दिल्ली के जंतर-मंतर पर इबादतगाहों की सुरक्षा को लेकर गरमाई सियासत
देश की राजधानी नई दिल्ली के ऐतिहासिक जंतर-मंतर मैदान पर मंगलवार को एक तीखा विरोध प्रदर्शन देखने को मिला। देश के विभिन्न हिस्सों में मस्जिदों और अन्य धार्मिक स्थलों के खिलाफ चल रही बुलडोजर कार्रवाई तथा विध्वंस अभियानों के विरोध में कई मुस्लिम संगठनों और विपक्षी दलों के नेता एकजुट हुए। इस प्रदर्शन का मुख्य उद्देश्य देश में कानून के शासन, संवैधानिक अधिकारों और सामाजिक न्याय के हनन के खिलाफ आवाज उठाना था। हालांकि, प्रदर्शन के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच भारी धक्का-मुक्की भी हुई, जिसके बाद सुरक्षाबलों ने कई बड़े नेताओं को हिरासत में ले लिया।
इस विरोध प्रदर्शन में उत्तर प्रदेश की राजनीति के कई जाने-माने चेहरे शामिल हुए। कैराना से समाजवादी पार्टी की लोकसभा सांसद इकरा हसन, संभल से सांसद जियाउर रहमान बर्क और रामपुर के सांसद मोहिबुल्लाह नदवी इस प्रदर्शन की अग्रिम पंक्ति में नजर आए। इन नेताओं ने केंद्र और राज्य सरकारों पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि देश के भीतर अल्पसंख्यकों के अधिकारों को सुनियोजित तरीके से कुचला जा रहा है और लोकतांत्रिक संस्थाओं का गलत इस्तेमाल किया जा रहा है।
प्रदर्शनकारियों का कहना था कि देश के अलग-अलग कोनों में धार्मिक स्थलों को निशाना बनाए जाने की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं, जिससे देश की गंगा-जमुनी तहजीब और सेक्युलर ढांचे को गहरा आघात पहुंच रहा है। इसी चिंता को जाहिर करने के लिए देश के विभिन्न हिस्सों से आए छात्रों, कार्यकर्ताओं, वकीलों और आम नागरिकों ने जंतर-मंतर पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई और सरकार की नीतियों के खिलाफ जमकर नारेबाजी की।
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सपा सांसद इकरा हसन का तीखा बयान: 'चुनावी फायदे के लिए तोड़ी गई सहारनपुर की मस्जिद'
समाजवादी पार्टी की युवा सांसद इकरा हसन ने उत्तर प्रदेश सरकार पर सीधा और तीखा हमला बोलते हुए आरोप लगाया कि राज्य में आगामी विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखकर ध्रुवीकरण की राजनीति की जा रही है। उन्होंने विशेष रूप से सहारनपुर में हुई मस्जिद तोड़ने की कार्रवाई का जिक्र करते हुए कहा कि इसके पीछे कोई कानूनी औचित्य नहीं बल्कि विशुद्ध रूप से राजनीतिक और चुनावी एजेंडा काम कर रहा है।
इकरा हसन ने मीडिया और प्रदर्शनकारियों को संबोधित करते हुए कहा कि जब भी चुनाव नजदीक आते हैं, इस तरह के हथकंडे अपनाए जाते हैं ताकि समाज में तनाव पैदा किया जा सके। उन्होंने उज्जैन, संभल, दिल्ली और फरीदाबाद जैसी जगहों पर मस्जिदों के खिलाफ हुई कार्रवाइयों का हवाला देते हुए सवाल उठाया कि क्या इस देश में केवल एक ही समुदाय के धार्मिक स्थलों को ध्वस्त करने के आदेश जारी होते रहेंगे? उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि इस तरह की एकतरफा कार्रवाइयां पूरी तरह से असंवैधानिक और गैरकानूनी हैं।
"हम किसी मजहब के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन सिर्फ एक मजहब को अपने राजनीतिक एजेंडे के लिए टारगेट करना गैरकानूनी और असंवैधानिक है। इसके खिलाफ हम विरोध करेंगे और अपनी लड़ाई पूरी मजबूती से लड़ेंगे। उत्तर प्रदेश के चुनाव सामने हैं, इसलिए सहारनपुर की मस्जिद को तोड़ा गया है।" — इकरा हसन, सांसद, समाजवादी पार्टी
विपक्षी नेताओं की सामूहिक गिरफ्तारी और पुलिस का सख्त पहरा
जंतर-मंतर पर चल रहे इस प्रदर्शन ने उस वक्त और तूल पकड़ लिया जब दिल्ली पुलिस ने कानून व्यवस्था का हवाला देते हुए प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करना शुरू कर दिया। हालात को नियंत्रित करने के लिए भारी संख्या में पुलिस बल और अर्धसैनिक बलों को तैनात किया गया था। पुलिस अधिकारियों का कहना था कि प्रदर्शन के लिए विधिवत अनुमति नहीं ली गई थी या तय नियमों का उल्लंघन हो रहा था, जिसके चलते यह कार्रवाई जरूरी हो गई थी।
इस कार्रवाई के तहत पुलिस ने समाजवादी पार्टी की सांसद इकरा हसन, सांसद मोहिबुल्लाह नदवी, जिया-उर-रहमान बर्क के अलावा जमाअत-ए-इस्लामी हिंद के उपाध्यक्ष मलिक मोतसिम खान और एसआईओ के राष्ट्रीय अध्यक्ष अब्दुल हफीज सहित कई प्रमुख हस्तियों को हिरासत में ले लिया। सभी हिरासत में लिए गए नेताओं और कार्यकर्ताओं को अलग-अलग पुलिस स्टेशनों में ले जाया गया, जहां घंटों तक राजनीतिक गहमागहमी बनी रही।
नेताओं की गिरफ्तारी के बाद राजनीतिक हलकों में तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। विपक्षी दलों का आरोप है कि केंद्र और राज्य सरकारें लोकतांत्रिक तरीकों से हो रहे शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों का गला घोंटना चाहती हैं। उनका कहना है कि अपनी आवाज उठाना हर भारतीय नागरिक का मौलिक अधिकार है, लेकिन सरकार पुलिस तंत्र का दुरुपयोग करके असंतोष की हर आवाज को दबा देना चाहती है।
जमाअत-ए-इस्लामी हिंद और अन्य संगठनों का राष्ट्रव्यापी चिंता व्यक्त करना
इस विरोध प्रदर्शन में केवल राजनीतिक दल ही नहीं, बल्कि देश के प्रमुख सामाजिक और धार्मिक संगठनों के प्रतिनिधि भी शामिल हुए। जमाअत-ए-इस्लामी हिंद के अध्यक्ष सैयद सआदतुल्लाह हुसैनी ने इस पूरे घटनाक्रम पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि यह मामला केवल एक मस्जिद या एक समुदाय तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश के संविधान और कानून के शासन पर सवालिया निशान खड़ा करता है।
संगठन के नेताओं का कहना था कि भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा और चर्च जैसी सभी इबादतगाहें राष्ट्रीय धरोहर का हिस्सा हैं और इनकी रक्षा करना सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी होनी चाहिए। इसके विपरीत, यदि स्थानीय प्रशासन और नगरपालिकाएं बुलडोजर का इस्तेमाल करके खुद धार्मिक स्थलों को गिराने लगेंगी, तो आम जनता का न्यायपालिका और कानून व्यवस्था से विश्वास उठ जाएगा।
वक्ताओं ने चुनाव आयोग और अन्य संवैधानिक संस्थाओं की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े किए। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ खास राजनीतिक इशारों पर संस्थाएं काम कर रही हैं, जिससे निष्पक्षता प्रभावित हो रही है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा राष्ट्रीय स्तर पर और अधिक तूल पकड़ सकता है क्योंकि विपक्ष इसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनाने की तैयारी में है।






