुनाव आयोग को घेरने का एक और बड़ा मौका मिल गया है।
फॉर्म छह में बदलाव और प्रशासनिक अधिकार पर बहस
इस पूरे विवाद के केंद्र में मतदाता सूची से जुड़े फॉर्म छह, सात और आठ भी हैं। जानकारों का कहना है कि इन फॉर्मों में किए गए तकनीकी और प्रशासनिक बदलावों को ठीक से समझा जाना चाहिए। चुनाव आयोग के पास यह अधिकार होता है कि वह चुनाव प्रक्रिया को बेहतर बनाने के लिए नियमों में जरूरी फेरबदल कर सके। हालांकि, विपक्ष का यह आरोप है कि इन बदलावों से आम मतदाताओं को परेशान किया जा रहा है और कुछ खास इलाकों में वोटिंग पैटर्न को प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है। द फ्रीलान्स की ग्राउंड टीम इस पूरे मामले पर लगातार नजर बनाए हुए है और आने वाले दिनों में इस पर और बड़े खुलासे सामने आ सकते हैं।





