रेलवे हादसों में मुआवजे को लेकर सुप्रीम कोर्ट की ऐतिहासिक टिप्पणी
देश की सर्वोच्च अदालत ने रेल हादसों के पीड़ितों और उनके परिवारों को बड़ी राहत देते हुए एक बेहद अहम फैसला सुनाया है। अक्सर देखने में आता है कि ट्रेन यात्रा के दौरान दुर्घटना का शिकार होने वाले लोगों के पास यदि टिकट नहीं मिलता है, तो रेलवे या अदालतें उनके मुआवजे के दावों को खारिज कर देती हैं। लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि केवल भौतिक टिकट के अभाव में पीड़ित परिवार के अधिकारों को छीना नहीं जा सकता। न्यायालय ने अपने फैसले में इस बात पर जोर दिया है कि प्रशासनिक तकनीकी कमियों के आधार पर न्याय का गला नहीं घोंटा जा सकता है, विशेषकर तब जब किसी ने दुर्घटना में अपनी जान गंवा दी हो।
यह पूरा मामला एक दुर्भाग्यपूर्ण ट्रेन हादसे से जुड़ा हुआ है, जिसमें एक यात्री की चलती ट्रेन से गिरकर गंभीर रूप से घायल होने के बाद मौत हो गई थी। इस मामले में कानूनी लड़ाई लंबी चली और मामला आखिरकार सुप्रीम कोर्ट की देहरी तक पहुंचा। न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुयान और न्यायमूर्ति ए.एस. चंडुरकर की पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट के उस आदेश को सिरे से खारिज कर दिया, जिसमें पीड़ित परिवार को किसी भी तरह की आर्थिक सहायता देने से मना कर दिया गया था।
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क्या था पूरा मामला और कैसे हुआ था यह दर्दनाक हादसा
प्राप्त विवरण के अनुसार, यह घटना सितंबर 2017 की है जब एक व्यक्ति अपने घर से सूरत जाने के लिए ट्रेन में सवार हुआ था। यात्रा के दौरान अचानक ट्रेन के जनरल डिब्बे में तेज झटका लगने के कारण वह संतुलन खो बैठा और चलती गाड़ी से नीचे आ गिरा। इस भयानक हादसे में उसे गंभीर चोटें आईं और वह बुरी तरह जख्मी हो गया। आनन-फानन में उसे नजदीकी अस्पताल ले जाया गया, जहां उसकी नाजुक हालत को देखते हुए भर्ती कराया गया।
पीड़ित व्यक्ति ने अस्पताल में मौत से लंबा संघर्ष किया और करीब एक महीने से अधिक समय तक उसका इलाज चलता रहा। हालांकि, तमाम कोशिशों के बावजूद डॉक्टर उसकी जान नहीं बचा सके और गंभीर चोटों के कारण अंततः अस्पताल में ही उसकी मृत्यु हो गई। एक युवा के यूं अचानक चले जाने से उसके परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। बूढ़े माता-पिता के लिए यह सदमा असहनीय था, और उनके सामने जीवनयापन का भी गंभीर संकट खड़ा हो गया।
रेलवे क्लेम ट्रिब्यूनल का फैसला और हाईकोर्ट की आपत्ति
दुर्घटना के बाद पीड़ित परिवार ने न्याय की उम्मीद में रेलवे क्लेम ट्रिब्यूनल का दरवाजा खटखटाया था। ट्रिब्यूनल ने सभी पक्षों की दलीलें सुनने और दस्तावेजों का अध्ययन करने के बाद जून 2022 में अपना फैसला सुनाया था। ट्रिब्यूनल ने माना कि यह एक 'अनचाही घटना' थी और पीड़ित दुर्घटनावश ट्रेन से नीचे गिर गया था। इसके आधार पर ट्रिब्यूनल ने मृतक के माता-पिता को 8 लाख रुपये की आर्थिक सहायता के साथ-साथ घटना की तारीख से लेकर भुगतान तक 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देने का आदेश दिया था।
लेकिन इस फैसले के खिलाफ मामला गुजरात हाईकोर्ट पहुंच गया, जहां हाईकोर्ट ने इस बात को आधार बनाया कि मृतक के पास से कोई वैध ट्रेन टिकट बरामद नहीं हुआ था। हाईकोर्ट ने टिकट न होने को मुख्य मुद्दा बनाते हुए माता-पिता को मिलने वाले मुआवजे के दावे को नामंजूर कर दिया। अदालत का मानना था कि बिना टिकट यात्रा करने वाले व्यक्ति के परिजन नियमों के तहत मुआवजे के हकदार नहीं माने जा सकते।
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट की सोच पर उठाए सवाल
सर्वोच्च अदालत ने मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट के इस दृष्टिकोण की कड़ी आलोचना की। सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने स्पष्ट रूप से कहा कि हाईकोर्ट ने टिकट न होने की बात को जरूरत से ज्यादा तूल दिया, जबकि इस बात पर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया कि पीड़ित व्यक्ति लगभग एक महीने तक अस्पताल के बिस्तर पर मौत और जिंदगी के बीच जूझता रहा था। ऐसे संकट के समय में जब किसी व्यक्ति का गंभीर इलाज चल रहा हो, तो यह उम्मीद करना बेमानी है कि परिवार के लोग यात्रा का टिकट संभालकर सुरक्षित रखेंगे।
"आम तौर पर, जब पीड़ित का इलाज हो रहा होता है, तो इस बात की संभावना काफी कम हो जाती है कि मुआवजे का क्लेम करने वालों ने रेलवे का टिकट संभाल कर रखा हो। केवल टिकट न मिलने के कारण न्याय के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।" — सुप्रीम कोर्ट पीठ
न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया कि पीड़ित के पिता द्वारा दिए गए शपथ-पत्र और अन्य परिस्थितियों को देखकर यह साफ अंदाजा लगाया जा सकता है कि वह एक वास्तविक यात्री था। ट्रेन के जनरल डिब्बे से गिरने की घटना अपनी जगह प्रमाणित थी, ऐसे में محض कागजी या तकनीकी औपचारिकता का हवाला देकर सहायता रोकना न्यायसंगत नहीं है।
आम जनता और रेल यात्रियों के लिए क्या है इसका संदेश
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला देश के आम नागरिकों और रोजाना रेल यात्रा करने वाले लाखों यात्रियों के लिए एक बड़ा मील का पत्थर साबित होगा। अक्सर आम आदमी दुर्घटना का शिकार होने के बाद प्रशासनिक तंत्र और रेलवे अधिकारियों की मनमानी का सामना करता है। टिकट गुम हो जाने या नष्ट हो जाने जैसे बहाने बनाकर अक्सर दावों को दबाने की कोशिश की जाती है। इस फैसले के बाद अब रेलवे प्रशासन और विभिन्न अदालतों के लिए यह स्पष्ट हो गया है कि मानवीय दृष्टिकोण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के न्यायिक हस्तक्षेप से उन गरीब और लाचार परिवारों को बड़ी कानूनी ढाल मिलेगी, जिन्हें दुर्घटना के बाद अपनों को खोने के साथ-साथ वित्तीय तंगी का भी सामना करना पड़ता है। सर्वोच्च अदालत ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि कानून की नजर में मानवीय संवेदनाएं और वास्तविक तथ्य सबसे ऊपर हैं।