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शिक्षकों से जुड़े गैर-शैक्षणिक कामों पर बड़ा एक्शन: क्लास छोड़कर सर्वे कराने के आदेश पर शिक्षा विभाग सख्त

सरकारी शिक्षकों को पढ़ाई के अलावा अन्य प्रशासनिक कामों में लगाने को लेकर शिक्षा विभाग ने कड़ा रुख अपनाया है। जिला प्रशासन द्वारा राशन कार्ड वेरिफिकेशन जैसे कामों में शिक्षकों की ड्यूटी लगाए जाने के बाद शिक्षा सचिव ने दखल दिया है और साफ निर्देश जारी किए हैं कि अध्यापकों का मुख्य काम सिर्फ बच्चों को पढ़ाना है।
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26 सितंबर 2026 • अपडेटेड
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शिक्षकों से जुड़े गैर-शैक्षणिक कामों पर बड़ा एक्शन: क्लास छोड़कर सर्वे कराने के आदेश पर शिक्षा विभाग सख्त
📷 शिक्षकों से जुड़े गैर-शैक्षणिक कामों पर बड़ा एक्शन: क्लास छोड़कर सर्वे कराने के आदेश पर शिक्षा विभाग सख्त — मुख्य घटनाक्रमफोटो साभार: रॉयटर्स / एजेंसीज़ / सोशल मीडिया

खबर की बड़ी बातें (Key Highlights)

  • शिक्षा विभाग ने सभी जिलाधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि शिक्षकों को शिक्षण कार्यों के अलावा अन्य प्रशासनिक कामों में न उलझाया जाए।
  • लुधियाना जिला प्रशासन द्वारा राशन कार्ड वेरिफिकेशन का कार्य 30 सितंबर तक बढ़ाए जाने पर शिक्षा सचिव ने कड़ा ऐतराज जताया और बातचीत के बाद आदेश वापस लेने की बात कही।
  • नियमों के अनुसार शिक्षकों की ड्यूटी केवल कानून सम्मत कार्यों जैसे चुनाव, जनगणना और आपदा प्रबंधन में ही लगाई जा सकती है।
  • असाइनमेंट और ट्रेनिंग में शामिल न होने वाले शिक्षकों को नोटिस मिलने के बाद से शैक्षणिक गलियारों में प्रशासनिक मनमानी के खिलाफ नाराजगी बढ़ गई थी।

शिक्षकों की प्राथमिक जिम्मेदारी से खिलवाड़ पर शिक्षा विभाग की दो टूक

देशभर की शिक्षा व्यवस्था में अक्सर यह बहस का मुद्दा रहा है कि क्या शिक्षकों से शिक्षण कार्य के अलावा अन्य प्रशासनिक काम कराए जाने चाहिए या नहीं। हाल ही में एक नया मामला सामने आया है जहाँ जिला प्रशासन द्वारा शिक्षकों को राशन कार्ड वेरिफिकेशन जैसे गैर-शैक्षणिक कामों में झोंक दिए जाने के बाद शिक्षा विभाग ने बेहद सख्त रुख अख्तियार किया है। शिक्षा विभाग का मानना है कि इस तरह के कार्यों से स्कूलों में पढ़ाई का माहौल बिगड़ता है और इसका सीधा असर नौनिहालों के भविष्य पर पड़ता है।

विभाग के उच्चाधिकारियों का कहना है कि शिक्षक राष्ट्र निर्माता होते हैं और उनका प्राथमिक कर्तव्य क्लासरूम में खड़े होकर बच्चों को पढ़ाना है। यदि अध्यापकों को बार-बार सरकारी सर्वे, डेटा कलेक्शन और वेरिफिकेशन जैसे कामों में लगाया जाएगा, तो स्कूलों में पढ़ाई की गुणवत्ता पर गंभीर असर पड़ना स्वाभाविक है। इसी चिंता के चलते हाल ही में शिक्षा विभाग ने सभी जिलाधिकारियों को बाकायदा एक लिखित पत्र जारी कर यह हिदायत दी थी कि शिक्षकों को केवल चुनिंदा वैधानिक कार्यों के अलावा किसी और काम के लिए न बुलाया जाए।

तमाम स्पष्ट दिशा-निर्देशों के बावजूद जमीनी स्तर पर प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा इन नियमों की अनदेखी किए जाने के मामले सामने आते रहे हैं। ताजा घटनाक्रम में एक जिले के स्थानीय प्रशासन ने शिक्षकों पर से गैर-शैक्षणिक बोझ कम करने के बजाय उल्टे उनके वेरिफिकेशन के काम की समयसीमा बढ़ा दी, जिससे शिक्षा विभाग के भीतर हलचल तेज हो गई और उच्चाधिकारियों को सीधे दखल देना पड़ा।

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राशन कार्ड वेरिफिकेशन के काम में शिक्षकों को झोंकने का विवाद

पूरा मामला तब गरमाया जब स्थानीय जिला प्रशासन ने बड़ी संख्या में सरकारी शिक्षकों और लेक्चरर्स को नए राशन कार्ड के लिए आए आवेदनों की जांच और वेरिफिकेशन के काम में लगा दिया। शिक्षकों को जब यह जिम्मेदारी सौंपी गई तो उनके बीच असंतोष सुलगने लगा। अध्यापकों का तर्क था कि वे पहले से ही कई तरह के विभागीय और सरकारी Surveys जैसे स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) आदि में व्यस्त रहते हैं, ऐसे में उन्हें राशन कार्ड जैसी प्रशासनिक औपचारिकताओं में उलझाना उनके मूल कार्य के साथ न्याय नहीं है।

स्थिति तब और गंभीर हो गई जब इस वेरिफिकेशन कार्य से जुड़े एक अनिवार्य ट्रेनिंग सेशन में शामिल न होने वाले सैकड़ों शिक्षकों को प्रशासन की तरफ से नोटिस जारी कर दिए गए। नोटिस मिलने के बाद शिक्षकों में नाराजगी और अधिक बढ़ गई। शिक्षा जगत से जुड़े संगठनों और जानकारों का भी मानना है कि शिक्षकों को इस तरह के कार्यों में बाध्य करना न सिर्फ उनके मानसिक सुकून को प्रभावित करता है, बल्कि स्कूलों में बच्चों की उपस्थिति और सिलेबस पूरा करने की रफ्तार को भी बाधित करता है।

इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर इस पुरानी प्रशासनिक समस्या को उजागर कर दिया है कि आखिर क्यों जिला स्तर के अधिकारी शिक्षा विभाग के स्पष्ट आदेशों के बावजूद शिक्षकों को गैर-शैक्षणिक कार्यों में झोंकने से बाज नहीं आते हैं। जानकारों का कहना है कि जब तक जमीनी स्तर पर प्रशासनिक तालमेल बेहतर नहीं होगा, तब तक इस तरह की खींचतान बनी रहेगी।

शिक्षा सचिव का कड़ा हस्तक्षेप और आदेश वापस लेने की कवायद

जब लुधियाना जिला प्रशासन की तरफ से राशन कार्ड वेरिफिकेशन के काम की मियाद बढ़ाकर 30 सितंबर तक किए जाने का नया आदेश सामने आया, तो मामला तुरंत शिक्षा सचिवालय तक पहुंचा। स्थिति की गंभीरता को भांपते हुए शिक्षा सचिव सोनाली गिरी ने तुरंत इस मामले में संज्ञान लिया और संबंधित जिले के डिप्टी कमिश्नर से बातचीत की। शिक्षा सचिव के इस त्वरित हस्तक्षेप के बाद प्रशासन हरकत में आया और आदेश को वापस लेने की प्रक्रिया शुरू की गई।

विभाग की ओर से पूर्व में ही सभी जिलाधिकारियों को भेजे गए पत्र में यह बात बहुत साफ शब्दों में कही गई थी कि क्लासरूम की पढ़ाई को सुचारू रूप से चलाने के लिए जरूरी है कि अध्यापकों को प्रशासनिक और सर्वे संबंधी कार्यों से पूरी तरह मुक्त रखा जाए। विभाग ने अपने आदेश में इस बात पर भी जोर दिया था कि यदि किसी प्रशासनिक कार्य के लिए कर्मचारियों की आवश्यकता है, तो वहां नॉन-टीचिंग स्टाफ या अन्य प्रशासनिक अमले का उपयोग किया जाना चाहिए, न कि स्कूलों में पढ़ाने वाले शिक्षकों का।

"मैंने संबंधित जिले के डीसी से इस विषय पर विस्तार से बात की है और शिक्षकों को राशन कार्ड वेरिफिकेशन जैसे कामों में लगाने वाला यह आदेश तुरंत वापस ले लिया जाएगा। शिक्षकों का काम केवल पढ़ाना है।"— सोनाली गिरी, शिक्षा सचिव

अधिकारियों की तरफ से यह आश्वासन मिलने के बाद कि आदेश वापस ले लिया गया है, शिक्षकों ने कुछ हद तक राहत की सांस ली है। हालांकि, यह घटना इस बात का प्रमाण है कि प्रशासनिक स्तर पर आदेशों के पालन को लेकर अभी भी जमीनी स्तर पर कड़ाई बरती जाने की आवश्यकता है ताकि शिक्षकों को बार-बार अनावश्यक परेशानियों का सामना न करना पड़े।

नियमों की सीमाएं: किन कामों में लगाई जा सकती है शिक्षकों की ड्यूटी?

देश के कानूनी और प्रशासनिक ढांचे के तहत शिक्षकों की सेवाओं के उपयोग को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश तय किए गए हैं। शिक्षा विभाग के नियमों के अनुसार, शिक्षकों को केवल चुनिंदा और अत्यंत महत्वपूर्ण राष्ट्रीय कार्यों में ही प्रतिनियुक्त किया जा सकता है। इनमें मुख्य रूप से चुनाव से जुड़े चुनावी कार्य, हर दस साल पर होने वाली देशव्यापी जनगणना और किसी बड़ी प्राकृतिक आपदा के समय राहत एवं प्रबंधन कार्य शामिल हैं।

इन तीन श्रेणियों के अलावा यदि किसी अन्य कार्य के लिए शिक्षकों की सेवाएं ली जाती हैं, तो इसे विभागीय नियमों और बच्चों के शैक्षणिक अधिकारों का उल्लंघन माना जाता है। इसके बावजूद आए दिन स्थानीय स्तर पर प्रशासनिक अमला अपनी सुविधा के अनुसार शिक्षकों को बीएलओ ड्यूटी, सर्वे, राशन कार्ड, और विभिन्न प्रकार के डेटा वेरिफिकेशन जैसे कार्यों में लगा देता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जिला प्रशासन और शिक्षा विभाग के बीच बेहतर समन्वय स्थापित हो जाए, तो इस तरह की मनमानी पर आसानी से रोक लगाई जा सकती है।

राज्य के सरकारी स्कूलों में पहले से ही बुनियादी सुविधाओं और स्टाफ की कमी जैसी कई चुनौतियां बनी हुई हैं। ऐसे में यदि उपलब्ध शिक्षकों को भी पढ़ाने के बजाय अन्य विभागों के कागजी कामों में उलझा दिया जाएगा, तो सरकारी शिक्षा प्रणाली की स्थिति कैसे सुधरेगी, यह एक बड़ा सवाल है। अभिभावकों और शिक्षाविदों का भी यही मानना है कि बच्चों के उज्जवल भविष्य के लिए यह अत्यंत आवश्यक है कि शिक्षक अपनी पूरी ऊर्जा और समय केवल शिक्षण कार्य को ही दें।

निष्कर्ष: प्रशासनिक सुधार और भविष्य की राह

शिक्षकों को गैर-शैक्षणिक कामों में झोंकने का यह विवाद कोई नया नहीं है, लेकिन जिस तरह से शिक्षा विभाग के उच्च अधिकारियों ने इस बार त्वरित कदम उठाते हुए प्रशासनिक आदेशों को चुनौती दी है, वह एक सकारात्मक संकेत है। यह घटना इस बात की याद दिलाती है कि शिक्षा व्यवस्था को पटरी पर रखने के लिए शिक्षकों का क्लासरूम में होना सबसे ज्यादा जरूरी है।

आगामी समय में यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि जिला स्तर के प्रशासनिक अधिकारी मनमाने तरीके से शिक्षण कार्यों में खलल न डालें। जब तक शिक्षा विभाग के दिशा-निर्देशों का सख्ती से पालन नहीं होगा, तब तक इस तरह की अव्यवस्थाएं सामने आती रहेंगी। आम जनता और अभिभावक भी यही चाहते हैं कि सरकार ऐसे कड़े नियम बनाए जिससे शिक्षकों का पूरा ध्यान केवल और केवल बच्चों की पढ़ाई और उनके उज्ज्वल भविष्य को गढ़ने पर ही केंद्रित रहे।

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