हिमाचल हाईकोर्ट का कड़ा रुख: डॉक्टरों के वित्तीय अधिकारों पर नहीं चलेगा प्रशासनिक टालमटोल
देश की न्याय व्यवस्था समय-समय पर ऐसे फैसले देती है जो प्रशासनिक मशीनरी की कार्यप्रणाली में सुधार लाने के साथ-साथ आम नागरिकों और कर्मचारियों के अधिकारों की रक्षा करते हैं। ताजा मामला हिमाचल प्रदेश से जुड़ा है, जहां राज्य के उच्च न्यायालय ने स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग में सेवाएं दे रहे विशेषज्ञ चिकित्सा अधिकारियों (मेडिकल ऑफिसर्स) के हक में एक बहुत ही महत्वपूर्ण आदेश पारित किया है। अदालत ने साफ लफ्जों में कहा है कि प्रशासनिक लेटलतीफी या नियमों में संशोधन की प्रक्रिया में देरी का खामियाजा डॉक्टरों को नहीं भुगतना चाहिए।
न्यायमूर्ति ज्योत्सना रिवाल दुआ की अदालत ने डॉ. विनोद गुप्ता और अन्य याचिकाकर्ता डॉक्टरों की दलीलों को पूरी तरह से स्वीकार कर लिया है। कोर्ट ने राज्य सरकार और स्वास्थ्य विभाग को यह कड़े निर्देश दिए हैं कि वे सरकारी रूप से प्रायोजित (स्पॉन्सर्ड) पीजी डिग्री धारक डॉक्टरों को उनकी पात्रता की शुरुआती तिथि से ही 7,000 रुपये प्रति माह का उच्च शिक्षा भत्ता (पीजी अलाउंस) बिना किसी देरी के जारी करें। अदालत के इस फैसले से राज्य के उन तमाम विशेषज्ञ डॉक्टरों को बड़ी राहत मिली है जो लंबे समय से अपने जायज वित्तीय लाभ के लिए संघर्ष कर रहे थे।
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चार सप्ताह के भीतर भुगतान पूरा करने के सख्त निर्देश
अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया है कि पूरी प्रशासनिक प्रक्रिया और भत्ते के बकाए का भुगतान आगामी चार सप्ताह के भीतर हर हाल में पूरा कर लिया जाना चाहिए। न्यायिक समीक्षा के दौरान यह बात खुलकर सामने आई कि जब राज्य सरकार ने खुद अपने स्तर पर इन डॉक्टरों को उच्च शिक्षा के लिए प्रायोजित किया था और पढ़ाई पूरी होने के बाद उन्हें विभाग में बतौर स्पेशलिस्ट तैनात भी कर दिया, तो फिर केवल औपचारिक नियम संशोधन का बहाना बनाना पूरी तरह से अनुचित है।
न्यायालय ने इस बात पर गहरी नाराजगी जताई कि किस प्रकार सरकार अनिश्चित काल तक फाइलों को लंबित रखकर अपने ही योग्य अधिकारियों के वैध अधिकारों से आंखें मूंद सकती है। फैसले में कहा गया कि जब सरकार ने खुद वर्ष 2019 की पोस्ट ग्रेजुएट नीति के तहत इन चिकित्सकों को एम्स ऋषिकेश जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में जेरियाट्रिक्स (बुजुर्गों की चिकित्सा) और इमरजेंसी मेडिसिन जैसे विशेष विषयों में एमडी करने के लिए भेजा था, तो वापसी पर उन्हें उनके सारे वित्तीय लाभ मिलना उनका नैसर्गिक अधिकार बन जाता है।
नियमों के फेर में फंसाकर हक छीनना तार्किक नहीं
सुनवाई के दौरान यह तथ्य भी प्रमुखता से उभरा कि जब इन डॉक्टरों ने अपनी पढ़ाई पूरी करके वापस लौटने के बाद वर्ष 2013 के सरकारी नोटिफिकेशन के तहत 7,000 रुपये मासिक उच्च शिक्षा भत्ते की मांग की, तो स्वास्थ्य विभाग ने अजीबोगरीब दलील दी। विभाग का कहना था कि ये दोनों स्पेशलिटीज वर्ष 2012 के भर्ती एवं पदोन्नति (आरएंडपी) नियमों के परिशिष्ट-ए में शामिल नहीं हैं। कोर्ट ने इस दलील को सिरे से खारिज करते हुए इसे प्रशासनिक सुस्ती करार दिया।
न्यायालय ने यह भी गौर किया कि स्वास्थ्य विभाग ने पूर्व में पल्मोनरी मेडिसिन और इमरजेंसी मेडिसिन में एमडी करने वाले अन्य डॉक्टरों को भी यही भत्ता जारी किया था, भले ही उनकी विशेषज्ञताएं भी शुरुआती नियमों की सूची में दर्ज नहीं थीं। अदालत ने इस दोहरे रवैये और असमान व्यवहार पर कड़ी आपत्ति दर्ज की और कहा कि एक ही विभाग में काम करने वाले डॉक्टरों के बीच इस तरह का भेदभाव कतई बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।
"सरकार की ओर से प्रायोजित होने और सेवा में स्पेशलिस्ट के रूप में तैनात होने के बाद केवल औपचारिक नियम संशोधन न होने का बहाना बनाकर वित्तीय लाभ रोकना तार्किक और न्यायसंगत नहीं है। राज्य सरकार अपने अधिकारियों के अधिकारों से इस तरह आंखें नहीं मूंद सकती।" — न्यायमूर्ति ज्योत्सना रिवाल दुआ, हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट
चिकित्सकीय सेवाओं और स्वास्थ्य व्यवस्था पर पड़ेगा सकारात्मक असर
कानूनी जानकारों का मानना है कि हिमाचल हाईकोर्ट का यह निर्णय राज्य के चिकित्सा जगत में एक मील का पत्थर साबित होगा। सरकारी अस्पतालों और स्वास्थ्य संस्थानों में अपनी सेवाएं दे रहे विशेषज्ञ डॉक्टरों का मनोबल इससे काफी ऊंचा होगा। जब योग्य चिकित्सकों को उनका पूरा सम्मान और वित्तीय प्रोत्साहन मिलेगा, तो वे अपनी पूरी क्षमता के साथ ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में भी मरीजों की जान बचाने के लिए समर्पित भाव से काम कर सकेंगे।
अदालत के इस फैसले से यह संदेश भी स्पष्ट हो गया है कि नौकरशाही की फाइलें यदि किसी कर्मचारी के हक में बाधा बनती हैं, तो न्यायपालिका हस्तक्षेप करके न्याय सुनिश्चित करेगी। अब देखना यह होगा कि स्वास्थ्य विभाग तयशुदा चार सप्ताह की समय सीमा के भीतर इस आदेश का कितनी सख्ती से पालन करता है और याचिकाकर्ता डॉक्टरों के खातों में बकाया राशि कब तक पहुंच पाती है।







