वैवाहिक विवादों में मेडिकल जांच की सीमाएं और अदालत का कड़ा रुख
देश की अदालतों में इन दिनों वैवाहिक मामलों की बाढ़ सी आई हुई है। आपसी कलह, मानसिक प्रताड़ना और क्रूरता के आरोपों के आधार पर तलाक की मांग करने वाले मामलों में अक्सर अजीबोगरीब कानूनी दांवपेंच देखने को मिलते हैं। इसी कड़ी में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक बेहद अहम और दूरगामी फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ कर दिया है कि वैवाहिक विवादों की सुनवाई के दौरान किसी भी जीवनसाथी की जबरन मेडिकल जांच करवाने की मांग को आंख मूंदकर स्वीकार नहीं किया जा सकता। इसके लिए आवेदक पक्ष को पहले एक मजबूत और अकाट्य कानूनी आधार पेश करना होगा।
यह पूरा कानूनी विवाद एक ऐसे जोड़े से जुड़ा है जिनकी शादी लंबे समय पहले हुई थी और वे कुछ साल साथ रहने के बाद अलग हो गए थे। पति की ओर से क्रूरता का हवाला देते हुए हिंदू विवाह अधिनियम के तहत रिश्ता खत्म करने की अर्जी दाखिल की गई थी। इस कानूनी लड़ाई के दौरान निचली अदालत में दोनों पक्षों ने अपने-अपने गवाह पेश किए और तमाम दस्तावेज रिकॉर्ड पर लाए गए। जब मामला पूरी तरह से सुनवाई के दौर से गुजरते हुए अंतिम बहस के मुकाम पर पहुंच गया, तब पति की तरफ से एक नया दांव खेला गया और पत्नी की मेडिकल जांच करवाने की मांग कर दी गई।
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अंतिम बहस के चरण में अचानक मेडिकल जांच की मांग पर उठे सवाल
कानूनी जानकारों का मानना है कि किसी भी मुकदमे में साक्ष्य जुटाने और गवाही देने का एक तय समय और चरण होता है। जब गवाहों के बयान दर्ज हो चुके हों और दोनों पक्ष अपनी-अपनी दलीलें रखने के लिए तैयार बैठे हों, तब अचानक से किसी नई वैज्ञानिक या चिकित्सीय जांच की मांग करना मुकदमे को लंबा खींचने का प्रयास माना जाता है। इस मामले में भी कुछ ऐसा ही देखने को मिला। जब ट्रायल कोर्ट लगभग फैसला देने की स्थिति में था, तब पति ने प्रक्रिया का हवाला देते हुए पत्नी के पिछले कुछ मेडिकल ऑपरेशन का जिक्र किया और कोर्ट से उसकी शारीरिक जांच का आदेश जारी करने का आग्रह किया।
पत्नी ने इस कदम का पुरजोर विरोध किया और इसे अपने खिलाफ एक सोची-समझी साजिश करार दिया। निचली अदालत ने हालांकि पति के पक्ष में फैसला सुनाते हुए मेडिकल जांच की अनुमति दे दी थी, लेकिन इस आदेश के खिलाफ पीड़ित महिला ने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। हाईकोर्ट ने इस पूरी प्रक्रिया पर गहरी आपत्ति जताई और कहा कि मुकदमे के इस संवेदनशील और आखिरी मोड़ पर इस तरह की जांच का आदेश देना न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है। इससे उस पक्ष को अनुचित लाभ मिल जाता है जिसने अपने शुरुआती दौर में कभी इस बात को प्रमुखता से उठाया ही नहीं था।
न्यायमूर्ति मिलिंद रमेश फड़के की बेंच की महत्वपूर्ण टिप्पणी
इस पूरे मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति मिलिंद रमेश फड़के की एकल पीठ ने बेहद संतुलित और स्पष्ट निर्देश दिए। अदालत ने अपने फैसले में इस बात पर जोर दिया कि यद्यपि वैवाहिक मामलों में जीवनसाथी की शारीरिक या मानसिक स्थिति को समझने के लिए मेडिकल सबूत काफी मददगार साबित हो सकते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि अदालत की शक्तियों का इस्तेमाल केवल 'रोइंग या फिशिंग इन्क्वायरी' यानी सिर्फ जानकारी जुटाने के लिए किया जाए। अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि कानून किसी को भी बिना किसी ठोस और पुख्ता वजह के दूसरे पक्ष की निजता में तांक-झांक करने की खुली छूट नहीं देता है।
"जब दोनों पक्षों ने अपने सबूत पेश कर दिए हों और मामला अंतिम बहस के चरण में पहुँच गया हो, तो बिना किसी खास ज़रूरत को साबित किए मेडिकल जांच की अनुमति देने से याचिकाकर्ता को गंभीर नुकसान होगा। इससे प्रतिवादी को ऐसे मामले के समर्थन में अतिरिक्त सबूत जुटाने का मौका मिल जाएगा, जिसकी सुनवाई पहले ही कोर्ट के सामने पेश किए गए बयानों और सबूतों के आधार पर हो चुकी है।" — न्यायमूर्ति मिलिंद रमेश फड़के, मध्य प्रदेश हाईकोर्ट
सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों और दृष्टांतों का हवाला
हाईकोर्ट ने अपने इस फैसले को आधार देने के लिए देश की सर्वोच्च अदालत के कई ऐतिहासिक फैसलों का हवाला दिया। विशेष रूप से 'शारदा बनाम धर्मपाल' और 'समर घोष बनाम जया घोष' जैसे चर्चित मामलों का जिक्र किया गया। इन मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही यह स्पष्ट कर दिया था कि वैवाहिक मामलों की सुनवाई करने वाली अदालतों के पास किसी पक्ष की मेडिकल जांच कराने का निर्देश देने का अधिकार तो है, लेकिन यह अधिकार पूरी तरह से विवेक पर आधारित है और इसका इस्तेमाल बहुत सावधानी से किया जाना चाहिए।
सर्वोच्च अदालत के दिशा-निर्देशों के अनुसार, ऐसा आदेश जारी करने से पहले अदालत को यह संतुष्ट होना आवश्यक है कि क्या वासी वास्तव में कोई ऐसा मजबूत आधार पेश कर पा रहा है जिससे यह साबित हो सके कि जांच के बिना न्याय करना असंभव है। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने पाया कि वर्तमान मामले में ऐसा कोई भी ठोस दस्तावेज या मजबूत आधार रिकॉर्ड पर नहीं था, जो यह साबित कर सके कि विवाद को सुलझाने के लिए मेडिकल जांच अनिवार्य रूप से जरूरी थी।
निष्कर्ष और आम नागरिकों के लिए कानूनी सीख
अंततः हाईकोर्ट ने महिला की याचिका को स्वीकार करते हुए निचली अदालत के उस आदेश को पूरी तरह से रद्द कर दिया जिसमें मेडिकल जांच का निर्देश दिया गया था। इस फैसले ने स्पष्ट संदेश दिया है कि कानूनी प्रक्रियाओं का इस्तेमाल विरोधी पक्ष को मानसिक रूप से प्रताड़ित करने या मामले को बेवजह लटकाने के हथियार के रूप में नहीं किया जा सकता। अदालतों में न्याय पाने के लिए समय की पाबंदी और तर्कों की प्रामाणिकता दोनों का होना अनिवार्य है। आम नागरिकों के लिए भी यह एक बड़ा सबक है कि कानूनी दांवपेंच खेलते समय सही समय और सही मंच पर सही दस्तावेज पेश करना कितना महत्वपूर्ण होता है।




