त्योहारी सीजन से पहले हिमाचल सरकार ने उठाया कर्ज का कदम
पहाड़ी राज्य हिमाचल प्रदेश की वित्तीय सेहत लगातार चिंता का विषय बनी हुई है। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने एक बार फिर बाजार से भारी-भरकम कर्ज लेने का निर्णय लिया है। त्योहारी सीजन के ठीक मुहाने पर खड़े राज्य में नकदी के संकट को दूर करने के लिए वित्त विभाग ने 600 करोड़ रुपये के नए ऋण की अधिसूचना जारी कर दी है। प्रशासनिक हलकों में इस बात की चर्चा तेज हो गई है कि आखिर लगातार बढ़ती उधारी से राज्य की अर्थव्यवस्था आने वाले समय में कैसे उबरेगी।
नए महीने की शुरुआत के साथ ही वित्त विभाग के प्रधान सचिव डॉ. अभिषेक जैन की तरफ से इस लोन से जुड़े तकनीकी निर्देश और आदेश जारी किए गए हैं। जानकारों का मानना है कि पर्व-त्योहारों के इस माहौल में सरकारी कर्मचारियों को समय पर वेतन और पेंशन का भुगतान करने के लिए सरकार के पास बाजार से कर्ज लेने के अलावा फिलहाल कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा है। यही वजह है कि सरकार को बार-बार वित्तीय संस्थानों और रिजर्व बैंक के दरवाजे पर दस्तक देनी पड़ रही है।
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7.78 प्रतिशत की ब्याज दर पर जारी होगा 18 साल का बॉन्ड
वित्तीय विवरण के मुताबिक, सरकार इस बार 18 साल की लंबी अवधि के लिए बाजार से पैसा उठा रही है। इसके लिए 7.78 प्रतिशत ब्याज दर वाले एसजीएस-2044 स्टॉक को दोबारा जारी किया जा रहा है। इस पूरी प्रक्रिया को अंजाम देने के लिए देश के केंद्रीय बैंक यानी भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मदद ली जा रही है। आरबीआई के मुंबई कार्यालय स्थित ई-कुबेर पोर्टल के जरिए इन सरकारी प्रतिभूतियों की नीलामी प्रक्रिया पूरी की जाएगी।
नीलामी की प्रक्रिया संपन्न होने के बाद 7 अक्टूबर को यह धनराशि सीधे तौर पर प्रदेश सरकार के राजकोषीय खाते में ट्रांसफर कर दी जाएगी। इस ऋण की अदायगी की मियाद लंबी है और इसकी अंतिम परिपक्वता तिथि 24 जून, 2044 तय की गई है। इसके अलावा, राज्य सरकार को इस पर तयशुदा नियमों के तहत हर साल दो बार यानी 24 दिसंबर और 24 जून को ब्याज का भुगतान करना होगा।
चालू वित्त वर्ष में अब तक 4,800 करोड़ से अधिक की उधारी
आंकड़ों पर नजर डालें तो चालू वित्त वर्ष 2026-27 के दौरान हिमाचल प्रदेश सरकार द्वारा लिया जाने वाला यह छठा ऋण है। इस ताजा 600 करोड़ के इजाफे के साथ ही मौजूदा वित्तीय वर्ष में सरकार की कुल बाजार उधारी का आंकड़ा 4,800 करोड़ रुपये के स्तर को पार कर चुका है। इससे पहले जुलाई महीने तक सरकार ने कुल 2,800 करोड़ रुपये का ऋण जुटाया था, जिसके बाद अगस्त और सितंबर के महीनों में 700-700 करोड़ रुपये की अतिरिक्त उधारी ली गई थी।
लगातार बढ़ रहे इन वित्तीय लेन-देन ने राज्य के राजकोषीय प्रबंधन पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। विपक्ष लगातार सरकार की वित्तीय नीतियों को लेकर हमलावर है, वहीं आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि हिमाचल जैसे छोटे और पर्वतीय राज्यों के लिए राजस्व घाटा और कर्ज का चक्रव्यूह तोड़ना एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। विकास कार्यों और प्रशासनिक खर्चों को पटरी पर रखने के लिए हर महीने उधारी लेना राज्य की मजबूरी बन गया है।
राज्य पर कुल कर्ज का बोझ पहुंचा एक लाख चार हजार करोड़ के पार
इन तमाम उधारी और वित्तीय गतिविधियों का सीधा असर राज्य की कुल देनदारियों पर पड़ा है। ताजा आंकड़ों के अनुसार, हिमाचल प्रदेश सरकार पर कुल कर्ज का बोझ अब बढ़कर 1.04 लाख करोड़ रुपये से भी अधिक हो गया है। राज्य की जनसंख्या और उसकी आय के मुकाबले यह आंकड़ा काफी बड़ा माना जा रहा है, जिससे भविष्य के बजट और विकास योजनाओं पर गहरा प्रभाव पड़ सकता है।
सरकार के सामने सबसे बड़ी दुविधा यह है कि वह अपने भारी-भरकम वेतन, पेंशन और प्रशासनिक खर्चों को कैसे चलाए। हालांकि, मुख्यमंत्री सुक्खू कई मौकों पर वित्तीय अनुशासन लाने और राजस्व बढ़ाने के उपायों की बात कह चुके हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि फिलहाल ऋण लेने का सिलसिला रुकने का नाम नहीं ले रहा है।
"राज्य की वित्तीय स्थिति को सुधारने के लिए हम हरसंभव कदम उठा रहे हैं, लेकिन पूर्व की सरकारों की नीतियों और भारी देनदारियों के चलते राजकोष पर दबाव बना हुआ है जिसे सुनियोजित तरीके से कम किया जा रहा है।" — हिमाचल प्रदेश सरकार के प्रवक्ता
आगे क्या होगी रणनीति और आम जनता पर इसका प्रभाव?
आर्थिक जानकारों का मानना है कि यदि कर्ज लेने की यह रफ्तार यूं ही जारी रही, तो आने वाले वर्षों में राज्य का अधिकांश राजस्व केवल ब्याज चुकाने में ही खर्च हो जाएगा। इससे शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे के विकास कार्यों के लिए धन की कमी हो सकती है। आम जनता के लिए यह चिंता का विषय है क्योंकि अप्रत्यक्ष रूप से वित्तीय बोझ बढ़ने का असर अंततः जन कल्याणकारी योजनाओं पर भी पड़ सकता है।
अब देखना यह होगा कि राज्य सरकार आने वाले दिनों में अपनी आय बढ़ाने के लिए कौन से नए रास्ते तलाशती है और वित्तीय घाटे से निपटने के लिए क्या ठोस आर्थिक नीति अपनाती है। फिलहाल, त्योहारी सीजन के बीच कर्मचारियों को राहत मिलना तय माना जा रहा है, लेकिन लंबी अवधि के लिए यह आर्थिक संकट सरकार की नींद उड़ाए हुए है।







