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बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट में बड़ी छलांग: 1300 किमी दूर से आया 1405 टन वजनी फौलादी ढांचा, हाईवे के ऊपर ऐसे बिछा पुल

मुंबई-अहमदाबाद हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर के तहत महाराष्ट्र हिस्से में पहला विशालकाय स्टील ब्रिज सफलतापूर्वक स्थापित कर दिया गया है। 100 मीटर लंबे इस भारी पुल को तमिलनाडु के त्रिची से लाकर व्यस्त नासिक हाईवे पर रात के सन्नाटे में बिना ट्रैफिक रोके खड़ा किया गया।
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नेशनल डेस्क, द फ्रीलांस
राष्ट्रीय संपादकीय ब्यूरो•28 सितंबर 2026 • अपडेटेड
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बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट में बड़ी छलांग: 1300 किमी दूर से आया 1405 टन वजनी फौलादी ढांचा, हाईवे के ऊपर ऐसे बिछा पुल
📷 बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट में बड़ी छलांग: 1300 किमी दूर से आया 1405 टन वजनी फौलादी ढांचा, हाईवे के ऊपर ऐसे बिछा पुल — मुख्य घटनाक्रमफोटो साभार: रॉयटर्स / एजेंसीज़ / सोशल मीडिया

खबर की बड़ी बातें (Key Highlights)

  • महाराष्ट्र में बुलेट ट्रेन रूट का पहला 100 मीटर लंबा और 1405 टन वजनी स्टील ब्रिज स्थापित किया गया।
  • पुल के कलपुर्जे तमिलनाडु के त्रिची में तैयार हुए और 1300 किलोमीटर का सफर तय कर साइट पर पहुंचे।
  • पूरे कॉरिडोर में कुल 28 स्टील ब्रिज बनने हैं, जिनमें से अब तक 16 पुलों का निर्माण पूरा हो चुका है।

देश के सबसे महत्वाकांक्षी रेल प्रोजेक्ट मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन कॉरिडोर ने एक और ऐतिहासिक मील का पत्थर हासिल कर लिया है। आधुनिक इंजीनियरिंग और लॉजिस्टिक्स के असाधारण समन्वय का प्रदर्शन करते हुए महाराष्ट्र के हिस्से में पहला विशालकाय स्टील ब्रिज सफलतापूर्वक अपनी जगह पर स्थापित कर दिया गया है। 100 मीटर लंबा और करीब 1,405 टन वजनी यह फौलादी पुल नेशनल हाईवे-3 (मुंबई-नासिक हाईवे) के ठीक ऊपर स्थापित किया गया है। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि इस महाकाय ढांचे के निर्माण का काम घटनास्थल से करीब 1,300 किलोमीटर दूर दक्षिण भारत में हुआ था, जिसे बेहद योजनाबद्ध तरीके से लाकर यहां असेंबल किया गया।

हाई-स्पीड रेल नेटवर्क की राह में भौगोलिक बाधाएं, नदियां और व्यस्त सड़कें सबसे बड़ी चुनौती होती हैं। नासिक हाईवे देश के सबसे व्यस्ततम मार्गों में से एक है, जहां चौबीसों घंटे भारी वाहनों की आवाजाही रहती है। ऐसे में बिना यातायात को लंबे समय तक बाधित किए 14 मंजिला इमारत जितना भारी स्टील गर्डर हाईवे के ऊपर खड़ा करना भारतीय रेल निर्माण के इतिहास में एक तकनीकी चमत्कार से कम नहीं माना जा रहा है।

त्रिची से 1,300 किमी का सफर तय कर मौके पर पहुंचा फौलादी ढांचा

इस मेगा स्ट्रक्चर की कहानी तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली (त्रिची) स्थित एक अत्याधुनिक स्टील फैब्रिकेशन वर्कशॉप से शुरू होती है। बुलेट ट्रेन की अत्यधिक गति और सुरक्षा मानकों को ध्यान में रखते हुए इस पुल का निर्माण बेहद सख्त अंतरराष्ट्रीय तकनीकी गाइडलाइंस के तहत किया गया। वर्कशॉप में स्टील प्लेटों की सटीक कटिंग, ड्रिलिंग और वेल्डिंग की गई। हर जोड़ की मजबूती सुनिश्चित करने के लिए वेल्डिंग की अल्ट्रासोनिक टेस्टिंग (यूटी) की गई, ताकि धातु के भीतर रत्ती भर भी खामी या हवा का बुलबुला न रह जाए।

तैयार किए गए भारी-भरकम कलपुर्जों को विशेष मल्टी-एक्सल ट्रेलरों पर लादकर 1,300 किलोमीटर की लंबी दूरी तय कराके महाराष्ट्र के ठाणे जिले में भिवंडी के पास डाइव-अंजुर गांव स्थित साइट पर लाया गया। इस पूरी ढुलाई प्रक्रिया में हफ्तों का समय लगा और राष्ट्रीय राजमार्गों पर परिवहन के दौरान विशेष सुरक्षा इंतजामात किए गए। साइट पर पहुंचने के बाद इन विशाल टुकड़ों को बेहद सटीकता के साथ आपस में जोड़ने का काम शुरू हुआ।

"व्यस्त राजमार्गों और नदियों के ऊपर जब हमें बिना पिलर के लंबा स्पैन तैयार करना होता है, तो स्टील ट्रस ब्रिज सबसे मजबूत और टिकाऊ विकल्प साबित होते हैं। यह ढांचा सुरक्षा और आधुनिक तकनीक का बेजोड़ संगम है।" — वरिष्ठ परियोजना अधिकारी, हाई-स्पीड रेल कॉर्पोरेशन

54 हजार से अधिक विशेष बोल्ट्स से कसा गया 1405 टन का पुल

तकनीकी बारीकियों की बात करें तो यह स्टील ब्रिज 100 मीटर लंबा, 14 मीटर चौड़ा और 14 मीटर ऊंचा है। इसके निर्माण में सामान्य नट-बोल्ट की जगह लगभग 54,076 विशेष 'टॉर-शियर' (Tor-Shear) उच्च क्षमता वाले बोल्ट का इस्तेमाल किया गया है। ये बोल्ट अत्यधिक कंपन और दबाव झेलने में सक्षम होते हैं। इस पूरे काम में लगे सभी वेल्डर्स और सुपरवाइजर्स अंतरराष्ट्रीय वेल्डिंग संस्थानों से विशेष रूप से प्रमाणित पेशेवर थे।

पुल को जंग और प्राकृतिक आपदाओं से बचाने के लिए उस पर 'C5 प्रोटेक्टिव पेंटिंग सिस्टम' की कई परतें चढ़ाई गई हैं। यह पेंटिंग तकनीक तटीय और अत्यधिक नम वातावरण में भी लोहे को दशकों तक जंग लगने से सुरक्षित रखती है। इसके अलावा, जब 320 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से बुलेट ट्रेन इस पुल से गुजरेगी, तो उस कंपन को सोखने और गर्डर को स्थिर रखने के लिए विशेष प्रकार के इलास्टोमेरिक बेयरिंग्स लगाए गए हैं।

रात के सन्नाटे में ऑटोमैटिक जैक से ऐसे हुआ लॉन्च

व्यस्त नासिक हाईवे के ऊपर इस भीमकाय पुल को लॉन्च करना इंजीनियरों के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं था। दिन के समय हाईवे पर वाहनों का दबाव बहुत अधिक रहता है, इसलिए इसे स्थापित करने के लिए देर रात का समय चुना गया जब यातायात का दबाव न्यूनतम होता है। पहले जमीन से करीब 17.5 मीटर की ऊंचाई पर अस्थायी ट्रेस्टल यानी सपोर्टिंग स्ट्रक्चर तैयार किए गए और उन पर 22 स्किड अरेंजमेंट लगाए गए।

इसके बाद स्वचालित लॉन्चिंग मैकेनिज्म की मदद से पुल को धीरे-धीरे आगे खिसकाया गया। इस प्रक्रिया में 150-150 टन क्षमता वाले दो विशेष हॉलो हाइड्रोलिक जैक और प्री-टेंशन किए गए मजबूत मैकैलॉय बार्स (Macalloy Bars) का इस्तेमाल किया गया। कंप्यूटर नियंत्रित तकनीक के जरिए इंच-दर-इंच पुल को आगे बढ़ाकर उसके तय पिलरों पर टिका दिया गया। पूरी प्रक्रिया इतनी नियंत्रित और शांत रही कि हाईवे से गुजरने वाले आम चालकों को इसकी भनक तक नहीं लगी।

कॉरिडोर में बनने हैं कुल 28 स्टील ब्रिज, 16 का काम पूरा

508 किलोमीटर लंबे मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन कॉरिडोर में कुल 28 बड़े स्टील ट्रस ब्रिज बनाए जाने की योजना है। इनमें से अब तक 16 पुलों का निर्माण कार्य सफलतापूर्वक पूरा कर लिया गया है। इससे पहले पूरे किए गए अधिकांश स्टील ब्रिज गुजरात के हिस्से में स्थित हैं, जिनमें नेशनल हाईवे, डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर और नदियों को पार करने वाले स्ट्रक्चर शामिल हैं। महाराष्ट्र के हिस्से में स्थापित होने वाला यह अपनी तरह का पहला स्टील ब्रिज है।

रेलवे विशेषज्ञों के अनुसार, कंक्रीट के गर्डर आमतौर पर 40 से 50 मीटर तक के स्पैन के लिए उपयुक्त होते हैं। लेकिन जहां नीचे चौड़ा एक्सप्रेसवे, रेलवे ट्रैक या गहरी नदी बह रही हो और बीच में खंभा खड़ा करना संभव न हो, वहां 70 से 130 मीटर तक लंबे स्टील स्पैन ही सबसे सुरक्षित समाधान होते हैं। यह तकनीक न केवल जगह बचाती है बल्कि निर्माण के दौरान नीचे चलने वाले सामान्य जीवन को भी प्रभावित नहीं होने देती।

बुलेट ट्रेन की रफ्तार: सफर 7 घंटे से घटकर सिर्फ 2 घंटे में

मुंबई और अहमदाबाद के बीच चलने वाली यह हाई-स्पीड रेल सेवा भारत की परिवहन व्यवस्था में युगांतकारी बदलाव लाने जा रही है। वर्तमान में दोनों शहरों के बीच ट्रेन से यात्रा करने में 6 से 7 घंटे और सड़क मार्ग से 8 से 9 घंटे लगते हैं। बुलेट ट्रेन के परिचालन में आने के बाद यह दूरी अधिकतम रफ्तार (320 किमी प्रति घंटा) पर महज 2 घंटे 7 मिनट में पूरी कर ली जाएगी।

यह परियोजना न केवल यात्रा का समय घटाएगी बल्कि महाराष्ट्र और गुजरात के औद्योगिक शहरों जैसे ठाणे, विरार, बोईसर, वापी, सूरत, भरूच, वडोदरा और आणंद के बीच आर्थिक गतिविधियों को भी भारी गति देगी। डाइव-अंजुर में पहले स्टील ब्रिज का यह सफल प्रक्षेपण साबित करता है कि महाराष्ट्र में भी बुलेट ट्रेन का काम अब पूरी रफ्तार पकड़ चुका है और जल्द ही देश की पहली हाई-स्पीड ट्रेन पटरियों पर दौड़ती नजर आएगी।

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