पंजाब में शिक्षकों को थमाए गए नोटिस
पंजाब के सरकारी स्कूलों में पढ़ाने वाले शिक्षकों पर गैर-शैक्षणिक कार्यों का बोझ एक बार फिर बड़ा मुद्दा बन गया है। हाल ही में राज्य के कई जिलों में स्मार्ट राशन कार्ड के सत्यापन की ड्यूटी न करने वाले शिक्षकों को जिला प्रशासन की ओर से कड़े नोटिस जारी किए गए हैं। लुधियाना जिले में ही 31 सितंबर को आयोजित विशेष प्रशिक्षण शिविर में अनुपस्थित रहने वाले 314 शिक्षकों को कारण बताओ नोटिस दिए गए हैं। इसके अलावा बरनाला के भदौड़, तलवंडी, भोटना, तपा और बदरा जैसे इलाकों में भी शिक्षकों को इस तरह के नोटिस मिलने की पुष्टि हुई है।
शिक्षकों और उनके संगठनों का कहना है कि उन्हें पढ़ाने के अलावा ऐसे तमाम काम सौंपे जा रहे हैं जिनका शिक्षण कार्य से कोई दूर-दूर तक वास्ता नहीं है। प्रशासनिक अधिकारियों का रुख इन मामलों में सख्त नजर आ रहा है और तय समयसीमा के भीतर रिपोर्ट न देने पर कार्रवाई की चेतावनी दी जा रही है। इस स्थिति ने एक बार फिर स्कूल शिक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक प्राथमिकताओं के बीच चल रहे टकराव को सतह पर ला दिया है।
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क्या है शिक्षकों पर लटके नोटिस का पूरा मामला?
प्रशासनिक दस्तावेजों के अनुसार, तपा के एसडीएम कार्यालय द्वारा कुछ दिन पहले ही शिक्षकों को स्मार्ट राशन कार्ड के सत्यापन का काम सौंपा गया था। निर्देश दिए गए थे कि वे घर-घर जाकर डेटा सत्यापित करें और रिपोर्ट सौंपें। हालांकि, भारी व्यस्तता और पहले से मिले अन्य कामों के कारण शिक्षक इस निर्देश का पालन नहीं कर पाए। इसके बाद प्रशासन ने अनुशासनात्मक कार्रवाई का हवाला देते हुए नोटिस जारी कर दिए।
शिक्षकों का तर्क है कि उन्हें न तो इस कार्य के लिए कोई विशेष प्रशिक्षण दिया गया और न ही पर्याप्त संसाधन उपलब्ध कराए गए। इसके विपरीत, कुछ जिलों में शिक्षकों के प्रतिनिधिमंडलों ने जिला उपायुक्तों से मिलकर अपनी समस्याएं रखीं, जिसके बाद वहां कुछ राहत भी देखने को मिली। लेकिन कुल मिलाकर अधिकांश जिलों में स्थिति तनावपूर्ण बनी हुई है और शिक्षक असमंजस में हैं कि वे बच्चों को पढ़ाएं या सरकारी सर्वे और सत्यापन के काम पूरे करें।
पूरी सूची में शामिल हैं कौन-कौन से गैर-शैक्षणिक कार्य?
शिक्षकों का कहना है कि स्मार्ट राशन कार्ड सत्यापन कोई इकलौता काम नहीं है, बल्कि उन्हें साल भर दर्जनों ऐसे कामों में उलझा कर रखा जाता है। मौजूदा समय में शिक्षकों को जो अतिरिक्त जिम्मेदारियां सौंपी जा रही हैं, उनमें मुख्य रूप से निम्नलिखित कार्य शामिल हैं:
- विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआइआर) और बूथ लेवल अधिकारी (बीएलओ) से जुड़े चुनावी कार्य।
- सरकारी योजनाओं के तहत हेल्थ कार्ड बनाने और उनका वितरण करने का जिम्मा।
- गांवों और शहरी क्षेत्रों में होने वाले ड्रग सर्वे तथा जनगणना से जुड़े आंकड़े जुटाना।
- पराली जलाने की घटनाओं की निगरानी और रोकथाम के लिए बनाई गई कमेटियों में ड्यूटी।
- स्थानीय निकाय चुनाव तथा 'खेडा वतन पंजाब दियां' जैसे खेल आयोजनों का प्रबंधन।
इन अनगिनत कामों के चलते शिक्षकों के पास कक्षाओं में जाकर पढ़ाने के लिए बेहद कम समय बच रहा है, जिसका सीधा असर सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले गरीब बच्चों के भविष्य पर पड़ रहा है।
शिक्षा मंत्री की चिंता और खाली पड़े पदों का संकट
एक तरफ जहां प्रशासन शिक्षकों पर काम का दबाव बना रहा है, वहीं खुद शिक्षा विभाग के भीतर भी स्थिति चिंताजनक है। पिछले महीने ही राज्य के शिक्षा मंत्री हरजोत सिंह बैंस ने विधानसभा में एक लिखित आंकड़े पेश करते हुए स्वीकार किया था कि पंजाब के सरकारी स्कूलों में शिक्षकों के कुल 31,370 पद खाली पड़े हैं। यह संख्या राज्य में स्वीकृत कुल पदों का लगभग एक चौथाई है।
स्थिति यह है कि कई ग्रामीण स्कूलों में केवल एक या दो शिक्षक ही पूरी स्कूल की कमान संभाले हुए हैं। ऐसे में यदि उन शिक्षकों को भी प्रशासनिक कार्यों या सर्वे में लगा दिया जाए, तो स्कूल पूरी तरह से खाली हो जाते हैं। शिक्षा मंत्री ने खुद मुख्य सचिव को पत्र लिखकर संबंधित विभागों से यह आग्रह किया था कि शिक्षकों को इन तमाम गैर-शैक्षणिक कार्यों से स्थायी रूप से मुक्त किया जाए ताकि वे पूरी तरह से पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित कर सकें।
"राज्य में शिक्षकों के हजारों पद पहले से खाली पड़े हैं। ऊपर से शिक्षकों को बीएलओ, सर्वे और अब राशन कार्ड सत्यापन जैसे कामों में झोंका जा रहा है। सरकार की कथित 'शिक्षा क्रांति' केवल विज्ञापनों तक सीमित है, जमीन पर सरकारी स्कूल बदहाल हो रहे हैं।" — अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष
राजनीतिक पारा चढ़ा: विपक्ष ने सरकार को घेरा
शिक्षकों को नोटिस जारी होने का मामला सामने आते ही राजनीतिक सरगर्मी तेज हो गई है। पंजाब प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग ने सोशल मीडिया के जरिए आम आदमी पार्टी की सरकार पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने कहा कि सरकार के नुक्कड़ दावों और जमीनी हकीकत में जमीन-आसमान का फर्क है। वड़िंग ने सवाल उठाया कि जब स्कूलों में पढ़ाई के लिए पर्याप्त शिक्षक ही नहीं हैं, तो उन्हें प्रशासन के दूसरे कामों के लिए क्यों मजबूर किया जा रहा है?
विपक्ष का आरोप है कि सरकार अपनी प्रशासनिक विफलताओं को छिपाने के लिए शिक्षकों का इस्तेमाल कर रही है, जिससे शिक्षा का स्तर लगातार गिर रहा है। अभिभावक संघों ने भी इस पर चिंता जताई है और चेतावनी दी है कि यदि अध्यापकों को कक्षाओं से दूर रखा गया तो वे बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन करने के लिए बाध्य होंगे।
आगे क्या होगी राह? प्रशासनिक समन्वय की दरकार
इस पूरे विवाद के बीच शिक्षाविदों और प्रशासनिक जानकारों का मानना है कि जिला प्रशासन और शिक्षा विभाग के बीच बेहतर तालमेल की कमी के कारण यह स्थिति पैदा हुई है। यदि जिला प्रशासन को किसी सर्वे या सत्यापन के लिए कर्मचारियों की आवश्यकता है, तो राजस्व विभाग, नगर निगम या अन्य महकमों के कर्मचारियों की सेवाएं ली जानी चाहिए, न कि बच्चों का भविष्य गढ़ने वाले शिक्षकों की।
फिलहाल शिक्षक संघों ने साफ कर दिया है कि जब तक उच्च स्तर से लिखित आदेश जारी कर इन गैर-शैक्षणिक ड्यूटियों से पूरी तरह छूट नहीं दी जाती, तब तक उनका विरोध जारी रहेगा। आने वाले दिनों में सरकार और प्रशासन को इस पर कोई ठोस नीतिगत निर्णय लेना होगा, अन्यथा यह विवाद और तूल पकड़ सकता है।




