मल्लिकार्जुन खरगे का सनसनीखेज बयान: देश के मौजूदा चुनावों को बताया पूरी तरह अवैध
कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने हाल ही में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान ऐसा बयान दिया है जिसने देश की राजनीतिक फिजा में हलचल मचा दी है। कर्नाटक के कलबुर्गी में संवाददाताओं से बात करते हुए उन्होंने सीधे तौर पर देश की वर्तमान लोकतांत्रिक व्यवस्था और चुनावी प्रक्रिया पर गंभीर सवालिया निशान खड़े किए। खरगे ने मांग की है कि मौजूदा लोकसभा और देश के सभी राज्यों की विधानसभाओं को तुरंत प्रभाव से भंग कर दिया जाना चाहिए। उनका दावा है कि वर्तमान में देश की बागडोर जिन जनप्रतिनिधियों के हाथों में है, वे सभी ऐसी चुनावी व्यवस्था के जरिए सत्ता में आए हैं जिसे वैध नहीं ठहराया जा सकता।
अपने तीखे बयानों के लिए जाने जाने वाले कांग्रेस अध्यक्ष ने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों यानी ईवीएम की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि चुनावी प्रक्रिया में लगातार ऐसी गड़बड़ियों की शिकायतें मिल रही हैं, जिससे आम जनता का भरोसा लोकतांत्रिक संस्थाओं से उठ रहा है। खरगे का यह बयान ऐसे समय आया है जब विपक्षी दल लंबे समय से चुनावी सुधारों और पारदर्शिता की मांग को लेकर मुखर रहे हैं। उनके इस ताजा बयान ने सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच चल रही राजनीतिक रस्साकशी को एक नए मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है।
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प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों के अस्तित्व पर उठाया सवाल, बैलेट पेपर से चुनाव की मांग
अपने संबोधन को आगे बढ़ाते हुए मल्लिकार्जुन खरगे ने देश के शीर्ष पदों पर बैठे नेतृत्व को भी अपने निशाने पर लिया। उन्होंने खुलकर कहा कि मौजूदा व्यवस्था के तहत चुने गए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और देश के विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्री जो सत्ता संभाल रहे हैं, उनका पद पर बने रहना नियमों की कसौटी पर खरा नहीं उतरता। उनके अनुसार, जब पूरी चुनावी प्रक्रिया पर ही संदेह के बादल मंडरा रहे हैं, तो उससे चुने गए जनप्रतिनिधियों की वैधता स्वतः ही समाप्त हो जाती है।
खरगे ने मांग की कि देश में लोकतंत्र की वास्तविक बहाली के लिए पुरानी व्यवस्था को दरकिनार करना होगा। उन्होंने जोरदार वकालत करते हुए कहा कि आने वाले समय में देश का कोई भी चुनाव इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन से नहीं कराया जाना चाहिए। इसके स्थान पर पारंपरिक मतपत्र यानी बैलेट पेपर का इस्तेमाल ही एकमात्र विकल्प है जिससे चुनावी प्रक्रिया की शुचिता और पारदर्शिता को पुनः स्थापित किया जा सके।
"आज पूरा देश अवैध चुनावों के आधार पर चलाया जा रहा है। मोदी अवैध प्रधानमंत्री हैं, शाह अवैध मंत्री हैं और जहां भी मुख्यमंत्री चुने गए हैं, वे सभी अवैध हैं। लोकसभा और राज्य विधानसभाओं को भंग किया जाना चाहिए और चुनाव मतपत्रों के जरिए होने चाहिए।" — मल्लिकार्जुन खरगे, कांग्रेस अध्यक्ष
ईवीएम के दुरुपयोग और मतदाता सूची के पुनरीक्षण पर गंभीर आपत्तियां
कांग्रेस अध्यक्ष ने केवल चुनावों के नतीजों तक ही अपनी बात सीमित नहीं रखी, बल्कि उन्होंने पूरी प्रक्रिया के दौरान बरती जाने वाली कथित अनियमितताओं का भी कच्चा-चिट्ठा खोला। उन्होंने आरोप लगाया कि ईवीएम का दुरुपयोग किस स्तर पर हो रहा है, इस बारे में अब उनके अपने लोग और विभिन्न सामाजिक हलकों से भी आवाजें उठने लगी हैं। चुनावी मशीनों की सुरक्षा और उनकी कार्यप्रणाली पर जनता के मन में गहरा संदेह पैदा हो चुका है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
इसके साथ ही, उन्होंने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की प्रक्रिया को लेकर भी गहरी चिंता व्यक्त की। खरगे का तर्क है कि इस तरह की प्रशासनिक प्रक्रियाओं का सबसे बुरा असर समाज के गरीब तबकों, मजदूरों, अशिक्षित वर्ग और विशेष रूप से अल्पसंख्यकों पर पड़ता है। उन्होंने कहा कि प्रशासनिक कदमों के नाम पर हाशिए पर मौजूद लोगों के मताधिकार को प्रभावित करने की कोशिशें लोकतंत्र के लिए घातक साबित हो रही हैं।
राजनीतिक गलियारों में भूचाल और भविष्य की चुनावी रणनीतियों पर असर
मल्लिकार्जुन खरगे के इस आक्रामक रुख के बाद राजनीतिक दलों के बीच प्रतिक्रियाओं का दौर शुरू हो चुका है। विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस अध्यक्ष का यह बयान आगामी राजनीतिक बहसों और चुनावी रणनीतियों की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएगा। एक तरफ जहां विपक्षी दल ईवीएम के खिलाफ अपनी मुहिम को और तेज करने की योजना बना रहे हैं, वहीं इस तरह के बयानों से देश की चुनावी शुचिता पर राष्ट्रीय स्तर पर एक बार फिर बड़ी बहस छिड़ गई है।
देश के सबसे बड़े विपक्षी दल के शीर्ष नेता द्वारा संसद और विधानसभाओं को भंग करने की मांग करना कोई सामान्य घटना नहीं है। यह आने वाले दिनों में देश के राजनीतिक परिदृश्य में बड़े बदलावों और आंदोलनों का संकेत देता है। आम नागरिकों से लेकर राजनीतिक पंडितों तक, सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि निर्वाचन आयोग या सत्तारूढ़ दल इस तीखे हमले पर क्या आधिकारिक प्रतिक्रिया देता है और चुनावी सुधारों की मांग को लेकर आगे क्या कदम उठाए जाते हैं।






