नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश की राजनीति में इस वक्त एक नया विवाद तेजी से तूल पकड़ रहा है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कामकाज और फैसलों को लेकर देश के कई हिस्सों में विरोध प्रदर्शन देखने को मिल रहे हैं। विपक्षी दलों और सामाजिक संगठनों का आरोप है कि चुनाव संचालन प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी है और जनता के सवालों के सही जवाब नहीं मिल रहे हैं। जमीन पर उतरकर लोग चुनाव आयोग के खिलाफ अपनी नाराजगी जता रहे हैं और हालात पर पुलिस तथा प्रशासनिक अमला भी पैनी नजर बनाए हुए है।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच देश के न्यायिक जगत से एक बड़ा बयान सामने आया है। विभिन्न अदालतों के 42 पूर्व जजों ने एक साझा पत्र जारी किया है। इन पूर्व जजों का कहना है कि चुनाव आयोग जैसी स्वतंत्र संवैधानिक संस्था पर बेबुनियाद आरोप लगाना लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है। उनका मानना है कि कुछ लोग अपने राजनीतिक फायदे के लिए चुनाव आयोग को बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं, जिसे किसी भी कीमत पर सही नहीं ठहराया जा सकता है।
फॉर्म 6, 7 और 8 में बदलाव पर उठ रहे सवाल
विपक्ष और प्रदर्शनकारियों की मुख्य नाराजगी मतदाता सूची से जुड़े फॉर्म्स को लेकर है। जानकारों के मुताबिक, फॉर्म 6, फॉर्म 7 और फॉर्म 8 का इस्तेमाल नाम जोड़ने, नाम हटाने और सुधार करने के लिए किया जाता है। हाल ही में इनमें कुछ तकनीकी और प्रक्रियात्मक बदलाव किए गए हैं। आलोचकों का सवाल है कि ये बदलाव किसने और किन अधिकारों के तहत किए हैं। क्या चुनाव आयोग के पास बिना संसद की लंबी चर्चा के ऐसे बड़े कदम उठाने का पूरा अधिकार है, यह बात अब बहस का मुख्य केंद्र बन चुकी है।
मुंबई और देश के अन्य महानगरों में सिविल सोसाइटी ग्रुप्स और नागरिक संगठनों ने सड़क पर उतरकर अपना विरोध दर्ज कराया है। मुंबई में 'सीजेपी' यानी सिटीजंस फॉर जस्टिस एंड पीस से जुड़े लोगों ने जोरदार प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि चुनाव प्रक्रिया में हर नागरिक का भरोसा होना सबसे जरूरी है। अगर लोगों के मन में शक पैदा होगा, तो देश की पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था पर सवालिया निशान लग जाएंगे। वक्ताओं ने मंच से साफ कहा कि आम जनता के अधिकारों की रक्षा के लिए पारदर्शी फैसले होने बेहद जरूरी हैं।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी हो रही है इस विवाद की चर्चा
भारत के चुनाव आयोग को दुनिया भर में एक मजबूत और निष्पक्ष संस्था माना जाता है। लेकिन ज्ञानेश कुमार के खिलाफ हो रहे इन प्रदर्शनों और राजनीतिक उठापटक की गूंज अब देश की सीमाओं से बाहर भी सुनाई दे रही है। पाकिस्तान, ब्रिटेन और कई अन्य पश्चिमी देशों के मीडिया में इस बात पर बहस चल रही है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में चुनाव प्रबंधन को लेकर किस तरह की राजनीतिक जंग छिड़ी हुई है। विदेशी अखबारों और चैनलों पर हो रही इन चर्चाओं ने इस घरेलू विवाद को एक नया भू-राजनीतिक आयाम दे दिया है।
दूसरी ओर, उद्योग जगत और बाजार से जुड़ी अन्य हलचलें भी इन दिनों सुर्खियों में हैं। एक तरफ जहां राजनीतिक मोर्चे पर चुनाव आयोग को लेकर घमासान मचा है, वहीं दूसरी तरफ एलन मस्क जैसे वैश्विक दिग्गजों के बयानों ने कॉर्पोरेट और राजनीतिक गलियारों में हलचल बढ़ा दी है। मस्क के एक हालिया बयान में भारतीय उद्योगपतियों और बाजार के वर्चस्व को लेकर सवाल उठाए गए, जिसके बाद देश के भीतर आर्थिक नीतियों पर भी नए सिरे से बहस छिड़ गई है। हालांकि, मुख्य ध्यान अभी भी चुनाव आयोग के कामकाज और उसके खिलाफ चल रहे प्रदर्शनों पर ही केंद्रित है।
आगे क्या होगा और प्रशासन की क्या है तैयारी
राजधानी दिल्ली से लेकर राज्यों की राजधानियों तक सुरक्षा के कड़े इंतजाम कर दिए गए हैं। पुलिस प्रशासन किसी भी अप्रिय घटना को रोकने के लिए पूरी तरह मुस्तैद है। चुनाव आयोग की तरफ से अभी तक इन सभी विरोध प्रदर्शनों पर कोई बहुत बड़ा औपचारिक बयान नहीं आया है, लेकिन अंदरखाने अधिकारी पूरी स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं। 'द फ्रीलान्स' की टीम लगातार इस मामले की जमीनी पड़ताल कर रही है ताकि पाठकों तक हर एक सच पूरी निष्पक्षता के साथ पहुंचाया जा सके।








