बच्चों में तेजी से पैर पसार रही है हाथ, पैर और मुंह की बीमारी
मौजूदा समय में बच्चों की सेहत को लेकर एक नया और बड़ा संकट सामने आ रहा है। छोटे बच्चों में 'हाथ, पैर और मुंह की बीमारी' (Hand, Foot, and Mouth Disease) के मामलों में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार, इस साल की शुरुआत से लेकर अब तक इस संक्रमण के दो हजार से अधिक मामले सामने आ चुके हैं। यह स्थिति अभिभावकों और स्वास्थ्य प्रशासन दोनों के लिए चिंता का विषय बन गई है।
विशेष रूप से शहरी और ग्रामीण इलाकों में बच्चों के बीच यह संक्रमण बहुत तेजी से फैल रहा है। कई मामलों में बच्चों की स्थिति इतनी बिगड़ गई कि उन्हें अस्पताल के आईसीयू और मैकेनिकल वेंटिलेशन तक का सहारा लेना पड़ा। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर समय रहते इस बीमारी के लक्षणों को पहचान कर सावधानी न बरती जाए, तो यह बच्चों के लिए जानलेवा भी साबित हो सकती है।
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संक्रमण का दायरा और अस्पतालों में बढ़ती बच्चों की संख्या
विभिन्न क्षेत्रों से मिल रही रिपोर्ट्स बताती हैं कि इस बीमारी ने कई इलाकों को अपनी चपेट میں ले लिया है। प्रांतीय रोग नियंत्रण केंद्रों से मिले आंकड़ों के अनुसार, कुछ चुनिंदा क्षेत्रों में इसके पांच सौ से अधिक मामले दर्ज किए गए हैं, जबकि अन्य आसपास के इलाकों में भी दो सौ से ज्यादा बच्चे इसकी चपेट में आए हैं। सेंट्रल हाईलैंड्स रीजनल जनरल हॉस्पिटल के बाल चिकित्सा विभाग में सैकड़ों बच्चों का इलाज किया जा चुका है।
अस्पतालों के बाल रोग वार्ड इन दिनों ऐसे मरीजों से भरे पड़े हैं। डॉक्टरों का कहना है कि इस बीमारी से पीड़ित बच्चों में से कई को गंभीर जटिलताओं के बाद भर्ती कराया गया। वायरल संक्रमण होने के कारण यह स्कूल जाने वाले बच्चों में एक से दूसरे में बहुत तेजी से फैलता है, जिससे शैक्षणिक संस्थानों और डे-केयर सेंटरों में भी हड़कंप मचा हुआ है।
क्या है हाथ, पैर और मुंह की बीमारी और इसके फैलने के कारण
यह बीमारी मुख्य रूप से 'एंटरोवायरस' (Enteroviruses) समूह के वायरसों के कारण होती है। यह संक्रमण पाचन तंत्र के माध्यम से या फिर संक्रमित व्यक्ति के लार, फफोलों के तरल पदार्थ और मल के सीधे संपर्क में आने से फैलता है। बच्चों की इम्युनिटी कमजोर होने के कारण वे इसकी चपेट में बहुत जल्दी आते हैं।
चिकित्सकों के अनुसार, इस वायरस का सबसे खतरनाक प्रकार EV71 माना जाता है, जो बच्चों के तंत्रिका तंत्र (Nervous System) को बुरी तरह प्रभावित कर सकता है। इसके अलावा, यह मायोकार्डिटिस (हृदय की मांसपेशियों में सूजन) और तीव्र फुफ्फुसीय शोफ जैसी गंभीर जटिलताओं का कारण भी बन सकता है। सबसे बड़ी बात यह है कि एक बार ठीक होने के बाद भी बच्चे इस संक्रमण की चपेट में दोबारा आ सकते हैं, क्योंकि इस बीमारी के प्रति शरीर में लंबे समय तक रहने वाली रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित नहीं होती है।
किन लक्षणों को देखकर माता-पिता को हो जाना चाहिए सावधान
बच्चों में इस बीमारी के शुरुआती लक्षणों को पहचानना बेहद जरूरी है। आमतौर पर हाथों, पैरों और मुंह के अंदर छोटे-छोटे लाल दाने या छाले उभर आते हैं। इसके अलावा तेज बुखार और गले में खराश इसकी मुख्य पहचान है। लेकिन कुछ ऐसे चेतावनी संकेत भी होते हैं जिन पर विशेष नजर रखनी चाहिए।
"हाथ, पैर और मुंह की बीमारी से पीड़ित बच्चों पर बेहद कड़ी निगरानी रखने की आवश्यकता होती है। यदि बच्चे को 38.5 डिग्री सेल्सियस से अधिक का तेज बुखार है जो 48 घंटे से भी ज्यादा समय तक बना रहता है और बुखार कम करने वाली दवाओं से भी आराम नहीं मिल रहा है, तो यह गंभीर स्थिति का संकेत है। इसके अलावा अचानक चौंक जाना, अत्यधिक रोना या नींद में लगातार गड़बड़ी होना खतरे की घंटी है।" — डॉ. डांग वियत नाम, बाल रोग विभाग के उप प्रमुख
जब भी माता-पिता अपने बच्चों में इस तरह के असामान्य या गंभीर लक्षण देखें, तो उन्हें तुरंत बिना देर किए किसी नजदीकी चिकित्सा केंद्र या योग्य बाल रोग विशेषज्ञ के पास ले जाना चाहिए। घरेलू उपायों के भरोसे रहने से स्थिति और अधिक बिगड़ सकती है।
बचाव के लिए साफ-सफाई और खानपान में बरतें विशेष सतर्कता
चूंकि इस बीमारी का कोई विशेष एंटीवायरल इलाज नहीं है, इसलिए रोकथाम ही इससे बचने का सबसे बड़ा और कारगर उपाय है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने आम जनता के लिए कुछ बेहद जरूरी दिशा-निर्देश जारी किए हैं, जिनका पालन करना हर परिवार के लिए अनिवार्य है।
- बच्चों और बड़ों को अपने हाथ साबुन से बार-बार धोने चाहिए, खासकर खाना खाने से पहले और शौचालय का उपयोग करने के बाद।
- पीने का पानी हमेशा उबालकर या पूरी तरह से शुद्ध करके ही इस्तेमाल करें और भोजन को अच्छी तरह पकाएं।
- बच्चों को उंगलियां चूसने या अपने खिलौने मुंह में डालने की आदत से रोकें तथा उनके खाने के बर्तन अलग रखें।
- खिलौने, स्कूल का सामान, दरवाज़े के हैंडल और घरों की सतहों को नियमित रूप से डिटर्जेंट से साफ करते रहें।
संक्रमित बच्चों को अन्य बच्चों से अलग रखना क्यों है जरूरी
संक्रमण के प्रसार को रोकने के लिए यह बेहद आवश्यक है कि बीमार बच्चों को पूरी तरह से आइसोलेट (अलग) रखा जाए। उन्हें इस अवस्था में स्कूल या सार्वजनिक स्थानों पर बिल्कुल न भेजें। जब तक बच्चा पूरी तरह से स्वस्थ नहीं हो जाता, तब तक उसे अन्य स्वस्थ बच्चों के संपर्क में आने से बचाना चाहिए।
बच्चों के मल-मूत्र का निपटान बहुत सावधानी से किया जाना चाहिए ताकि वायरस पर्यावरण में न फैले। डॉक्टरों और स्वास्थ्य कर्मियों के निर्देशों का सख्ती से पालन करके ही इस महामारी जैसे फैलते संक्रमण पर काबू पाया जा सकता है। सामूहिक जागरूकता और स्वच्छता ही हमारे बच्चों को सुरक्षित रख सकती है।




