नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश की आर्थिक राजधानी से लेकर राजधानी दिल्ली के सत्ता गलियारों तक इन दिनों आयात के मोर्चे पर बड़ी हलचल मची हुई है। भारत अपनी जरूरत का ज्यादातर कच्चा तेल और पाम तेल बाहर से मंगवाता है। लेकिन पिछले कुछ महीनों में अंतरराष्ट्रीय बाजार की बदलती चाल और भू-राजनीतिक तनाव के कारण भारत के आयात करने के रास्ते पूरी तरह बदल गए हैं। दुनिया भर में सप्लाई चेन के टूटने और नए समीकरण बनने के बाद अब भारतीय व्यापारी और सरकार दोनों ही पारंपरिक देशों पर अपनी निर्भरता कम कर रहे हैं। इस पूरी प्रक्रिया का असर आने वाले दिनों में देश के आम बाजार और हर नागरिक की जेब पर पड़ना तय माना जा रहा है।
पिछले कुछ हफ्तों में आए आंकड़ों पर नजर डालें तो देश के आयात बाजार की तस्वीर तेजी से बदलती दिख रही है। एक समय था जब रूस से मिलने वाला सस्ता कच्चा तेल भारत की पहली पसंद बना हुआ था। लेकिन अब जैसे ही रूसी तेल के दाम में बदलाव आया है, भारत ने अपनी रणनीति तुरंत बदल दी है। अब दुनिया के दूसरे कोनों से तेल मंगाया जा रहा है। लैटिन अमेरिकी देश वेनेजुएला से कच्चे तेल का आयात पिछले सात साल के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गया है। सात समंदर पार से आ रहे इस तेल ने साफ कर दिया है कि भारत ऊर्जा सुरक्षा के मामले में अब किसी एक देश पर टिके रहने के बजाय हर संभव विकल्प खुला रखना चाहता है।
कच्चे तेल के बदलते रास्ते और ऊर्जा सुरक्षा
ऊर्जा के मोर्चे पर आ रही ये खबरें सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं हैं, बल्कि इसके पीछे गहरी कूटनीति और व्यापारिक मजबूरी छिपी हुई है। जब मध्य पूर्व के देशों में तनाव बढ़ता है या पारंपरिक बाजार में दाम आसमान छूने लगते हैं, तो देश की तेल कंपनियों को नए ठिकाने तलाशने ही पड़ते हैं। वेनेजुएला पर लगे प्रतिबंधों में ढील मिलते ही भारतीय रिफाइनरियों ने वहां से कच्चा तेल मंगाना शुरू कर दिया। यह कदम इस बात का सुबूत है कि भारतीय बाजार अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए हर नए रास्ते पर तेजी से कदम बढ़ाने को तैयार बैठा है। जानकारों का मानना है कि इस विविधीकरण से भविष्य में ईंधन की कीमतों को स्थिर रखने में काफी मदद मिलेगी।
सिर्फ कच्चा तेल ही नहीं, बल्कि खाने के तेल और इलेक्ट्रॉनिक सामानों के मामले में भी देश की आयात नीति नए दौर से गुजर रही है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा पाम तेल आयातक देश है। मलेशिया और इंडोनेशिया से पाम तेल मंगाने में कई बार सप्लाई की दिक्कतें आती हैं। इसे देखते हुए अब व्यापारी लैटिन अमेरिका और अफ्रीका के दूसरे देशों से पाम तेल के नए स्रोत तलाशने में जुटे हैं। मकसद साफ है कि रसोई के बजट को काबू में रखने के लिए खाने के तेल की आवक में कोई रुकावट नहीं आनी चाहिए। दूसरी तरफ, वियतनाम जैसे दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों के साथ व्यापार घाटे को दस अरब डॉलर से नीचे लाने का कड़ा लक्ष्य तय किया गया है, ताकि दोनों तरफ से निर्यात को भी बराबर की टक्कर दी जा सके।
चीन के सस्ते सामान के जाल से निकलने की चुनौती
आयात के इस पूरे फेर में सबसे बड़ा सवाल चीनी सामानों पर हमारी पुरानी निर्भरता का है। पिछले कई दशकों से भारत के छोटे-खिलौनों से लेकर बड़े इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों तक हर जगह चीनी माल भरा पड़ा है। इस जाल से बाहर निकलने के लिए अब देश में घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा दिया जा रहा है। सरकार चाहती है कि जो सामान बाहर से आ रहा है, वह देश के भीतर ही बने ताकि विदेशी मुद्रा देश के बाहर न जाए। हालांकि यह रास्ता इतना आसान नहीं है क्योंकि सस्ते चीनी सामान का मुकाबला करना स्थानीय उद्योगों के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है।
इस पूरी स्थिति का जमीनी असर अब साफ दिखने लगा है। देश के छोटे व्यापारी और आयातकों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में उतार-चढ़ाव के कारण व्यापार करना पहले से ज्यादा जोखिम भरा हो गया है। कभी समुद्री जहाजों का किराया बढ़ जाता है तो कभी किसी देश में नए टैक्स लग जाते हैं। इसके बावजूद भारत सरकार का पूरा जोर इस बात पर है कि देश की जरूरतें भी पूरी हों और देश का व्यापार घाटा भी नियंत्रण में रहे। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार पाम तेल और कच्चे तेल के इन नए खरीदे गए विकल्पों के जरिए महंगाई पर कितनी लगाम कस पाती है।
व्यापार घाटा घटाने के लिए नए कड़े कदम
विदेश व्यापार को संतुलित करने के लिए नीति निर्माताओं ने अब आयात और निर्यात के बीच एक कड़ा संतुलन बनाने की कोशिश शुरू कर दी है। सिर्फ चीजें मंगवाने के बजाय देश से बाहर माल भेजने पर भी जोर दिया जा रहा है ताकि डॉलर का लेन-देन बराबर बना रहे। व्यापार जानकारों का कहना है कि जब तक हम खुद चीजें बनाना शुरू नहीं करेंगे, तब तक आयात के इन झटकों से पूरी तरह बचना मुश्किल होगा। फिलहाल तो देश की निगाहें उन तमाम जहाजों पर टिकी हैं जो दुनिया के अलग-अलग बंदरगाहों से भारत के लिए रवाना हो चुके हैं।






