नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश की राजधानी में इन दिनों सियासी पारा सातवें आसमान पर है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर विपक्ष पूरी तरह लामबंद हो चुका है। विपक्ष का यह अचानक हमला किसी एक दिन का फैसला नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक गहरी राजनीतिक रणनीति छिपी है। ग्राउंड जीरो से मिली जानकारियों के मुताबिक, आने वाले चुनावी समीकरणों को अपने पक्ष में मोड़ने के लिए यह दबाव बनाया जा रहा है। सत्ता पक्ष इसे बेवजह का राजनीतिक ड्रामा बता रहा है, जबकि विपक्षी दल इसे लोकतंत्र बचाने की अंतिम लड़ाई करार दे रहे हैं।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच राजनीतिक दलों के आपसी रिश्तों में भी बड़ी दरारें साफ दिखने लगी हैं। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खगे की तरफ से बुलाई गई एक अहम बैठक में समाजवादी पार्टी समेत तीन बड़े दलों ने दूरी बना ली। विपक्षी एकता के दावों की पोल खुलती नजर आ रही है, जिससे सत्ताधारी दल को आसानी से काउंटर करने का मौका मिल रहा है। एक तरफ चुनाव आयोग के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया जा रहा है, तो दूसरी तरफ आपसी समन्वय की कमी विपक्ष की सबसे बड़ी कमजोरी बनकर उभर रही है। राजनीतिक विश्लेषक मान रहे हैं कि यह अंदरूनी कलह विपक्षी रणनीति को भारी पड़ सकती है।
विपक्ष के इस दबाव के पीछे असली सियासी मकसद क्या है
विपक्षी दलों का मुख्य तर्क है कि चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता और निष्पक्षता बनाए रखने के लिए बड़े बदलाव जरूरी हैं। लेकिन अंदरखाने की खबर यह है कि विपक्ष प्रशासनिक मशीनरी पर अपनी पकड़ मजबूत करना चाहता है। हाल ही में नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता उमर अब्दुल्ला ने चुनाव आयोग के खिलाफ चल रहे इस आंदोलन के बीच प्रधानमंत्री मोदी की खुलकर तारीफ कर दी है। उमर अब्दुल्ला के इस बयान ने विपक्षी खेमे में हलचल बढ़ा दी है। उन्होंने साफ कहा कि जनता सोच-समझकर वोट देती है और सिर्फ आयोग पर ठीकरा फोड़ना सही नहीं है। इस बयान के बाद विपक्ष की संयुक्त रणनीति पर गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं।
दूसरी ओर, देश के बाकी हिस्सों से भी कई अलग-अलग और चौंकाने वाली खबरें सामने आ रही हैं। एक तरफ जहां राजनीतिक गलियारों में इस्तीफे और बगावत का दौर चल रहा है, वहीं आम जनता से जुड़ी अन्य प्रशासनिक और स्वास्थ्य संबंधी चिंताएं भी जोर पकड़ रही हैं। रूस में फैल रही प्लेग की बीमारी के बीच गोवा के समुद्र तटों पर लगातार चार्टर फ्लाइट्स से पर्यटकों के आने का सिलसिला जारी है। स्थानीय लोग और स्वास्थ्य संगठन इस बात को लेकर बेहद चिंतित हैं कि विदेशी उड़ानों से कोई खतरनाक संक्रमण देश में न फैल जाए। प्रशासन से इन उड़ानों की तत्काल और सख्त जांच करने की मांग लगातार तेज हो रही है।
मनोरंजन जगत से लेकर प्रशासनिक मोर्चे तक उथल-पुथल
केवल राजनीति ही नहीं, बल्कि तकनीक और मनोरंजन की दुनिया में भी बड़े उलटफेर देखने को मिल रहे हैं। भारत के पहले ओवर-द-टॉप यानी ओटीटी प्लेटफॉर्म की कहानी भी इस दौर की एक बड़ी विफलता का उदाहरण बन चुकी है। शुरुआती दौर में मोटा बजट और एकदम परफेक्ट प्लान होने के बावजूद वह प्लेटफॉर्म बाजार में अपनी पकड़ नहीं बना पाया। सही रणनीति और वक्त के साथ खुद को न बदल पाने की वजह से वह प्रोजेक्ट पूरी तरह फ्लॉप साबित हुआ। इससे यह सीख मिलती है कि चाहे राजनीति हो या बाजार, यदि जनता की नब्ज और समय की मांग को नहीं पहचाना गया, तो बड़े से बड़ा प्लान धराशायी हो जाता है।
कुल मिलाकर स्थिति यह है कि ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे का मुद्दा आने वाले दिनों में और तूल पकड़ने वाला है। विपक्ष अपनी साख बचाने और जनता के बीच अपनी मौजूदगी दर्ज कराने के लिए इस मौके को पूरी ताकत से भुनाना चाहता है। वहीं, सरकार और चुनाव आयोग अपने तय नियमों और कानूनी दायरे के तहत काम करने की बात पर अड़े हुए हैं। 'द फ्रीलान्स' की इस ग्राउंड पड़ताल से साफ है कि आने वाला वक्त भारतीय राजनीति और प्रशासनिक व्यवस्था के लिहाज से बेहद उथल-पुथल भरा रहने वाला है। जनता टकटकी लगाए देख रही है कि इस सियासी खींचतान का अंत किस ओर जाता है।





