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कैंसर के इलाज के बाद हो रही है पेशाब-पॉटी पर नियंत्रण में दिक्कत? जानें क्या है कारण

कैंसर के इलाज में पेल्विक एरिया की रेडिएशन थेरेपी कई बार मरीजों के लिए बाद में समस्याएं खड़ी कर सकती है। इससे पेशाब और मल त्याग पर नियंत्रण रखने वाली मांसपेशियां कमजोर हो सकती हैं। आइए जानते हैं इसके लक्षण, कारण और बचाव के तरीके।
The Freelance ब्यूरो
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22 सितंबर 2026 • अपडेटेड
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कैंसर के इलाज के बाद हो रही है पेशाब-पॉटी पर नियंत्रण में दिक्कत? जानें क्या है कारण
📷 कैंसर के इलाज के बाद हो रही है पेशाब-पॉटी पर नियंत्रण में दिक्कत? जानें क्या है कारण — मुख्य घटनाक्रमफोटो साभार: रॉयटर्स / एजेंसीज़ / सोशल मीडिया

खबर की बड़ी बातें (Key Highlights)

  • पेल्विक एरिया में रेडिएशन थेरेपी के कारण पेशाब, मल और सेक्शुअल हेल्थ से जुड़ी समस्याएं हो सकती हैं।
  • नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट के मुताबिक, रेडिएशन के साइड इफेक्ट्स इलाज खत्म होने के महीनों या सालों बाद भी दिख सकते हैं।
  • लगातार लक्षण बने रहने पर यूरोडायनामिक स्टडी, अल्ट्रासाउंड या एमआरआई जैसी जांच की सलाह दी जाती है।

कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जंग जीतने के बाद मरीज की जिंदगी पटरी पर लौटने लगती है, लेकिन कई बार इलाज के दौरान या उसके बाद शरीर में कुछ ऐसे बदलाव नजर आते हैं जो लंबे समय तक परेशान कर सकते हैं। कैंसर के इलाज में सर्जरी, कीमोथेरेपी और रेडिएशन थेरेपी सबसे अहम और मुख्य चरण माने जाते हैं। इनमें से रेडिएशन थेरेपी ट्यूमर की कोशिकाओं को खत्म करने के लिए बेहद कारगर साबित होती है। हालांकि, कई मामलों में जब यह थेरेपी शरीर के निचले हिस्से यानी पेल्विक एरिया के आस-पास दी जाती है, तो इसका असर आसपास के स्वस्थ ऊतकों यानी हेल्दी टिशूज पर भी पड़ सकता है।

विशेषज्ञों के अनुसार, पेल्विक एरिया में रेडिएशन के प्रभाव से मरीजों को भविष्य में पेशाब, पॉटी यानी मल त्याग और सेक्शुअल हेल्थ से जुड़ी कई प्रकार की दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि, यह समस्या हर मरीज में हो, ऐसा बिल्कुल जरूरी नहीं है। यह पूरी तरह से इस बात पर निर्भर करता है कि रेडिएशन की खुराक कितनी थी, इलाज का दायरा कितना बड़ा था और मरीज की शारीरिक स्थिति कैसी है। इसके बावजूद, यदि इलाज के बाद शरीर में कोई भी नया या असामान्य बदलाव महसूस हो, तो उसे नजरअंदाज बिल्कुल नहीं करना चाहिए और तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।

पेल्विक फ्लोर की मांसपेशियां और रेडिएशन का असर

शरीर के निचले हिस्से में पेल्विक फ्लोर की मांसपेशियां बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। ये मांसपेशियां ब्लैडर यानी मूत्राशय, आंत और प्रजनन अंगों को सही स्थिति में सहारा देने के साथ-साथ पेशाब और मल पर नियंत्रण बनाए रखने में मदद करती हैं। जब कैंसर के इलाज के दौरान इस खास हिस्से में हाई-डोज रेडिएशन दी जाती है, तो यह कैंसर कोशिकाओं को नष्ट करने के साथ-साथ वहां मौजूद स्वस्थ कोशिकाओं को भी नुकसान पहुंचा सकती है।

इस प्रक्रिया के परिणामस्वरूप उस क्षेत्र में सूजन, फाइब्रोसिस यानी ऊतकों का सख्त होना और रक्त प्रवाह यानी ब्लड फ्लो कम होने जैसी समस्याएं पैदा हो सकती हैं। इन शारीरिक बदलावों के कारण पेल्विक डिस्फंक्शन होने का जोखिम काफी हद तक बढ़ जाता है। नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट (NCI) के आंकड़ों के मुताबिक, पेल्विक एरिया में दी जाने वाली रेडिएशन थेरेपी के साइड इफेक्ट्स तुरंत सामने नहीं आते, बल्कि ये इलाज समाप्त होने के कई महीनों या फिर कई सालों बाद भी उभर सकते हैं।

कैंसर के इलाज के बाद हो रही है पेशाब-पॉटी पर नियंत्रण में दिक्कत? जानें क्या है कारण
📷 कैंसर के इलाज के बाद शरीर में होने वाले बदलावों और उनकी जांच के बारे में जानकारी लेते डॉक्टर।
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किन लक्षणों को भूलकर भी न करें नजरअंदाज

पेल्विक फ्लोर से जुड़ी समस्याएं होने पर हर मरीज को अलग-अलग तरह के लक्षण महसूस हो सकते हैं। कुछ मरीजों को सिर्फ एक ही लक्षण लंबे समय तक परेशान कर सकता है, तो वहीं कुछ लोगों को एक साथ कई तरह की दिक्कतें घेर सकती हैं। इनमें पेशाब करने में कठिनाई, बार-बार पेशाब आना, पेशाब रोक न पाना, मल त्याग पर नियंत्रण कमजोर होना या आंतों की कार्यप्रणाली में बदलाव शामिल हैं।

"पेल्विक फ्लोर शरीर के निचले हिस्से में मौजूद होता है, जो ब्लैडर, आंत और रिप्रोडक्टिव अंगों के लिए जरूरी होता है। यही मांसपेशियां पेशाब और मल पर कंट्रोल बनाए रखने में मदद करती हैं। जब कैंसर के इलाज के दौरान पेल्विक एरिया में रेडिएशन थेरेपी दी जाती है, तो ये रेडिएशन कैंसर कोशिकाओं को खत्म करने के साथ-साथ हेल्दी टिश्यू को भी नुकसान पहुंचा सकती है।" — डॉ. मनदीप सिंह मल्होत्रा, ऑन्कोलॉजिस्ट

कई बार मरीज इन परेशानियों को सामान्य मानकर चुपचाप सहते रहते हैं। वे सोचते हैं कि यह कैंसर के इलाज के बाद की रिकवरी प्रक्रिया का हिस्सा है और समय के साथ अपने आप ठीक हो जाएगा। लेकिन डॉक्टरों का साफ कहना है कि यदि ये समस्याएं लंबे समय तक बनी रहें, तो इन्हें सामान्य रिकवरी मानकर अनदेखा करना भारी पड़ सकता है। ऐसे मामलों में समय पर डॉक्टर से मिलकर सटीक मेडिकल जांच कराना बेहद जरूरी हो जाता है ताकि स्थिति बिगड़ने से पहले ही नियंत्रण पाया जा सके।

कैसे की जाती है पेल्विक डिस्फंक्शन की जांच

जब कोई मरीज रेडिएशन थेरेपी के बाद पेल्विक या मूत्र संबंधी परेशानियों की शिकायत लेकर डॉक्टर के पास पहुंचता है, तो डॉक्टर सबसे पहले उसकी पूरी मेडिकल हिस्ट्री और इलाज के तरीकों की विस्तार से समीक्षा करते हैं। इसके बाद मरीज के लक्षणों के आधार पर पेल्विक फ्लोर की मांसपेशियों की कार्यप्रणाली की जांच की जाती है।

सटीक कारण का पता लगाने के लिए डॉक्टर कई तरह की आधुनिक जांचों की सलाह दे सकते हैं। इनमें यूरोडायनामिक स्टडी शामिल है, जो यह बताती है कि ब्लैडर कितनी अच्छी तरह पेशाब को स्टोर और रिलीज कर रहा है। इसके अलावा, स्थिति की गंभीरता को आंकने के लिए अल्ट्रासाउंड, पेल्विक एमआरआई या सिस्टोस्कोपी जैसी जांचें भी कराई जा सकती हैं। इन मेडिकल टेस्ट्स की रिपोर्ट के आधार पर ही डॉक्टर आगे की इलाज की रणनीति तय करते हैं, ताकि मरीज को जल्द से जल्द राहत दिलाई जा सके।

इलाज के विकल्प और बचाव के उपाय

पेल्विक फ्लोर डिस्फंक्शन का इलाज पूरी तरह से इस बात पर निर्भर करता है कि मरीज के लक्षण कितने गंभीर हैं और उसे किस तरह की परेशानी हो रही है। डॉक्टर लक्षणों की गंभीरता को देखते हुए दवाइयों, पेल्विक फ्लोर की विशेष एक्सरसाइज यानी कीगल एक्सरसाइज, या अन्य सपोर्टिव थेरेपी की सलाह दे सकते हैं। कुछ मामलों में फिजियोथेरेपिस्ट की मदद से मांसपेशियों को फिर से मजबूत करने के उपाय भी सिखाए जाते हैं।

विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि घबराने की कोई जरूरत नहीं है क्योंकि हर कैंसर मरीज को यह समस्या हो ही, यह आवश्यक नहीं है। यह सब कुछ मरीज के स्वास्थ्य, कैंसर के प्रकार और दी गई थेरेपी के तरीकों पर निर्भर करता है। सबसे जरूरी संदेश यही है कि कैंसर का इलाज बेहद सफलतापूर्वक पूरा करें और यदि उसके बाद शरीर में कोई भी नया बदलाव महसूस हो, तो बिना किसी झिझक के डॉक्टर से खुलकर बात करें और समय पर सही इलाज लें।

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