नई दिल्ली से हमारे राजनीतिक कक्ष की विशेष रिपोर्ट के अनुसार देश की राजधानी में इन दिनों गलियारों से लेकर राजनीतिक दलों के दफ्तरों तक एक ही चर्चा सबसे ऊपर है। सरकार इस महीने के अंत तक संसद का एक विशेष सत्र बुलाने पर गंभीरता से विचार कर रही है। अंदरखाने से मिल रही जानकारी के मुताबिक इस विशेष सत्र के दौरान देश में लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाने का बड़ा कदम उठाया जा सकता है। इसके साथ ही कई वर्षों से लंबित पड़े परिसीमन बिल को भी सदन के पटल पर रखने की पूरी तैयारी कर ली गई है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस कदम से आने वाले चुनावों की पूरी रूपरेखा बदल जाएगी।
बीते कुछ हफ्तों से राष्ट्रीय राजधानी में जिस तरह की गतिविधियां देखने को मिल रही हैं, उनसे यह साफ संकेत मिल रहा है कि सरकार इस बड़े विधायी कार्य को जल्द से जल्द पूरा करना चाहती है। देरी होने की स्थिति में इस योजना को साल 2029 के आम चुनावों से पहले लागू करना बेहद कठिन हो सकता है। यही वजह है कि महिला आरक्षण और परिसीमन जैसे गंभीर मुद्दों को अब चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ाने का खाका तैयार किया जा चुका है। प्रशासनिक स्तर पर भी इस बात की सुगबुगाहट है कि सभी औपचारिकताएं तेजी से पूरी की जा रही हैं ताकि समय रहते इस बिल को कानूनी जामा पहनाया जा सके।
छोटे दलों को साधने की रणनीति और संख्या बल
संसद के इस संभावित विशेष सत्र से पहले सत्ताधारी दल ने अपनी राजनीतिक जमीन को पूरी तरह मजबूत करना शुरू कर दिया है। पिछले कुछ दिनों में आंकड़े जुटाने और बहुमत के समीकरण को पुख्ता करने का काम लगभग पूरा हो चुका है। चूंकि इस तरह के बड़े बिल को पास कराने के लिए सदन में मजबूत सहमति की जरूरत होती है, इसलिए सत्तारूढ़ गठबंधन ने क्षेत्रीय दलों के साथ संपर्क साधना तेज कर दिया है। खासतौर पर द्रमुक और अन्य क्षेत्रीय ताकतों को अपने पक्ष में करने के लिए पर्दे के पीछे वार्ताओं का दौर जारी है। राजनीतिक रणनीतिकार इस बात को लेकर आश्वस्त हैं कि मतदान के समय सरकार के पास पर्याप्त संख्या बल मौजूद रहेगा।
इस पूरे घटनाक्रम में एक बड़ा पहलू सीटों के बंटवारे और भौगोलिक सीमा तय करने का भी है, जिसे लेकर दक्षिण और उत्तर भारत के राज्यों के बीच लंबे समय से बहस छिड़ी हुई है। जनसंख्या के आधार पर परिसीमन होने से उन राज्यों को अधिक फायदा मिल सकता है जिन्होंने परिवार नियोजन के नियमों का कड़ाई से पालन किया है। इस बात को ध्यान में रखते हुए सरकार ऐसा बीच का रास्ता निकालने की कोशिश कर रही है जिससे किसी भी राज्य के हितों को ठेस न पहुंचे। राजनीतिक दलों के साथ अनौपचारिक बैठकों में इस बात पर भी मंथन किया जा रहा है कि राज्यों के भीतर विरोध के स्वरों को कैसे शांत किया जाए।
महिला आरक्षण और पचास प्रतिशत का नया फार्मूला
इस पूरी कवायद का एक अहम हिस्सा महिला आरक्षण को नए परिसीमन के साथ जोड़कर देखना भी है। चर्चा इस बात की है कि सरकार ने पचास प्रतिशत के दायरे में कुछ ऐसे बदलाव करने का मन बनाया है जिससे निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्गठन सुगमता से हो सके। महिला आरक्षण कानून को जमीन पर उतारने के लिए यह जरूरी है कि पहले देश की लोकसभा और विधानसभा सीटों की संख्या बढ़ाई जाए। जब तक नई सीटें तय नहीं होतीं, तब तक महिलाओं के लिए एक तिहाई आरक्षण का सही आवंटन करना तकनीकी रूप से मुश्किल साबित हो सकता है। इसी तकनीकी उलझन को सुलझाने के लिए यह विशेष सत्र बुलाया जाना अनिवार्य माना जा रहा है।
आम जनता के मन में भी इस बात को लेकर खासी उत्सुकता है कि आखिर संसद के इस अचानक बुलाए जाने वाले सत्र में उनके इलाके की राजनीति पर क्या असर पड़ेगा। कई सामाजिक संगठन और राजनीतिक विश्लेषक इस बात पर नजर गड़ाए हुए हैं कि नए परिसीमन के बाद आरक्षित सीटों का समीकरण किस तरह बदलेगा। हालांकि अभी तक सरकार की ओर से सत्र की तारीखों का आधिकारिक ऐलान नहीं किया गया है, लेकिन जिस तरह की प्रशासनिक तैयारियां चल रही हैं, उससे यह तय माना जा रहा है कि किसी भी वक्त बड़ा एलान हो सकता है।
राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया और आगामी चुनौतियां
जैसे-जैसे विशेष सत्र की खबरें बाहर आ रही हैं, वैसे-वैसे विपक्षी खेमे में भी रणनीतिक बैठकें शुरू हो गई हैं। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल इस बात पर नजर रख रहे हैं कि सरकार इस बिल के जरिए कौन सा राजनीतिक संदेश देना चाहती है। कुछ क्षेत्रीय दलों को इस बात की चिंता है कि परिसीमन के कारण उनकी लोकसभा सीटें कम न हो जाएं। इन सभी आशंकाओं को दूर करने के लिए सत्ता पक्ष के वरिष्ठ नेता लगातार विपक्षी दलों के संपर्क में हैं। द फ्रीलान्स की ग्राउंड रिपोर्ट बताती है कि आने वाले दिनों में संसद का यह सत्र भारतीय राजनीति की दिशा तय करने वाला सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हो सकता है।











