मेरठ/ग्राउंड ब्यूरो — उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में हुए बहुचर्चित और दहला देने वाले नीला ड्रम हत्याकांड में अदालत ने आज अपना ऐतिहासिक फैसला सुना दिया है। कोर्ट ने इस वीभत्स अपराध के मुख्य दोषी मुस्कान और साहिल को फांसी की सजा सुनाई है। न्यायाधीश ने सजा का ऐलान करते हुए कहा कि ऐसे जघन्य अपराध समाज के लिए कलंक हैं और इनके लिए नरमी बरतना न्याय के साथ धोखा होगा। जैसे ही अदालत ने सजा-ए-मौत का फैसला सुनाया, दोनों दोषी कटघरे में ही फफक-फफक कर रो पड़े। अदालत के हर सवाल पर दोनों की जुबान पर ताला लगा रहा और वे पूरी तरह मौन खड़े रहे।
यह पूरा मामला कुछ महीने पहले सामने आया था जब मेरठ के एक मकान से नीले रंग के प्लास्टिक ड्रम में एक इंसान का शव बरामद हुआ था। हत्या के इस तरीके ने पुलिस महकमे से लेकर आम जनता तक के रोंगटे खड़े कर दिए थे। जांच में यह बात सामने आई कि प्रेम प्रसंग और आपसी रंजिश के चलते इस खूनी खेल को अंजाम दिया गया था। पुलिस ने तकनीकी सर्विलांस और फॉरेंसिक सबूतों के आधार पर तेजी से कड़ियां जोड़ीं और मुख्य आरोपियों मुस्कान तथा साहिल को गिरफ्तार किया था। अदालत में चली लंबी सुनवाई के दौरान सरकारी वकील ने पुख्ता सबूत पेश किए जिनके आधार पर दोनों को दोषी करार दिया गया।
दंड भी धर्म है, अदालत ने की कड़ी टिप्पणी
सुनवाई के दौरान अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि समाज में कानून का राज बनाए रखने के लिए अपराधियों को सख्त संदेश देना बेहद जरूरी है। क ने अपनी टिप्पणी में कहा कि 'दंड भी धर्म है' और यदि समय रहते गुनाहगारों को सही सजा न मिले तो समाज का भरोसा उठ जाता है। इस मामले में जिस बेरहमी से हत्या की गई थी, उसने इंसानियत को तार-तार कर दिया था। अभियोजन पक्ष ने दलील दी थी कि यह मामला 'शुरुआती दुर्लभ से दुर्लभतम' श्रेणी में आता है इसलिए दोषियों को उम्रकैद नहीं बल्कि मौत की सजा ही दी जानी चाहिए। कोर्ट ने अभियोजन पक्ष की इन दलीलों को पूरी तरह स्वीकार किया और दोनों को मौत के फंदे तक पहुंचाने का अंतिम आदेश जारी कर दिया।
फैसला आने के बाद पीड़ित परिवार और रिश्तेदारों में राहत की सांस देखी गई। मृतक के जेठ ने पहले ही मीडिया से बातचीत में साफ कर दिया था कि यदि निचली अदालत से दोषियों को फांसी नहीं मिली तो वे न्याय की गुहार लगाते हुए सीधे सुप्रीम कोर्ट तक जाएंगे। आज अदालत का फैसला आने के बाद परिवार ने न्यायपालिका की निष्पक्षता पर पूरा भरोसा जताया है। उन्होंने कहा कि इस सजा से भविष्य में कोई भी इंसान ऐसी घटिया और खौफनाक हरकत करने से पहले हजार बार सोचेगा। स्थानीय लोगों ने भी प्रशासन और पुलिस की त्वरित कार्रवाई की सराहना की है जिन्होंने बिना किसी राजनीतिक दबाव के मामले की तह तक जाकर सच्चाई सामने लाई।
जेल से लेकर फांसी के फंदे तक का कानूनी सफर
कानूनी जानकारों का मानना है कि निचली अदालत द्वारा मौत की सजा सुनाए जाने के बाद अब इस फाइल को उच्च न्यायालय भेजा जाएगा। नियम के मुताबिक, देश में जब भी किसी निचली अदालत द्वारा फांसी की सजा सुनाई जाती है, तो उसकी पुष्टि के लिए मामला उच्च न्यायालय में जाता है। दोषियों के पास यह कानूनी अधिकार है कि वे इस फैसले को ऊपरी अदालत में चुनौती दे सकें। हालांकि, इस मामले में जिस तरह के जघन्य सबूत और फॉरेंसिक रिपोर्ट्स पुलिस ने पेश की हैं, उससे वकीलों का यह भी कहना है कि दोषियों के लिए राहत पाना बेहद मुश्किल होगा।
मेरठ के इस खौफनाक कांड ने देश भर में सुरक्षा, बदलते पारिवारिक रिश्तों और मानवीय मूल्यों पर गंभीर सवाल खड़े किए थे। एक तरफ जहां समाज का एक वर्ग इस फैसले से संतुष्ट है, वहीं दूसरी तरफ मनोवैज्ञानिक और सामाजिक विशेषज्ञ इस बात पर चिंता जता रहे हैं कि आपसी रिश्तों में इस तरह की हिंसा क्यों बढ़ रही है। फिलहाल मेरठ कोर्ट के इस कड़े फैसले ने कानून के हाथ लंबे होने का एक बार फिर बड़ा उदाहरण पेश कर दिया है। 'द फ्रीलान्स' की टीम इस पूरे कानूनी घटनाक्रम और आगे आने वाली अपीलों पर अपनी पैनी नजर बनाए रखेगी।




