तमिलनाडु में आरटीआई के दायरे को लेकर अचानक क्यों गरमाई सियासत
देश के राजनीतिक गलियारों में उस समय हलचल तेज हो गई जब तमिलनाडु की सत्ताधारी सरकार ने सूचना के अधिकार यानी आरटीआई अधिनियम से जुड़े एक अहम प्रशासनिक फैसले पर चंद घंटों के भीतर ही यू-टर्न ले लिया। राज्य सरकार की तरफ से एक नोटिफिकेशन जारी किया गया था, जिसमें सार्वजनिक कानून-व्यवस्था विभाग को आरटीआई के दायरे से बाहर रखने की बात कही गई थी। इस आदेश के सामने आते ही राजनीतिक दलों और पारदर्शिता की मांग करने वाले कार्यकर्ताओं के बीच विरोध के स्वर गूंज उठे।
इस फैसले के तहत मूल आदेश में कानून और व्यवस्था से जुड़े महकमे को खुफिया और सुरक्षा संगठनों की श्रेणी में शामिल करने का प्रयास किया गया था। यदि यह आदेश लागू रहता, तो जनता के लिए पुलिस कस्टडी में हुई मौतों, राजनीतिक आंदोलनों, सांप्रदायिक तनावों और कानून-व्यवस्था से जुड़ी कई अन्य महत्वपूर्ण जानकारियों को हासिल करना बेहद मुश्किल हो जाता। जानकारों का मानना है कि प्रशासनिक स्तर पर पारदर्शिता को सीमित करने वाले इस कदम ने लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति गहरी चिंता पैदा कर दी थी।
हालांकि, बढ़ते राजनीतिक दबाव और खुद अपने गठबंधन के भीतर से उठ रही तीखी आलोचनाओं को भांपते हुए सरकार ने स्थिति को संभालते हुए तुरंत इस विवादित आदेश को वापस ले लिया। इस घटनाक्रम ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि जनहित से जुड़े मामलों और सूचना के अधिकार जैसे मजबूत कानूनों पर जनता की पैनी नजर कितनी जरूरी है।
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गठबंधन के भीतर से ही उठी बगावत की आवाज और तीखी प्रतिक्रियाएं
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे दिलचस्प और महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि सरकार के इस फैसले का विरोध सबसे पहले उनके अपने ही गठबंधन के एक प्रमुख सहयोगी दल ने किया। कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता कार्ति पी. चिदंबरम ने सरकार के इस कदम की खुलकर आलोचना की। उन्होंने सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों के जरिए साफ शब्दों में कहा कि इस तरह के कदम समाज में एक अच्छी और स्वस्थ प्रशासनिक मिसाल कायम नहीं करते।
कार्ति चिदंबरम ने देश के लोकतांत्रिक इतिहास का हवाला देते हुए याद दिलाया कि जनता के प्रति सरकार की जवाबदेही तय करने के लिए ही पूर्ववर्ती सरकारों द्वारा आरटीआई अधिनियम को लाया गया था। उन्होंने अपने आधिकारिक बयानों में जोर देकर कहा कि कानून-व्यवस्था विभाग का दायरा बहुत व्यापक होता है और इसमें जनता के बुनियादी अधिकारों से जुड़े कई संवेदनशील मामले शामिल होते हैं।
"कानून-व्यवस्था विभाग कई संवेदनशील मामलों की जांच करता है, जैसे पुलिस फायरिंग, हिरासत में मौत, और सांप्रदायिक टकराव की रिपोर्ट। इस अहम जानकारी को जनता से छिपाना पारदर्शी कामकाज के तरीकों के बिल्कुल खिलाफ है। आरटीआई के दायरे को बढ़ाया जाना चाहिए, उसे सीमित करने की कोशिश नहीं होनी चाहिए।" — कार्ति पी. चिदंबरम, वरिष्ठ कांग्रेस नेता
गठबंधन के भीतर से उठे इस कड़े विरोध ने सरकार की मुश्किलें बढ़ा दीं। राजनीतिक गलियारों में चर्चा शुरू हो गई कि यदि इस तरह के फैसलों पर समय रहते रोक न लगाई जाए, तो आपसी राजनीतिक तालमेल पर भी इसका बुरा असर पड़ सकता है। हालांकि, आदेश वापस लिए जाने के बाद सहयोगी नेताओं ने सरकार के इस सुधरे हुए कदम का स्वागत भी किया।
कौन-कौन से संवेदनशील मामले और रिकॉर्ड आ सकते थे दायरे के बाहर
प्रशासनिक विशेषज्ञों और आरटीआई कार्यकर्ताओं का कहना है कि यदि यह आदेश वापस न लिया जाता, तो आम नागरिक कई बेहद संवेदनशील और गंभीर मामलों की सच्चाई जानने से वंचित रह जाते। कानून-व्यवस्था विभाग के अंतर्गत आने वाले मामलों की सूची काफी लंबी और गंभीर होती है, जिनका सीधा संबंध आम जनता के मौलिक अधिकारों से जुड़ा होता है।
इन मामलों में मुख्य रूप से पुलिस फायरिंग की घटनाएं, हिरासत में कैदियों की मौत, टॉर्चर या पूछताछ के दौरान दुर्व्यवहार, सांप्रदायिक और जातीय संघर्षों की जांच रिपोर्ट शामिल होती हैं। इसके अलावा सुरक्षा से जुड़े नजरबंदी के मामले, राजनीतिक रूप से संवेदनशील मुकदमों को वापस लेने की अर्जियां और मानहानि से जुड़े कानूनी मामलों की अनुमति के कागजात भी इसी महकमे के अधीन आते हैं।
यदि ऐसे महत्वपूर्ण दस्तावेजों को आरटीआई कानून की पहुंच से दूर कर दिया जाता, तो सरकारी मशीनरी पर जनता का भरोसा डगमगा सकता था। पारदर्शिता की कमी के चलते भ्रष्टाचार या प्रशासनिक लापरवाही के मामलों में सच्चाई को दबाए जाने की आशंकाएं भी काफी बढ़ जातीं, जिसकी वजह से इस फैसले का विरोध होना तय माना जा रहा था।
विपक्षी दलों का आक्रामक रुख और नौकरशाही की कार्यशैली पर सवाल
केवल सत्ता पक्ष के भीतर से ही नहीं, बल्कि विपक्षी दलों ने भी इस मुद्दे पर सरकार को आड़े हाथों लिया। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की वरिष्ठ नेता तमिलिसाई सुंदरराजन ने इस पूरे प्रकरण को लेकर सरकार की मंशा पर गंभीर सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि जो सरकारें अपनी कार्यशैली में निष्पक्ष होने का दावा करती हैं, वे आखिर सूचना के अधिकार कानून से क्यों डरती हैं।
विपक्षी नेताओं ने आरोप लगाया कि इस तरह के आदेश लोकतंत्र की मूल भावना के खिलाफ हैं और यह जनता के अधिकारों पर सीधा हमला है। उन्होंने यह भी कहा कि अगर प्रशासन पारदर्शी तरीके से काम करे, तो उसे किसी भी कानून या जांच से डरने की कोई आवश्यकता नहीं होनी चाहिए।
गठबंधन के भीतर से ही सरकार को एक दोस्ताना सलाह देते हुए नसीहत दी गई कि नौकरशाहों को प्रशासन का तरीका और नीतिगत दिशा तय नहीं करने देनी चाहिए। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस घटना ने यह स्पष्ट कर दिया है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनप्रतिनिधियों को प्रशासनिक फैसलों पर हमेशा सतर्क और नियंत्रण बनाए रखना चाहिए।
सूचना के अधिकार का महत्व और भविष्य की प्रशासनिक चुनौतियां
साल 2005 में संसद द्वारा पारित किया गया आरटीआई अधिनियम भारतीय लोकतंत्र का एक ऐसा मजबूत स्तंभ है, जिसने आम नागरिक को देश के किसी भी कोने से सरकारी कामकाज की जानकारी पाने का अधिकार दिया है। यह कानून भ्रष्टाचार पर लगाम कसने और सरकारी विभागों में जवाबदेही तय करने का सबसे बड़ा हथियार माना जाता है।
यही कारण है कि जब भी इस कानून के दायरे को सीमित करने या इसमें किसी तरह की कटौती करने का प्रयास किया जाता है, तो देश भर के नागरिक और राजनीतिक संगठन तुरंत मुखर हो जाते हैं। तमिलनाडु की इस घटना ने एक बार फिर से इस बात की पुष्टि कर दी है कि लोकतांत्रिक प्रणाली में जनता की आवाज और पारदर्शिता के सिद्धांतों से समझौता करना किसी भी सरकार के लिए आसान नहीं होता।
भविष्य में इस प्रकार के प्रशासनिक निर्णयों से बचने के लिए यह जरूरी है कि सरकारें कोई भी बड़ा नीतिगत कदम उठाने से पहले उसकी गंभीरता और उसके दूरगामी प्रभावों का सही ढंग से आकलन करें। जनता के विश्वास और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करना ही किसी भी सच्ची लोकतांत्रिक सरकार की सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए।







