भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति बैठक पर टिकी देश भर की निगाहें
देशभर के करोड़ों कर्जदारों और आम नागरिकों की निगाहें इस समय भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की ओर टिकी हुई हैं। केंद्रीय बैंक की मौद्रिक नीति समिति (MPC) की तीन दिवसीय महत्वपूर्ण बैठक सोमवार से आरंभ हो चुकी है। इस उच्चस्तरीय बैठक में अर्थव्यवस्था के मौजूदा हालातों, खुदरा महंगाई के आंकड़ों और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं पर विस्तार से मंथन किया जा रहा है। पिछले कुछ महीनों से देश में महंगाई दर जिस प्रकार रिजर्व बैंक के निर्धारित आरामदायक दायरे से ऊपर बनी हुई है, उसने नीति निर्माताओं के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं।
आर्थिक जानकारों और बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि यदि महंगाई पर लगाम कसने के लिए केंद्रीय बैंक ने सख्त कदम उठाए, तो करीब चार साल के लंबे अंतराल के बाद देश में ब्याज दरों का दौर बदल सकता है। फरवरी 2023 के बाद से केंद्रीय बैंक ने रेपो रेट में कोई बढ़ोतरी नहीं की है, लेकिन वर्तमान परिस्थितियां कुछ और ही संकेत दे रही हैं। इस बैठक के परिणाम 7 अक्टूबर को आधिकारिक रूप से घोषित किए जाएंगे, जिसके बाद ही तस्वीर पूरी तरह साफ हो पाएगी कि आम जनता को राहत मिलेगी या फिर वित्तीय मोर्चे पर बड़ा झटका लगेगा।
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महंगाई का बढ़ता दबाव बना केंद्रीय बैंक के लिए सबसे बड़ी चुनौती
भारतीय रिजर्व बैंक के लिए मुद्रास्फीति यानी खुदरा महंगाई इस समय सबसे बड़ी और गंभीर चुनौती बनी हुई है। हाल ही में जारी किए गए आंकड़ों के मुताबिक, देश की खुदरा महंगाई दर लगातार केंद्रीय बैंक के चार प्रतिशत के लक्ष्य से ऊपर बनी हुई है। खाद्य पदार्थों की कीमतों में उतार-चढ़ाव और वैश्विक स्तर पर ऊर्जा के महंगे दामों ने घरेलू बाजार को प्रभावित किया है। अर्थशास्त्रियों का कहना है कि महंगाई का यह दबाव केवल कुछ खास क्षेत्रों तक सीमित नहीं है, बल्कि अर्थव्यवस्था के अन्य हिस्सों में भी इसका असर दिखाई दे रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक महंगाई काबू में नहीं आती, तब तक रिजर्व बैंक के पास मौद्रिक मोर्चे पर ढील देने का कोई खास विकल्प नहीं बचेगा। अंतरराष्ट्रीय वित्तीय एजेंसियों और देश के प्रमुख बैंकों के शोध संस्थानों ने भी अपनी रिपोर्टों में इसी बात की ओर इशारा किया है कि केंद्रीय बैंक इस बार नीतिगत दरों को लेकर सख्त रुख अपना सकता है। बढ़ती कमोडिटी कीमतें और सप्लाई चेन में आने वाली रुकावटें भी नीति निर्माताओं के सामने एक कठिन परीक्षा पेश कर रही हैं, जिससे पार पाने के लिए ब्याज दरों में फेरबदल की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है।
प्रमुख वित्तीय संस्थानों और अर्थशास्त्रियों के क्या हैं अनुमान?
देश और दुनिया के तमाम बड़े ब्रोकरेज हाउस तथा वित्तीय संस्थानों ने आरबीआई की इस बैठक को लेकर अपने अलग-अलग आकलन पेश किए हैं। प्रतिष्ठित वैश्विक एजेंसी रॉयटर्स द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण में शामिल करीब 60 प्रतिशत अर्थशास्त्रियों ने यह अनुमान जताया है कि केंद्रीय बैंक इस बार की बैठक में नीतिगत रेपो रेट में 25 बेसिस पॉइंट्स की बढ़ोतरी कर सकता है। अगर ऐसा होता है तो वर्तमान रेपो रेट जो 5.25 प्रतिशत पर है, वह बढ़कर 5.50 प्रतिशत तक पहुंच जाएगी।
इसके अलावा, जापानी ब्रोकरेज फर्म नोमुरा का मानना है कि रिजर्व बैंक केवल अक्टूबर ही नहीं, बल्कि आने वाली अन्य बैठकों में भी दरों में बढ़ोतरी का सिलसिला जारी रख सकता है। इसी तरह यूनियन बैंक ऑफ इंडिया की एक शोध रिपोर्ट में यह आशंका जताई गई है कि चालू वित्त वर्ष के दौरान रेपो रेट छह प्रतिशत तक के स्तर को छू सकती है। बैंक ऑफ अमेरिका और मॉर्गन स्टेनली जैसे दिग्गज संस्थानों का अनुमान इससे भी अधिक आक्रामक है, जिनके मुताबिक आने वाले महीनों में कुल मिलाकर 100 बेसिस पॉइंट्स तक की बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है।
आपकी जेब और मासिक ईएमआई पर कितना पड़ेगा सीधा असर?
ब्याज दरों में संभावित बढ़ोतरी का सबसे त्वरित और प्रत्यक्ष प्रभाव आम आदमी की मासिक ईएमआई (EMI) पर पड़ेगा। जिन लोगों ने अपने सपनों का आशियाना खरीदने के लिए होम लोन ले रखा है या फिर वाहन खरीदने के वास्ते कार लोन लिया है, उनके बजट पर इसका भारी असर पड़ना तय है। अधिकांश खुदरा ऋण फ्लोटिंग ब्याज दरों पर आधारित होते हैं, जिसका अर्थ है कि रेपो रेट में बदलाव होते ही बैंकों द्वारा ब्याज दरें स्वतः बढ़ा दी जाती हैं।
उदाहरण के तौर पर, यदि किसी ग्राहक ने बीस वर्ष की अवधि के लिए पचास लाख रुपये का होम लोन लिया हुआ है और उसकी मौजूदा ब्याज दर 8.50 प्रतिशत से बढ़कर 8.75 प्रतिशत हो जाती है, तो उसकी मासिक ईएमआई लगभग आठ सौ रुपये तक बढ़ जाएगी। यदि आने वाले समय में विभिन्न चरणों में कुल मिलाकर एक प्रतिशत यानी 100 बेसिस पॉइंट्स की बढ़ोतरी होती है, तो यही अतिरिक्त बोझ तीन हजार रुपये प्रति माह से भी अधिक हो सकता है।
"देश में बढ़ती खुदरा महंगाई और कच्चे तेल के वैश्विक दामों में उतार-चढ़ाव ने भारतीय रिजर्व बैंक के सामने कठिन परिस्थितियां खड़ी कर दी हैं। यदि केंद्रीय बैंक महंगाई को नियंत्रित करने को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता बनाता है, तो आने वाले महीनों में उधार लेना महंगा होना लगभग तय है, जिसका सीधा असर आम मध्यमवर्गीय परिवारों के घरेलू बजट पर पड़ेगा।"— वरिष्ठ आर्थिक विश्लेषक, द फ्रीलांस रिसर्च विंग
ब्याज दरें बढ़ने से पहले कर्जदारों के लिए क्या है समझदारी?
वित्तीय मामलों के जानकारों का सुझाव है कि ऐसी संभावित आर्थिक परिस्थितियों में आम नागरिकों और कर्जदारों को बेहद सावधानी के साथ अपने वित्तीय निर्णय लेने चाहिए। जिन लोगों पर पहले से ही भारी-भरकम कर्ज का बोझ है, उन्हें अपने मासिक खर्चों को संतुलित करते हुए किसी भी तरह के अतिरिक्त और अनावश्यक कर्ज से बचना चाहिए। इसके अलावा, यदि संभव हो तो अपने मौजूदा ऋणों के पुनर्भुगतान या आंशिक पूर्व-भुगतान (Pre-payment) के विकल्पों पर भी विचार करना चाहिए ताकि भविष्य में बढ़ने वाले ब्याज के बोझ को कुछ हद तक कम किया जा सके।
आरबीआई की इस आगामी घोषणा से पहले बाजार में असमंजस की स्थिति बनी हुई है, लेकिन एक बात पूरी तरह स्पष्ट है कि यदि केंद्रीय बैंक सख्त रुख अपनाता है, तो देश के वित्तीय बाजार और बैंकिंग सेक्टर में इसका असर लंबे समय तक महसूस किया जाएगा। आम जनता को अब केवल सात अक्टूबर का इंतजार है, जब रिजर्व बैंक के गवर्नर इस बहुप्रतीक्षित मौद्रिक नीति समीक्षा के आधिकारिक नतीजों की घोषणा करेंगे और देश की आर्थिक दिशा का नया खाका सबके सामने रखेंगे।





