देशभर में राष्ट्रगीत 'वंदे मातरम्' के गायन के नियमों को लेकर चल रही बहसों के बीच अब दक्षिण भारत के राज्य कर्नाटक की राजनीति में इस मुद्दे पर पारा चढ़ गया है। कर्नाटक विधानसभा के सत्र के दौरान सोमवार को उस समय अजीब और हंगामेदार स्थिति पैदा हो गई, जब सदन में 'वंदे मातरम्' का ऑडियो बजाया गया। तय प्रावधानों के तहत दो स्टैंजा पूरे होने के बाद जैसे ही ऑडियो रोका गया, सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच सियासी तनातनी खुलकर सामने आ गई। बीजेपी विधायकों ने इसका विरोध करते हुए खुद ही बाकी के स्टैंजा गाना शुरू कर दिए, जिससे सदन की कार्यवाही के दौरान कुछ पलों के लिए अफरा-तफरी का माहौल बन गया।
कर्नाटक सरकार का नया आदेश और विवाद की जड़
इस पूरे राजनीतिक विवाद की पृष्ठभूमि में कर्नाटक सरकार का वह हालिया आदेश है, जिसमें सामान्य सरकारी कार्यक्रमों में 'वंदे मातरम्' के केवल पहले दो स्टैंजा गाने की व्यवस्था की गई है। राज्य सरकार द्वारा जारी निर्देश के मुताबिक, किसी भी सामान्य प्रशासनिक या सरकारी आयोजन में राष्ट्रगीत के शुरुआती दो पद ही गाए जाएंगे। वहीं दूसरी ओर, यदि किसी कार्यक्रम में राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री या राज्यपाल जैसे देश के सर्वोच्च संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्ति मौजूद रहते हैं, तो वहां गीत के सभी छह स्टैंजा गाने का नियम रखा गया है।
इसी व्यवस्था को लेकर विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) लगातार राज्य सरकार पर हमलावर है। बीजेपी का कहना है कि राष्ट्रगीत के किसी भी हिस्से को सीमित करना या काटना राष्ट्रीय भावनाओं के अनुकूल नहीं है। यही वजह है कि जब विधानसभा के भीतर ऑडियो को दो स्टैंजा के बाद रोका गया, तो बीजेपी विधायकों ने इसका तीखा विरोध जताया। वे अपनी सीटों पर खड़े हो गए और ऑडियो बंद होने के बावजूद बाकी के स्टैंजा खुद लयबद्ध तरीके से गाते रहे। इस दौरान विधानसभा अध्यक्ष अपनी निर्धारित कार्यवाही और जरूरी नोट्स पढ़ने में व्यस्त रहे, लेकिन सदन का पूरा ध्यान बीजेपी विधायकों के इस अनोखे विरोध प्रदर्शन पर केंद्रित हो गया।
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केंद्रीय गृह मंत्रालय का प्रोटोकॉल और कानूनी पेच
कर्नाटक सरकार के इस दो-स्टैंजा वाले आदेश को समझने के लिए केंद्र सरकार के उन निर्देशों को देखना भी बेहद जरूरी है, जिन्हें हाल ही में देश स्तर पर लागू किया गया है। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने इसी साल 28 जनवरी को 'वंदे मातरम्' के गायन को लेकर पहली बार एक विस्तृत और स्पष्ट प्रोटोकॉल जारी किया था। इस आधिकारिक निर्देश में कहा गया था कि देश के सभी प्रमुख आधिकारिक कार्यक्रमों में राष्ट्रगीत के सभी छह स्टैंजा पूरे उत्साह के साथ गाए या बजाए जाने चाहिए।
गृह मंत्रालय के इस प्रोटोकॉल में यह भी विशेष रूप से उल्लेख किया गया था कि यदि किसी कार्यक्रम में 'वंदे मातरम्' और राष्ट्रगान 'जन गण मन' दोनों को शामिल किया जाना है, तो पहले 'वंदे मातरम्' के सभी छह स्टैंजा गाए या बजाए जाएंगे और उसके बाद राष्ट्रगान का गायन होगा। केंद्र और राज्य के इन अलग-अलग दिशा-निर्देशों के कारण ही अब स्थितियां उलझती नजर आ रही हैं। कर्नाटक सरकार के इस फैसले को लेकर केवल राजनीतिक गलियारों में ही नहीं, बल्कि कानूनी स्तर पर भी सवाल खड़े किए जा चुके हैं।
हाई कोर्ट में चुनौती और अदालती प्रक्रिया
कर्नाटक सरकार के सामान्य कार्यक्रमों में केवल दो स्टैंजा गाने के इस फैसले का विरोध केवल विधानसभा के भीतर तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मामला अदालत की चौखट तक भी पहुंच चुका है। कर्नाटक हाई कोर्ट में इस आदेश के खिलाफ याचिका दायर की जा चुकी है। याचिकाकर्ताओं ने राज्य सरकार के इस निर्णय को चुनौती देते हुए तर्क दिया है कि राष्ट्रगीत के कुछ ही हिस्सों को अनिवार्य करना और बाकी हिस्सों को छोड़ना इसके ऐतिहासिक महत्व और गरिमा के खिलाफ है।
अदालत में इस मामले की सुनवाई के दौरान और भी कई कानूनी पहलुओं पर बहस चल रही है। जानकारों का मानना है कि जब तक इस पर कोई अंतिम न्यायिक फैसला नहीं आ जाता, तब तक विभिन्न आयोजनों और सदनों में इसे लेकर असमंजस की स्थिति बनी रह सकती है। सोमवार को विधानसभा के भीतर जो कुछ हुआ, वह इसी चल रहे वैचारिक और कानूनी संघर्ष का एक जीवंत उदाहरण था, जहां जनप्रतिनिधि खुलकर आमने-सामने आ गए।
सदन के भीतर का दृश्य और राजनीतिक बयानबाजी
सोमवार को सदन की कार्यवाही के दौरान जब 'वंदे मातरम्' का ऑडियो बजाया गया, तो सब कुछ सामान्य लग रहा था। लेकिन जैसे ही दो स्टैंजा के बाद साउंड सिस्टम से आवाज आनी बंद हुई, सदन का माहौल पूरी तरह बदल गया। बीजेपी खेमे से विरोध के स्वर उठने लगे और देखते ही देखते कई विधायक एक सुर में बाकी के स्टैंजा गाने लगे। विधानसभा अध्यक्ष ने सदन की गरिमा बनाए रखने और अपनी सूची के जरूरी काम को आगे बढ़ाने की कोशिश की, लेकिन विधायकों का यह अनूठा विरोध काफी देर तक चर्चा का विषय बना रहा।
"राष्ट्रगीत के पूरे स्वरूप का सम्मान होना चाहिए। इसे कुछ ही पंक्तियों तक सीमित करना हमारी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक परंपराओं के साथ न्याय नहीं है। सरकार को अपने इस आदेश पर पुनर्विचार करना चाहिए।" — विपक्ष के नेता, कर्नाटक विधानसभा
इस पूरी घटना के बाद से कर्नाटक की राजनीति में एक नया भूचाल आ गया है। सत्ता पक्ष जहां अपने प्रशासनिक निर्देशों और तय प्रोटोकॉल का हवाला दे रहा है, वहीं विपक्ष इसे राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक मूल्यों से जुड़ा मुद्दा बनाकर आक्रामक तेवर अपनाए हुए है। आने वाले दिनों में यह विवाद विधानसभा के अंदर और बाहर दोनों जगहों पर और अधिक तूल पकड़ सकता है, क्योंकि दोनों पक्ष अपनी-अपनी विचारधारा और नियमों पर पूरी तरह अड़े हुए हैं।




