सिनेमाघरों में रिलीज हुई रामायण पर छिड़ा नया विवाद
भारतीय पौराणिक कथाओं पर आधारित फिल्मों का क्रेज दर्शकों के बीच हमेशा से ही काफी ज्यादा रहा है। जब भी किसी बड़े बजट या ऐतिहासिक कथा पर आधारित फिल्म पर्दे पर आती है, तो दर्शकों की निगाहें उसके हर एक दृश्य, वीएफएक्स और किरदारों के पहनावे पर टिक जाती हैं। हाल ही में सिनेमाघरों में उतरी फिल्म 'महाकाव्य श्री रामायण कथा – श्री राम की' ने भी रिलीज के साथ ही दर्शकों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। 25 सितंबर को बड़े पर्दे पर आई यह फिल्म इन दिनों अपनी कहानी के साथ-साथ सोशल मीडिया पर चल रही एक खास चर्चा को लेकर सुर्खियों में बनी हुई है।
फिल्म के रिलीज होने के कुछ ही दिनों बाद इंटरनेट पर इसके कई वीडियो क्लिप और तस्वीरें वायरल होने लगीं। इन वायरल सामग्रियों के बीच एक ऐसी तस्वीर सामने आई जिसने देखते ही देखते सोशल मीडिया यूजर्स का ध्यान खींच लिया। इस तस्वीर में रामायण की प्रसिद्ध वानर सेना के बीच एक ऐसा पात्र नजर आ रहा है जिसने चेहरे पर आधुनिक चश्मा पहन रखा है। इस दृश्य के सामने आते ही सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर मीम्स की बाढ़ आ गई और लोगों ने फिल्म के निर्माण की गुणवत्ता और वीएफएक्स पर तरह-तरह के सवाल उठाने शुरू कर दिए।
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वायरल तस्वीर पर मेकर्स ने तोड़ी चुप्पी और दी खुली चुनौती
सोशल मीडिया पर लगातार हो रही ट्रोलिंग और तीखी आलोचनाओं के बाद अब फिल्म के निर्माताओं ने इस पूरे मामले पर अपनी चुप्पी तोड़ दी है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, फिल्म की टीम ने स्पष्ट किया है कि इंटरनेट पर जिस तस्वीर को फिल्म का दृश्य बताकर शेयर किया जा रहा है, वह असल में फिल्म के अंदर का फ्रेम है ही नहीं। निर्माताओं का कहना है कि यह तस्वीर किसी थियेट्रिकल सीन का हिस्सा न होकर एक प्रमोशनल आर्टवर्क या पोस्टर का हिस्सा है, जिसे गलत संदर्भ में पेश किया जा रहा है।
इस मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए फिल्म मेकर्स ने उन लोगों को खुली चुनौती दी है जो इस तस्वीर के जरिए फिल्म की आलोचना कर रहे हैं। निर्माताओं का साफ कहना है कि अगर यह दृश्य सचमुच फिल्म का हिस्सा है, तो आलोचकों को सिनेमाघर के अंदर का असली स्क्रीनशॉट या फिर फिल्म का वह विशेष टाइम-कोड साझा करना चाहिए जहां किसी वानर को चश्मा पहने देखा गया हो। टीम का मानना है कि प्रमोशनल सामग्री को जानबूझकर फिल्म के असली दृश्य के तौर पर पेश करना पूरी तरह से भ्रामक और गलत है।
निर्माताओं का दो टूक बयान: 'फिल्म देखें फिर करें फैसला'
फिल्म के निर्देशक अभिषेक सिंह ने इस पूरे विवाद पर खुलकर अपनी बात रखी है। उनका कहना है कि वे किसी भी तरह की रचनात्मक आलोचना के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन आलोचना का आधार निष्पक्ष और वास्तविक होना चाहिए। उन्होंने माना कि हर दर्शक की पसंद और राय अलग हो सकती है, और किसी भी फिल्ममेकर को जनता की प्रतिक्रिया का सम्मान करना चाहिए, बशर्ते वह प्रतिक्रिया फिल्म के वास्तविक कंटेंट पर आधारित हो।
"आलोचना फिल्ममेकिंग का एक जरूरी हिस्सा है। हमारी फिल्म से जुड़ा कोई भी व्यक्ति यह उम्मीद नहीं करता कि हर किसी की राय एक जैसी हो। लेकिन आलोचना उस फिल्म के बारे में होनी चाहिए जो लोगों ने वाकई देखी है, न कि भ्रामक एडिटेड तस्वीरों के आधार पर। हमारी विनती बहुत साधारण है: पहले फिल्म पूरी देखें, फिर हमें जज करें।" — अभिषेक सिंह, निर्देशक
निदेशकों और निर्माताओं का यह भी कहना है कि वे जल्द ही थिएट्रिकल वर्जन की कुछ और फुटेज वायरल दावों के साथ साझा करेंगे, ताकि आम दर्शक खुद समझ सकें कि ऑनलाइन फैलाई जा रही तस्वीरों और सिनेमाघरों में दिखाई जा रही असली फिल्म में कितना बड़ा अंतर है। उनका मकसद सिर्फ इतना है कि दर्शकों के सामने पूरी और सच्ची तस्वीर आए।
लीड एक्ट्रेस अंजलि अरोड़ा की कास्टिंग और आलोचना पर प्रतिक्रिया
इस फिल्म में माता सीता की भूमिका निभा रहीं अभिनेत्री अंजलि अरोड़ा को लेकर भी रिलीज से पहले और बाद में सोशल मीडिया पर काफी चर्चाएं देखने को मिली हैं। अंजलि ने अपनी कास्टिंग को लेकर हो रही आलोचनाओं का करारा और सधा हुआ जवाब दिया है। उनका कहना है कि कुछ लोगों ने उनके पर्दे पर आने से पहले ही उनके पिछले काम और सोशल मीडिया करियर को आधार बनाकर उनके किरदार के बारे में राय कायम कर ली थी।
अंजलि ने एक इंटरव्यू में कहा कि उन्होंने हमेशा दर्शकों से यही अनुरोध किया है कि वे उनके व्यक्तिगत जीवन या पिछले सफर के आधार पर माता सीता जैसे पवित्र किरदार को न तौलें। उन्होंने कहा, "जिस दिन मेरी कास्टिंग का ऐलान हुआ था, उसी दिन से कुछ लोगों ने यह तय कर लिया था कि मेरा अभिनय कैसा होगा, जबकि उन्होंने मेरा एक भी सीन नहीं देखा था। आप फिल्म देखिए और अगर पूरा नाटक देखने के बाद भी आपको लगे कि मैंने इस किरदार के साथ न्याय नहीं किया है, तो मैं आपकी हर बात का स्वागत करूंगी।"
पारिवारिक दर्शकों से मिल रही सकारात्मक प्रतिक्रिया
तमाम तरह के सोशल मीडिया विवादों और मीम्स के बीच फिल्म के लिए एक सकारात्मक पहलू यह भी सामने आ रहा है कि सिनेमाघरों में परिवार और बच्चे बड़ी संख्या में पहुंच रहे हैं। अंजलि अरोड़ा का मानना है कि इस तरह की पौराणिक फिल्मों का सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि परिवार एक बार फिर साथ बैठकर सिनेमा हॉल का रुख कर रहे हैं। बच्चे रामायण के इतिहास और पात्रों को लेकर अपने माता-पिता से सवाल पूछ रहे हैं और पुरानी संस्कृति पर चर्चा कर रहे हैं।
फिल्म की टीम का कहना है कि सोशल मीडिया की इन छोटी-मोटी और भ्रामक ट्रोलिंग से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण वह पारिवारिक माहौल है जो थिएटर के बाहर देखने को मिल रहा है। जब युवा पीढ़ी अपनी जड़ों और महाकाव्यों के प्रति उत्सुकता दिखाती है, तो एक कलाकार और फिल्म निर्माता के रूप में उनकी मेहनत सफल हो जाती है। अंततः जनता का फैसला ही किसी भी फिल्म का भविष्य तय करता है और मेकर्स को उम्मीद है कि दर्शक सच्चाई जानकर फिल्म को सही नजरिए से देखेंगे।








