म्यूनिख मंच से विदेश मंत्री का कड़ा और दो टूक संदेश
अंतरराष्ट्रीय राजनीति के बदलते समीकरणों के बीच भारत ने एक बार फिर अपनी स्वतंत्र विदेश नीति और पुरानी मित्रताओं के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को दुनिया के सामने पूरी मजबूती से रखा है। जर्मनी में आयोजित प्रतिष्ठित म्यूनिख सिक्योरिटी कॉन्फ्रेंस और लीडर्स मीटिंग के दौरान देश के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने मॉस्को और नई दिल्ली के बीच के ऐतिहासिक रिश्तों को लेकर एक बेहद अहम और बड़ा बयान दिया है। उन्होंने पश्चिमी देशों को आईना दिखाते हुए याद दिलाया कि जब भारत की सुरक्षा और क्षेत्रीय अखंडता पर गंभीर खतरे मंडरा रहे थे, तब दुनिया के बड़े हिस्से का रवैया किस तरफ था।
विदेश मंत्री ने अपने संबोधन में साफ शब्दों में कहा कि कूटनीतिक रिश्तों और रणनीतिक साझेदारियों का आधार रातों-रात तय नहीं होता। इसके पीछे दशकों का साझा इतिहास, संकट के समय मिला सहयोग और एक-दूसरे के प्रति अटूट भरोसा काम करता है। उन्होंने दुनिया को यह भी याद दिलाया कि भू-राजनीति के हर दौर में भारत ने अपने सच्चे मित्रों को कभी नहीं भुलाया है, और रूस के साथ हमारे संबंध इसी भरोसे की मजबूत नींव पर खड़े हैं।
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जब दुनिया का एक बड़ा हिस्सा पाकिस्तान के सैन्य शासन का दे रहा था साथ
इतिहास के पन्नों को पलटते हुए एस जयशंकर ने उस दौर का जिक्र किया जब शीत युद्ध के समय अंतरराष्ट्रीय समुदाय और पश्चिमी देशों की प्राथमिकताएं भारत के विपरीत थीं। उन्होंने सांकेतिक रूप से इशारा किया कि जब पड़ोसी देश में अलोकतांत्रिक और सैन्य तानाशाही वाले शासन को बाहर से भारी समर्थन मिल रहा था, तब भारत की भौगोलिक और राजनीतिक सुरक्षा को अस्थिर करने के प्रयास किए जा रहे थे। ऐसे नाजुक और चुनौतीपूर्ण समय में सोवियत संघ (अब रूस) ने भारत के पक्ष में मजबूती से खड़े होने का ऐतिहासिक फैसला किया था।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जयशंकर का यह बयान पश्चिमी देशों के उन दबावों का करारा जवाब है जो अक्सर भारत द्वारा रूस से तेल खरीदने और मॉस्को के साथ मधुर संबंध बनाए रखने पर आपत्ति जताते हैं। भारत ने हमेशा यह साबित किया है कि उसकी विदेश नीति किसी बाहरी दबाव से नहीं, बल्कि राष्ट्रीय हित और संप्रभुता के सिद्धांतों से निर्देशित होती है।
"जब हमारी क्षेत्रीय अखंडता खतरे में थी और दुनिया का एक बड़ा हिस्सा हमारे पड़ोसी देश के सैन्य शासन के पीछे खड़ा था, तब रूस हमारे साथ चट्टान की तरह खड़ा रहा। लोग अपने अच्छे और बुरे इतिहास को कभी नहीं भूलते।" — एस जयशंकर, विदेश मंत्री, भारत सरकार
यूरोप और भारत के अलग-अलग कूटनीतिक चश्मे पर बेबाक राय
म्यूनिख के मंच से पश्चिमी देशों के दोहरे चरित्र और अपेक्षाओं पर बात करते हुए विदेश मंत्री ने बहुत ही स्पष्ट तर्क रखा। उन्होंने कहा कि यूरोप रूस को लेकर जिस चश्मे से देखता है, वह उसका अपना ऐतिहासिक अनुभव हो सकता है। ठीक उसी तरह, नई दिल्ली मॉस्को के साथ अपने रिश्तों का आकलन अपने ऐतिहासिक अनुभवों के आधार पर करती है। भारत और रूस की इस अटूट साझेदारी को केवल आज की घटनाओं के जरिए नहीं समझा जा सकता।
पिछले सात दशकों के दौरान संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से लेकर वैश्विक कूटनीति के हर बड़े मोड़ पर सोवियत संघ और रूस ने भारत के हितों की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। 1950 के दशक से शुरू हुई यह दोस्ती समय के साथ और अधिक प्रगाढ़ हुई है, जिसमें रक्षा सहयोग, परमाणु ऊर्जा और अब ऊर्जा व्यापार एक नए स्तर पर पहुंच चुका है।
वैश्विक मंच पर उभरती नई महाशक्ति और भारत-रूस साझेदारी का भविष्य
अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए विदेश मंत्री एस जयशंकर ने आने वाले दशकों में भारत की बढ़ती आर्थिक और वैश्विक ताकत का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि बेहतर डेमोग्राफिक प्रोफाइल, तेज विकास दर और नए आर्थिक अवसरों के दम पर भारत आने वाले पांच से दस वर्षों में एक वैश्विक महाशक्ति के रूप में अपनी स्थिति को और मजबूत करेगा। इस पूरी यात्रा में भारत और रूस के बीच का आपसी सहयोग और रणनीतिक विश्वास एक बड़ी ताकत साबित होगा।
आज भले ही दुनिया तमाम तरह के व्यापारिक प्रतिबंधों और भू-राजनीतिक तनावों से जूझ रही हो, लेकिन भारत ने रूस के साथ अपने कच्चे तेल के आयात और पारंपरिक रक्षा समझौतों को कायम रखकर यह दिखा दिया है कि वह अपने राष्ट्रीय हितों से समझौता करने वाला नहीं है। जयशंकर के इस बयान ने एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय बिरादरी को यह संदेश दे दिया है कि भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता से किसी भी कीमत पर पीछे हटने वाला देश नहीं है।








