पश्चिम एशिया के सुलगते हालात के बीच होर्मुज मार्ग से कैसे बढ़ रहा है तेल का निर्यात
दुनियाभर की ऊर्जा सुरक्षा की धुरी कहे जाने वाले होर्मुज जलडमरूमध्य में इस वक्त तनाव चरम पर है। एक तरफ जहां खाड़ी देशों के इस अहम समुद्री मार्ग पर व्यापारिक जहाजों को लगातार निशाना बनाया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ कच्चे तेल का निर्यात हाल के हफ्तों में बढ़कर चौंकाने वाले स्तर पर पहुंच गया है। यह आंकड़ा लगभग उस स्थिति के करीब पहुंच गया है जो मध्य पूर्व में बड़ा संघर्ष छिड़ने से पहले दर्ज किया जाता था। वैश्विक ऊर्जा बाजारों के लिए यह एक बड़ी राहत की खबर जरूर है, लेकिन इसके पीछे छिपी सामरिक हलचल बेहद गंभीर बनी हुई है।
खुफिया और पश्चिमी सुरक्षा एजेंसियों से जुड़े दस्तावेजों के अनुसार, इस व्यस्त जलमार्ग पर सुरक्षा के हालात बेहद नाज़ुक हैं। इसके बावजूद तेल उत्पादक देशों और वैश्विक ऊर्जा कंपनियों ने जोखिम उठाते हुए अपने जहाजों की आवाजाही को बनाए रखा है। जानकारों का मानना है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था को ऊर्जा आपूर्ति की भारी जरूरत है, जिसके चलते इस जोखिम भरे मार्ग से तेल निकासी को रोकना संभव नहीं था।
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हर हफ्ते हो रहे दर्जनों ड्रोन और मिसाइल हमले, लेकिन टैंकरों का सफर जारी
खुफिया रिपोर्टों के हवाले से सामने आया है कि पिछले कुछ हफ्तों से इस क्षेत्र में जहाजों पर हमलों की रफ्तार थमी नहीं है। ईरान समर्थित ताकतों और रिवोल्यूशनरी गार्ड की गतिविधियों के कारण इस समुद्री रास्ते पर लगातार खतरे के बादल मंडरा रहे हैं। पश्चिमी सुरक्षा अधिकारियों का दावा है कि इस क्षेत्र में हर हफ्ते दर्जनों ड्रोन और एंटी-शिप मिसाइलों से व्यापारिक जहाजों को निशाना बनाने की कोशिश की जाती है। पिछले कुछ दिनों के दौरान कई जहाजों को प्रत्यक्ष रूप से नुकसान भी पहुंचा है, हालांकि सतर्कता के चलते कई बड़े हमले अपने सटीक निशाने तक पहुंचने में नाकाम रहे।
इन लगातार हमलों के बीच सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा था कि आखिर जहाज मालिक इस रास्ते से गुजरने का जोखिम क्यों उठा रहे हैं। इसका सबसे बड़ा जवाब अमेरिकी नौसेना की सक्रियता और रणनीतिक सुरक्षा कवच है। खाड़ी देशों के तेल टैंकरों को अब अमेरिकी युद्धपोतों की सीधी सुरक्षा मिल रही है, जिससे उनके लिए इस खूनी रास्ते से गुजरना थोड़ा सुरक्षित हुआ है।
अमेरिकी नौसेना का सुरक्षा घेरा और ओमान का समुद्री रूट बना जीवनरेखा
होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल के सुचारू निर्यात को बनाए रखने में अमेरिकी सैन्य बलों की भूमिका सबसे अहम साबित हो रही है। सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे खाड़ी के प्रमुख तेल उत्पादक देशों के टैंकरों को अमेरिकी नौसेना के सुरक्षा दस्ते एस्कॉर्ट कर रहे हैं। इन जहाजों को ओमान के समुद्री क्षेत्र के पास से गुजरने वाले विशेष और सुरक्षित गलियारों से निकाला जा रहा है। कुछ मामलों में जहाजों ने अपने ट्रांसपोंडर बंद करके भी इस संवेदनशील क्षेत्र को पार करने की कोशिश की है ताकि रडार की नजर से बचा जा सके।
"पश्चिम एशिया के इस जलमार्ग पर व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अमेरिकी सैन्य उपस्थिति को और अधिक मजबूत किया जा रहा है। हमारी नौसेना वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति बाधित नहीं होने देगी।" — पेंटागन के वरिष्ठ रक्षा अधिकारी
कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर के पार, क्या भारत में बढ़ेंगे पेट्रोल-डीजल के दाम
इस बीच भू-राजनीतिक तनाव और हमलों के साये का असर सीधे तौर पर ग्लोबल कमोडिटी मार्केट पर दिखने लगा है। अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतें उछलकर 100 डॉलर प्रति बैरल के आंकड़े को पार कर चुकी हैं। अमेरिका द्वारा फारस की खाड़ी में एक और एयरक्राफ्ट कैरियर और करीब 10,000 अतिरिक्त नौसैनिकों व मरीन सैनिकों को तैनात करने के फैसले से युद्ध की आशंकाएं और गहरी हो गई हैं।
भारत जैसे विकासशील देशों के लिए यह स्थिति चिंता का विषय बनती जा रही है। हालांकि घरेलू बाजार में अभी तेल विपणन कंपनियों ने खुदरा ईंधन की कीमतों में कोई बदलाव नहीं किया है, लेकिन यदि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की यह तेजी लंबे समय तक बनी रहती है, तो आने वाले दिनों में भारतीय उपभोक्ताओं की जेब पर इसका सीधा असर पड़ सकता है। सरकार और तेल कंपनियां फिलहाल स्थिति पर बारीकी से नजर बनाए हुए हैं ताकि आपूर्ति श्रृंखला को पूरी तरह सुरक्षित रखा जा सके।








