क्रेडिट-डिपॉजिट अनुपात को लेकर फैली शंकाओं पर आरबीआई का स्पष्टीकरण
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने हाल ही में जारी अपने मासिक बुलेटिन में बैंकिंग सेक्टर से जुड़े एक अहम मुद्दे पर स्थिति साफ की है। अक्सर यह माना जाता है कि बैंकों का ऊंचा क्रेडिट-डिपॉजिट (सीडी) अनुपात यानी ऋण-जमा अनुपात उनके लिए किसी बड़े खतरे या वित्तीय कमजोरी का संकेत है। हालांकि, केंद्रीय बैंक के कर्मचारियों द्वारा तैयार की गई इस रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि अधिक सीडी अनुपात अपने आप में बैंकों की ऋण देने की क्षमता या वित्तीय सहायता में किसी प्रकार की बाधा उत्पन्न नहीं करता है। रिपोर्ट में यह भी स्पष्ट किया गया है कि इसमें व्यक्त की गई राय लेखकों की अपनी है और इसे सीधे तौर पर आरबीआई की आधिकारिक नीति के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
मौजूदा आर्थिक परिदृश्य में, जैसे-जैसे देश की अर्थव्यवस्था तेजी से आगे बढ़ रही है, बैंकिंग प्रणाली में भी कर्ज की मांग लगातार मजबूत बनी हुई है। पिछले कुछ वर्षों के आंकड़ों पर नजर डालें तो देश के अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों का यह अनुपात सितंबर 2021 में महज 68.6 प्रतिशत पर था, जो बढ़कर मार्च 2026 में 82.2 प्रतिशत के स्तर तक पहुंच गया। इस बढ़ोतरी को लेकर वित्तीय बाजार में कई तरह की चर्चाएं चल रही थीं, लेकिन आरबीआई की इस ताजा रिपोर्ट ने साफ कर दिया है कि यह स्थिति किसी संकट का नहीं, बल्कि आर्थिक गतिविधियों के विस्तार का परिणाम है।
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आखिर क्या होता है क्रेडिट-डिपॉजिट अनुपात और क्यों बढ़ रहा है यह?
आम भाषा में समझें तो क्रेडिट-डिपॉजिट अनुपात यह मापने का एक पैमाना है कि बैंक अपने पास जमा कुल राशि का कितना हिस्सा ग्राहकों को कर्ज के रूप में दे रहे हैं। उदाहरण के तौर पर, यदि किसी बैंक के पास ग्राहकों की 100 रुपये की जमा पूंजी है और उसने बाजार में 80 रुपये का कर्ज बांट रखा है, तो उसका सीडी अनुपात 80 प्रतिशत माना जाएगा। जब यह अनुपात 80 प्रतिशत या उससे ऊपर जाता है, तो वित्तीय जानकारों की नजरें इस बात पर टिक जाती हैं कि क्या बैंक अपनी क्षमता से ज्यादा जोखिम ले रहे हैं।
आरबीआई की रिपोर्ट के अनुसार, पिछले कुछ समय से देश में बैंक कर्ज की मांग में जबरदस्त तेजी आई है और कर्ज के बढ़ने की रफ्तार जमा राशि जुटाने की रफ्तार से आगे निकल गई है। इसी वजह से कुल सीडी अनुपात में यह उछाल देखने को मिला है। हालांकि, केंद्रीय बैंक का मानना है कि केवल इस अनुपात को देखकर यह निष्कर्ष निकाल लेना सही नहीं होगा कि बैंकिंग व्यवस्था में पैसे की कमी हो गई है या बैंक किसी प्रकार के बड़े जोखिम में हैं। बढ़ती अर्थव्यवस्था और लाभदायक बैंकिंग प्रणाली के साथ इस तरह के आंकड़े मेल खाते हैं।
बैंकिंग प्रणाली में कैसे काम करती है ऋण सृजन की प्रक्रिया?
एक आम सवाल यह उठता है कि यदि बैंक के पास पर्याप्त जमा राशि नहीं है, तो वे लगातार बड़े पैमाने पर कर्ज कैसे बांट पा रहे हैं। इस विषय पर आरबीआई की रिपोर्ट ने बैंकिंग प्रणाली के एक बुनियादी पहलू को रेखांकित किया है। जब बैंक ग्राहकों को कर्ज देते हैं या विभिन्न वित्तीय परिसंपत्तियों में निवेश करते हैं, तो उसी पूरी प्रक्रिया के दौरान सिस्टम में नई जमा रकम का भी सृजन होता है। इसका मतलब यह है कि हर बार कर्ज देने के लिए यह जरूरी नहीं है कि बैंक को पहले से ही उतनी ही भारी-भरकम जमा राशि का इंतजार करना पड़े।
यही वजह है कि जमा राशि अपने आप में ऋण सृजन के लिए कोई कड़ी या बाध्यकारी बाधा नहीं बनती है। हालांकि, रिपोर्ट में यह भी चेतावनी दी गई है कि भले ही सीडी अनुपात सीधे तौर पर कोई कमजोरी न दर्शाता हो, लेकिन अधिक अनुपात वाले दौर में मुनाफे को लेकर चिंताएं और नियामक स्तर पर बरती जाने वाली सावधानियां मार्जिन पर असर जरूर डाल सकती हैं। बैंकों को यह सुनिश्चित करना होता है कि वे तेज गति से कर्ज बांटने के साथ-साथ अपनी परिसंपत्तियों की गुणवत्ता और तरलता दोनों को बेहतर ढंग से संतुलित रखें।
HDFC बैंक के विलय का अनुभव और बाजार पर इसका असर
हाल के वर्षों में निजी क्षेत्र के दिग्गज संस्थान एचडीएफसी बैंक (HDFC Bank) के हाउसिंग डेवलपमेंट फाइनैंस कॉर्पोरेशन के साथ हुए बहुचर्चित विलय के बाद सीडी अनुपात का मुद्दा और ज्यादा सुर्खियों में आ गया था। इस बड़े विलय से पहले बैंक का ऋण-जमा अनुपात लगभग 85 प्रतिशत के आसपास चल रहा था, जो विलय की प्रक्रिया पूरी होने के बाद बढ़कर सीधे करीब 110 प्रतिशत के ऊंचे स्तर पर पहुंच गया था। इसके बाद बैंक प्रबंधन ने अपनी रणनीति में बदलाव किया और अग्रिम ऋण बांटने की तुलना में डिपॉजिट यानी जमा राशि को तेजी से बढ़ाने पर अपना पूरा ध्यान केंद्रित किया।
इस सुनियोजित रणनीति का परिणाम यह रहा कि बैंक ने तय समय के भीतर अपने इस अनुपात को सफलतापूर्वक नियंत्रित किया और मार्च 2025 तक इसे घटाकर 96 प्रतिशत के स्तर पर ले आए। इस उदाहरण से यह बात साबित होती है कि वित्तीय संस्थान बाजार की बदलती परिस्थितियों और ऊंचे सीडी अनुपात से निपटने के लिए पूरी तरह सक्षम होते हैं और समय रहते आवश्यक कदम उठाकर संतुलन कायम कर लेते हैं।
दीर्घकालिक दृष्टिकोण और वित्तीय स्थिरता की असल तस्वीर
विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय बैंकिंग सेक्टर वर्तमान में काफी मजबूत स्थिति में है और पूंजी पर्याप्तता के मामले में भी बैंक सुरक्षित दायरे में काम कर रहे हैं। हालांकि सीडी अनुपात का बढ़ना इस बात का संकेत है कि देश में निवेश और उपभोग के लिए ऋण की मांग लगातार बनी हुई है, जो कि एक बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था के लिए सकारात्मक संकेत है। बैंक अपने स्तर पर जोखिम प्रबंधन को मजबूत रखते हुए आगे बढ़ रहे हैं।
"हालांकि सीडी अनुपात खासा ध्यान आकर्षित करता है, लेकिन यह अनुपात अकेले ही वित्तीय सहायता की असल स्थिति को नहीं दिखाता है। अधिक सीडी अनुपात वाले चरण के दौरान मुनाफे की चिंताएं और सावधानी वाले नियम मार्जिन पर क्रेडिट बनाने की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकते हैं।" — आरबीआई बुलेटिन रिपोर्ट
कुल मिलाकर, केंद्रीय बैंक का यह विश्लेषण स्पष्ट करता है कि निवेशकों और आम ग्राहकों को केवल सीडी अनुपात के आंकड़ों को देखकर घबराने की आवश्यकता नहीं है। भारतीय बैंकिंग प्रणाली पर्याप्त सुरक्षा उपायों के साथ आगे बढ़ रही है और अर्थव्यवस्था को गति देने में अपनी भूमिका निभा रही है।








