भारत की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहरें हमेशा से दुनिया भर के पर्यटकों और शोधकर्ताओं के लिए आकर्षण का केंद्र रही हैं। उत्तर भारत से लेकर दक्षिण तक फैले हमारे प्राचीन इतिहास के कई पन्ने आज भी जमीन के अंदर दबे हैं या फिर गुमनामी के अंधेरे में हैं। लेकिन अब सरकार की एक नई पहल से देश के सबसे पुराने और समृद्ध पुरास्थलों में शुमार एक ऐतिहासिक साइट को वैश्विक पटल पर लाने की बड़ी तैयारी शुरू हो चुकी है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने देश के चुनिंदा 15 पुरास्थलों को 'लिविंग कल्चरल स्पेस' के तौर पर विकसित करने का बीड़ा उठाया है, जिसमें मध्य प्रदेश के इस खास ऐतिहासिक स्थल का नाम भी शामिल हो गया है।
क्या है केंद्र सरकार की 'DESH' योजना और इसका उद्देश्य?
केंद्र सरकार द्वारा 'डेवलपमेंट ऑफ एक्सकैवेशन साइट्स एंड हेरिटेज कॉम्प्लेक्स' (DESH) योजना की शुरुआत की गई है। इस महत्वाकांक्षी योजना का कुल बजट 1171 करोड़ रुपये है। इस प्रोजेक्ट का मुख्य उद्देश्य देश के उन प्राचीन और ऐतिहासिक स्थलों को पुनर्जीवित करना है, जो भारतीय इतिहास और संस्कृति का अहम हिस्सा रहे हैं लेकिन पर्यटकों की पहुंच से थोड़े दूर रह गए हैं। इस योजना के तहत देशभर से ऐसे 15 पुरास्थलों को चुना गया है, जहाँ प्राचीन काल से लेकर आज तक की जीवन शैली और संस्कृति की निरंतरता देखने को मिलती है।
मध्य प्रदेश की बात करें तो खजुराहो, सांची और ओरछा जैसे विश्व प्रसिद्ध पर्यटन स्थलों के बाद अब बुंदेलखंड के एरण को इस खास सूची में जगह मिली है। बीना तहसील के नजदीक स्थित एरण मध्य प्रदेश का एकमात्र ऐसा स्थान है जिसे इस योजना के तहत चुना गया है। इस फैसले के बाद अब स्थानीय लोगों और इतिहासकारों में भारी उत्साह है, क्योंकि उन्हें उम्मीद है कि एरण को भी जल्द ही सांची और खजुराहो जैसी वैश्विक पहचान मिल सकेगी।
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एरण में बनेगा अत्याधुनिक हाईटेक म्यूजियम और व्याख्यान केंद्र
इस योजना के तहत चुने गए सभी 15 स्थलों पर पर्यटकों के लिए आधुनिक सुविधाओं का विकास किया जाएगा। एरण में एक ऑनसाइट हाईटेक म्यूजियम बनाया जाएगा। इस अत्याधुनिक संग्रहालय में खुदाई के दौरान मिले प्राचीन सिक्के, दुर्लभ मूर्तियां, मिट्टी के बर्तन और अन्य ऐतिहासिक अवशेषों को पूरी सुरक्षा के साथ संरक्षित किया जाएगा। इसके अलावा यहाँ आने वाले पर्यटकों, छात्रों और शोधकर्ताओं को इस जगह के इतिहास से रूबरू कराने के लिए एक हाईटेक व्याख्यान केंद्र भी तैयार किया जाएगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि इन सुविधाओं के विकसित होने से न केवल पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि देश-विदेश से आने वाले इतिहास प्रेमियों को एक ही छत के नीचे भारतीय संस्कृति के कई अनछुए पहलुओं को गहराई से समझने का अवसर भी मिलेगा। सरकार का यह कदम क्षेत्रीय विकास और ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण की दिशा में एक मील का पत्थर साबित हो सकता है।
प्राचीन काल से लेकर गुप्त वंश तक के अनमोल अवशेषों का खजाना
इतिहास के पन्नों को पलटें तो एरण का महत्व किसी भी बड़े ऐतिहासिक नगर से कम नहीं है। यहाँ प्रागैतिहासिक कालीन संस्कृति से लेकर हड़प्पा संस्कृति के समकालीन ग्रामीण ताम्र पाषाण कालीन संस्कृति के स्पष्ट प्रमाण मिलते हैं। इसके अलावा महाजनपद काल, मौर्य काल, शुंग सातवाहन काल, कुषाण काल, नागवंश और शक क्षत्रप शासकों के पुरावशेष भी यहाँ प्रचुर मात्रा में पाए गए हैं।
इतिहासकारों के अनुसार, एरण में गुप्त साम्राज्य के समय की विशाल टकसाल के प्रमाण मिले हैं, जहाँ सोने, चांदी और तांबे के सिक्के बड़ी संख्या में ढाले जाते थे। यह स्थान प्राचीन काल से ही भारत के प्रमुख व्यापारिक मार्ग का एक बेहद महत्वपूर्ण पड़ाव रहा है। यहाँ मिलने वाली कलाकृतियाँ और शिलालेख इस बात की गवाही देते हैं कि यह क्षेत्र सदियों तक आर्थिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का एक प्रमुख केंद्र रहा है।
क्यों खास है एरण? जानिए यहाँ मिलने वाली दुर्लभ मूर्तियां और स्तंभ
एरण की महत्ता को रेखांकित करते हुए इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय यूनिवर्सिटी के प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. मोहन लाल चढ़ार विस्तार से जानकारी देते हैं।
"बीना तहसील में स्थित एरण पुरास्थल भारतीय कला और संस्कृति में एक अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यहाँ प्रागैतिहासिक काल से लेकर विभिन्न राजवंशों के पुरावशेष, गुप्तकालीन मंदिर और मूर्तियां मिलती हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि इस स्थल पर आज भी भारतीय संस्कृति का जीवंत स्वरूप यानी लिविंग ट्रेडिशन देखने को मिलता है।" — प्रो. मोहन लाल चढ़ार, विभागाध्यक्ष, प्राचीन भारतीय इतिहास विभाग
एरण में कई ऐसी चीजें मिली हैं जो देश में और कहीं देखने को नहीं मिलतीं। यहाँ भारत की सबसे बड़ी महावराह की मूर्ति, भगवान विष्णु की प्राचीन प्रतिमाएं, बलराम और कृष्ण के जन्म से जुड़े अवशेष मौजूद हैं। इसके अलावा शक शासक श्रीधर वर्मा के पूर्व गुप्तकालीन अभिलेख, बुधगुप्त का गरुड़ अभिलेख, हूण शासक तोरमाण का अभिलेख और भानुगुप्त के सेनापति गोपराज का देश का पहला सती अभिलेख भी यहीं से प्राप्त हुआ है।
यहाँ मध्यकालीन और पूर्व मध्यकालीन लगभग 15 सती स्तंभ लेख, देश का इकलौता 48 फीट ऊंचा गरुड़ स्तंभ, सांप को पकड़े हुए गरुड़ का अभिलिखित स्तंभ और विष्णु के दस अवतारों का सुंदर चित्रण देखने को मिलता है। कृष्णलीला और कंस वध के 16 गुप्तकालीन कथानक भी इस स्थान की ऐतिहासिक और कलात्मक समृद्धि को और बढ़ाते हैं।
जीवंत परंपरा और भविष्य की उम्मीदें
एरण की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह केवल मृत अवशेषों का टीला नहीं है, बल्कि यहाँ आज भी प्राचीन परंपराएं जीवित हैं। आज भी यहाँ भागवत, वैष्णव, शैव और शाक्त धर्म से जुड़ी पूजा-अर्चना स्थानीय स्तर पर की जाती है। पहली ईसा पूर्व से लेकर 12वीं सदी तक की मूर्तिकला का अद्भुत विकास यहाँ क्रमिक रूप से देखा जा सकता है।
केंद्र सरकार की 'DESH' योजना में शामिल होने के बाद अब एरण के दिन बहुरने की पूरी उम्मीद है। योजना के तहत बुनियादी ढांचे के विकास और सौंदर्यीकरण से इस स्थल को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पर्यटन मानचित्र पर एक मजबूत पहचान मिलेगी। बुंदेलखंड की यह ऐतिहासिक भूमि अब एक बार फिर अपनी प्राचीन चमक के साथ दुनिया के सामने आने के लिए पूरी तरह तैयार है।







