गया की गलियों में छाया बॉलीवुड का ग्लैमर, सादगी से जीता सबका दिल
फिल्म जगत की जानी-मानी अभिनेत्री स्नेहा उल्लाल ने अपने एक नए और अनोखे अंदाज से सबका ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। हिंदी सिनेमा में अपनी पहली फिल्म के जरिए घर-घर में अपनी पहचान बनाने वाली यह अदाकारा इन दिनों एक नए प्रोजेक्ट के सिलसिले में बिहार के दौरे पर हैं। उनकी मौजूदगी ने स्थानीय लोगों में भारी उत्सुकता और उत्साह पैदा कर दिया है। ग्रामीण परिवेश पर आधारित इस फिल्म की शूटिंग के दौरान स्नेहा का जो रूप देखने को मिला, उसने साबित कर दिया कि पर्दे के पीछे कलाकार आम इंसान की तरह ही जमीन से जुड़े होते हैं।
गया जिले के मानपुर और उसके आसपास के ग्रामीण इलाकों में इन दिनों भारी हलचल है। यहां फिल्म 'अर्धनायक' के सेट पर हर दिन दर्शकों की भीड़ जुट रही है। इस फिल्म की कहानी पचास के दशक के ग्रामीण भारत के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसमें उस दौर के सामाजिक ताने-बाने, पानी की किल्लत और विलुप्त होती लोक कलाओं को पर्दे पर उतारने की कोशिश की जा रही है। ऐसे में सेट का माहौल भी पूरी तरह से पारंपरिक रखा गया है, जिसमें ढलने के लिए कलाकारों ने भी अपनी जीवनशैली में बदलाव किया है।
शूटिंग के दौरान अभिनेत्री का स्थानीय लोगों के साथ घुलना-मिलना चर्चा का विषय बन गया है। सोशल मीडिया पर उनकी कुछ तस्वीरें तेजी से वायरल हो रही हैं, जिनमें वह पूरी तरह एक बिहारी बहू या ग्रामीण महिला के गेटअप में नजर आ रही हैं। उन्होंने न सिर्फ पारंपरिक सूती साड़ी पहनी है, बल्कि माथे पर बड़ी सी बिंदी और चोटी के साथ अपने लुक को पूरी तरह देसी बनाया है। उनकी इस सादगी को देखकर वहां मौजूद हर शख्स उनकी तारीफ कर रहा है।
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महादलित टोले की महिलाओं के साथ बिताया खास वक्त
फिल्मी सेट से दूर जब भी वक्त मिलता है, स्नेहा उल्लाल शूटिंग लोकेशन के पास स्थित महादलित टोले की ओर रुख करती हैं। वहां की महिलाओं के साथ उनका दोस्ताना रवैया किसी को भी हैरान कर सकता है। बिना किसी स्टारडम के अहंकार के, वह सीधे जमीन पर चटाई या बोरी बिछाकर गांव की महिलाओं के पास बैठ जाती हैं। उनके साथ घंटे-घंटेभर बातें करना, उनकी घरेलू समस्याओं को सुनना और उनके दैनिक जीवन के तौर-तरीकों को समझना अभिनेत्री के लिए एक नया अनुभव रहा है।
स्थानीय महिलाओं के साथ बातचीत के दौरान अभिनेत्री ने कई दिलचस्प बातें साझा कीं। उन्होंने बताया कि किस तरह बिहार के गांवों की संस्कृति और यहां के लोगों का खुलापन उन्हें भीतर तक छू गया है। बातचीत के दौरान एक हल्का-फुल्का लम्हा तब आया जब उन्होंने महिलाओं से कहा कि उन्हें अपने यहां पाले जाने वाले बकरियों के बच्चों का नाम भी रखना चाहिए, जिस पर वहां मौजूद सभी महिलाएं खिलखिलाकर हंस पड़ीं। इस तरह के छोटे-छोटे पल सेट पर काम करने वाले लोगों के बीच एक गहरा भावनात्मक रिश्ता बना रहे हैं।
अभिनेत्री ने मीडिया और स्थानीय लोगों से बातचीत में अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि यहां के लोगों के दिल बहुत बड़े और नरम हैं। उन्होंने स्वीकार किया कि शुरुआत में उन्हें लगा था कि शायद वह अजनबी माहौल में खुद को असहज महसूस करेंगी, लेकिन यहां के निवासियों ने उन्हें जिस तरह का अपनापन दिया, उसने सारे फासले मिटा दिए।
जानवरों के प्रति प्रेम और गांव के बच्चों के साथ मस्ती
केवल महिलाओं तक ही नहीं, बल्कि ग्रामीण परिवेश के अन्य पहलुओं से भी स्नेहा का जुड़ाव देखने को मिल रहा है। चूंकि उन्हें जानवरों से बेहद लगाव है, इसलिए शूटिंग के खाली समय में वह अक्सर गाय और बकरी के छोटे-छोटे बच्चों के साथ खेलते हुए वक्त बिताती हैं। धूल-मिट्टी से सरे इस प्राकृतिक माहौल में उनका यह बालसुलभ अंदाज सेट पर मौजूद क्रू मेंबर के चेहरों पर भी मुस्कान ले आता है।
गया में चल रही इस फिल्म की शूटिंग के पीछे एक मजबूत रचनात्मक टीम काम कर रही है। फिल्म के निर्देशक अंजनी कुमार हैं, जबकि इसके निर्माता डी. आलिया हैं। इसके अलावा, हिंदी सिनेमा और साहित्य जगत के दिग्गज लेखक शैवाल भी इस प्रोजेक्ट से जुड़े हुए हैं, जो अस्सी की उम्र में एक बार फिर इस फिल्म के जरिए सक्रिय हुए हैं। उनका मानना है कि यह फिल्म बिहार की समृद्ध संस्कृति और कला को वैश्विक स्तर पर एक नई पहचान दिलाएगी।
फिल्म की स्टारकास्ट में स्नेहा उल्लाल के अलावा पुष्यमित्र, लोकप्रिय धारावाहिक 'भाभी जी घर पर हैं' फेम अनूप कुमार सिंह और जाने-माने अभिनेता राजेश कुमार भी अहम भूमिकाओं में नजर आएंगे। इन सभी कलाकारों की मौजूदगी से इस ग्रामीण पृष्ठभूमि पर आधारित फिल्म का वजन काफी बढ़ गया है। ग्रामीण कलाओं के क्षरण और जल संकट जैसे गंभीर मुद्दों को छूने वाली यह कहानी दर्शकों के दिलों पर गहरी छाप छोड़ने के लिए तैयार हो रही है।
बिहार को लेकर बदली धारणा, कहा- यहां के लोग बेहद नरम दिल हैं
अपनी इस यात्रा के बारे में बात करते हुए अभिनेत्री ने कहा कि हालांकि वह पहले भी काम के सिलसिले में पटना आ चुकी हैं, लेकिन गया के ग्रामीण अंचल में शूटिंग करने का यह उनका पहला और सबसे यादगार अनुभव रहा है। उन्होंने माना कि शहरी चमक-धमक से दूर गांवों की यह सादगी इंसान को अंदर से शांत कर देती है।
"बहुत प्यारे लोग हैं, उनके साथ ही बैठी थी मैं और बता रही थी कि उनको बकरी के बच्चे का नाम रखना चाहिए, तो सब लोग हंस रहे थे। बिहार में आकर मुझे बहुत अच्छा लग रहा है, यहां के लोग बहुत नरम दिल हैं। मैं यह सब पहले नहीं जानती थी, लेकिन इनसे मिलने-जुलने के बाद पता चला कि ये कितने अच्छे इंसान हैं।" — स्नेहा उल्लाल, बॉलीवुड अभिनेत्री
अपने फिल्मी करियर के शुरुआती दिनों को याद करते हुए उन्होंने कहा कि जब उन्होंने बतौर बाल कलाकार या नई अभिनेत्री के रूप में शुरुआत की थी, तब वह काफी छोटी थीं और निर्देशक के निर्देशों पर ही पूरी तरह निर्भर रहती थीं। लेकिन आज इतने लंबे सफर के बाद ग्रामीण किरदारों को जीना और उन्हें पर्दे पर उतारना उनके लिए एक अभिनेता के तौर पर बेहद संतोषजनक अनुभव है।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर उनकी तरफ से साझा की गई तस्वीरों पर फैंस लगातार प्रतिक्रिया दे रहे हैं। कोई उन्हें 'बिहार की छोरी' कह रहा है तो कोई उनकी सादगी की जमकर सराहना कर रहा है। कुल मिलाकर, यह कहा जा सकता है कि स्नेहा उल्लाल की यह बिहार यात्रा केवल एक फिल्म की शूटिंग तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संस्कृति और कला के मेल का एक खूबसूरत अध्याय बन चुकी है।








