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मिडिल ईस्ट संकट के बीच भारत का बड़ा मास्टरस्ट्रोक: तेल आयात की रणनीति बदली, रिफाइनर्स ने उठाया बड़ा कदम

होर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़ते तनाव और सुरक्षा चिंताओं के बीच भारतीय तेल शोधन कंपनियों ने अपनी आयात रणनीति में बड़ा बदलाव किया है। रिलायंस और इंडियन ऑयल जैसी प्रमुख कंपनियों ने अतिरिक्त लागत से बचने के लिए अब खुद जहाजों की व्यवस्था कर सीधे खाड़ी देशों से कच्चा तेल मंगाना शुरू कर दिया है।
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नेशनल डेस्क, द फ्रीलांस
राष्ट्रीय संपादकीय ब्यूरो•1 अक्टूबर 2026 • अपडेटेड•32
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मिडिल ईस्ट संकट के बीच भारत का बड़ा मास्टरस्ट्रोक: तेल आयात की रणनीति बदली, रिफाइनर्स ने उठाया बड़ा कदम
📷 मिडिल ईस्ट संकट के बीच भारत का बड़ा मास्टरस्ट्रोक: तेल आयात की रणनीति बदली, रिफाइनर्स ने उठाया बड़ा कदम — मुख्य घटनाक्रमफोटो साभार: रॉयटर्स / एजेंसीज़ / सोशल मीडिया

खबर की बड़ी बातें (Key Highlights)

  • अमेरिका-ईरान तनाव और होर्मुज संकट के कारण भारतीय रिफाइनरियों को तेल आयात की पुरानी रणनीति में बदलाव करना पड़ा है।
  • रिलायंस, बीपीसीएल, इंडियन ऑयल और एचएमईएल जैसी कंपनियों ने इराक से एफओबी (फ्री ऑन बोर्ड) आधार पर कच्चे तेल की खरीदारी की है।
  • समुद्र के नीचे मिडिल ईस्ट टू इंडिया डीप-वॉटर पाइपलाइन (MEIDP) बिछाने की योजना पर भी तकनीकी अध्ययन शुरू हो गया है।
  • भारत अपनी कुल ऊर्जा जरूरत का लगभग 88 प्रतिशत हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है, जिसे सुरक्षित रखना सरकार की प्राथमिकता है।

होर्मुज जलडमरूमध्य संकट और भारतीय ऊर्जा सुरक्षा की नई चुनौतियां

दुनियाभर में भू-राजनीतिक उथल-पुथल और पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच भारत की ऊर्जा सुरक्षा को लेकर सरकार और तेल कंपनियों ने कमर कस ली है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों और सप्लाई चेन में आ रही बाधाओं के मद्देनजर भारतीय रिफाइनरियों ने अपनी व्यावसायिक और परिवहन रणनीतियों में व्यापक फेरबदल किया है। पिछले कुछ समय से मध्य पूर्व में सुरक्षा हालात बिगड़ने के कारण तेल टैंकरों की आवाजाही प्रभावित हुई थी, जिसके चलते देश की सरकारी और निजी रिफाइनिंग कंपनियों को वैकल्पिक रास्तों और तरीकों पर विचार करना पड़ा।

भारत अपनी कुल ऊर्जा और कच्चे तेल की जरूरतों का लगभग 88 प्रतिशत हिस्सा विदेशों से आयात करता है। ऐसे में यदि समुद्री मार्गों पर किसी तरह की बाधा आती है, तो इसका सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था और आम नागरिकों की जेब पर पड़ सकता है। इसी जोखिम को भांपते हुए पेट्रोलियम मंत्रालय और देश की अग्रणी तेल कंपनियों ने आपूर्ति को निर्बाध बनाए रखने के लिए एक मजबूत और सुरक्षित खाका तैयार किया है, जिसके तहत परिवहन लागत को नियंत्रित करने पर विशेष जोर दिया जा रहा है.

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रिफाइनरियों ने बदली खरीद नीति: एफओबी (FOB) सौदों पर बढ़ा जोर

पूर्व में भारतीय कंपनियां सुरक्षा कारणों से अपने तेल टैंकरों को संवेदनशील होर्मुज मार्ग से भेजने में जोखिम महसूस कर रही थीं। इसके विकल्प के रूप में वे अंतरराष्ट्रीय कारोबारियों और मध्यस्थों के माध्यम से कच्चा तेल मंगा रही थीं, लेकिन इस व्यवस्था में बिचौलियों का मार्जिन जुड़ने के कारण रिफाइनरियों को भारी-भरकम अतिरिक्त शुल्क चुकाना पड़ रहा था। इस अतिरिक्त वित्तीय बोझ से बचने के लिए अब घरेलू कंपनियों ने प्रत्यक्ष रूप से शिपिंग और परिवहन की कमान अपने हाथ में ले ली है।

हाल ही में देश की दिग्गज कंपनियों जैसे रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (RIL), भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (BPCL), इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOC) और एचपीसीएल-मित्तल एनर्जी लिमिटेड (HMEL) ने इराक से 'फ्री ऑन बोर्ड' यानी FOB आधार पर कच्चे तेल के बड़े सौदे किए हैं। इस विशेष व्यवस्था के तहत तेल खरीदने वाली भारतीय कंपनियों को खुद जहाजों और समुद्री टैंकरों की व्यवस्था करनी होती है। इसके जरिए वे तेल उत्पादक देशों के बंदरगाहों से सीधे लोडिंग करवाकर अपनी जरूरत के मुताबिक सुरक्षित समुद्री रास्तों से भारत तक कच्चा तेल पहुंचा रही हैं.

"ऊर्जा आपूर्ति को सुरक्षित रखना हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उत्पन्न हो रही हर स्थिति पर पैनी नजर रखी जा रही है ताकि देश के भीतर ईंधन की सप्लाई चेन बाधित न हो।" — वरिष्ठ पेट्रोलियम मंत्रालय अधिकारी

समुद्र के नीचे तेल पाइपलाइन बिछाने की महत्वाकांक्षी योजना

वर्तमान समुद्री और भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं के दीर्घकालिक समाधान के रूप में भारत सरकार एक अत्यंत महत्वाकांक्षी परियोजना पर भी गंभीरता से विचार कर रही है। इसके तहत अरब सागर के नीचे एक विशाल तेल और गैस पाइपलाइन बिछाने की योजना है, जो सीधे खाड़ी देशों को भारत के पश्चिमी तट से जोड़ेगी। हाल ही में केंद्रीय स्तर पर हुई उच्चस्तरीय बैठकों में इस मिडिल ईस्ट टू इंडिया डीप-वॉटर पाइपलाइन (MEIDP) प्रोजेक्ट को लेकर खाका तैयार किया गया है।

शुरुआती दौर में इस परियोजना को केवल प्राकृतिक गैस के आयात तक सीमित रखने का विचार था, लेकिन मौजूदा ऊर्जा संकट को देखते हुए अब इसके जरिए समुद्र के रास्ते सीधे कच्चा तेल लाने की संभावनाओं पर भी तकनीकी अध्ययन शुरू कर दिया गया है। पेट्रोलियम मंत्रालय के कड़े निर्देशों के बाद सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां इस परियोजना की विस्तृत रिपोर्ट तैयार कर रही हैं। इस रिपोर्ट में गहरे समुद्र में पाइपलाइन स्थापित करने की इंजीनियरिंग चुनौतियों, भारी जलदाब, लागत और सुरक्षा मानकों का बारीकी से आकलन किया जा रहा है.

इंजीनियरिंग चुनौतियां और लागत का गणित

खाड़ी देशों से भारत के तटों तक अरब सागर की गहराई के बीच पाइपलाइन बिछानी है, जो तकनीकी रूप से दुनिया के सबसे जटिल प्रोजेक्ट्स में से एक माना जा रहा है। इस रूट पर समुद्र की गहराई लगभग 3,450 मीटर तक पहुंच जाती है, जहां पानी का अत्यधिक दबाव और उबड़-खाबड़ समुद्री तल बड़ी बाधाएं खड़ी कर सकते हैं। इसके बावजूद, सरकार और तकनीकी विशेषज्ञ इस बात को लेकर आश्वस्त हैं कि यदि यह परियोजना सफल होती है, तो भविष्य में जहाजों के जरिए होने वाले परिवहन के खर्च और जोखिम दोनों में भारी कमी आएगी।

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत जिस तेजी से अपनी ऊर्जा जरूरतों को विविधता दे रहा है, उससे देश की अर्थव्यवस्था को वैश्विक झटकों से बचाने में काफी मदद मिलेगी। रूस, लैटिन अमेरिका और अब खाड़ी देशों से सीधे तालमेल बिठाकर तेल मंगाने की इस नीति से न केवल ईंधन की आपूर्ति स्थिर रहेगी, बल्कि तेल कंपनियों के मार्जिन में भी सुधार होगा, जिसका दीर्घकालिक लाभ अंततः उपभोक्ताओं तक पहुंच सकेगा.

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