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बिहार की लोककथा और रहस्य के ताने-बाने पर बुनी गई 'द वन', जंगल के बीच क्या है असली राज?

सिनेमाघरों में रिलीज हुई फिल्म 'द वन: फोर्स ऑफ द फॉरेस्ट' एक अलग तरह का फैंटेसी एडवेंचर लेकर आई है। इसमें बिहार की संस्कृति, छठी मइया की आस्था और एक गहरे रहस्यमयी जंगल की कहानी को बड़े पर्दे पर उतारा गया है।
The Freelance ब्यूरो
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25 सितंबर 2026 • अपडेटेड
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बिहार की लोककथा और रहस्य के ताने-बाने पर बुनी गई 'द वन', जंगल के बीच क्या है असली राज?
📷 बिहार की लोककथा और रहस्य के ताने-बाने पर बुनी गई 'द वन', जंगल के बीच क्या है असली राज? — मुख्य घटनाक्रमफोटो साभार: रॉयटर्स / एजेंसीज़ / सोशल मीडिया

खबर की बड़ी बातें (Key Highlights)

  • फिल्म की मूल कहानी बिहार के बिहटा स्थित वन देवी मंदिर और वहां की स्थानीय लोककथाओं से प्रेरित है।
  • सिद्धार्थ मल्होत्रा और तमन्ना भाटिया ने फिल्म में मुख्य भूमिकाएं निभाई हैं, जो शहरी सोच और ग्रामीण मान्यताओं के बीच के संघर्ष को दर्शाती हैं।
  • निर्देशक दीपक कुमार मिश्रा ने पारंपरिक लोककथा को आधुनिक फैंटेसी और वीएफएक्स के साथ पिरोने का प्रयास किया है।

भारतीय सिनेमा में कहानियों की कोई कमी नहीं है, लेकिन उन्हें बिल्कुल नए और आधुनिक अंदाज में दर्शकों के सामने पेश करना हमेशा एक बड़ी चुनौती रहा है। हाल ही में पर्दे पर आई फिल्म 'द वन: फोर्स ऑफ द फॉरेस्ट' हमारी ही मिट्टी की एक अनसुनी लोककथा को एक बड़े कैनवास पर लेकर आती है। इस फिल्म की दुनिया में प्रवेश करते ही दर्शक एक ऐसे रहस्यमयी सफर पर निकल जाते हैं, जहां आस्था, प्रकृति और इंसान की महत्वकांक्षाएं आमने-सामने खड़ी नजर आती हैं।

पारंपरिक मान्यताओं और आधुनिक दुनिया के बीच की इस जंग को पर्दे पर उतारने के लिए मेकर्स ने काफी मेहनत की है। फिल्म का प्लॉट दर्शकों को शुरुआत से ही बांधकर रखता है और यह जिज्ञासा पैदा करता है कि आखिर उस घने और वीरान जंगल के भीतर क्या छिपा है, जिसके बारे में बुजुर्ग तरह-तरह की कहानियां सुनाते आए हैं। हालांकि, जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, इसके कई राज खुलकर सामने आने लगते हैं।

गांव की मिट्टी से जुड़ा प्लॉट और शहरी सोच का टकराव

फिल्म की मुख्य कहानी ऋषि और उसकी पत्नी ममता के इर्द-गिर्द घूमती है, जो अपने पुश्तैनी गांव लौटते हैं। शहर की चकाचौंध में पले-बढ़े ऋषि के लिए गांव की पुरानी परंपराएं और रीति-रिवाज सिर्फ दकियानुसी सोच का हिस्सा हैं। लेकिन जैसे ही वे अपने पैतृक घर पहुंचते हैं, पारिवारिक जड़ों और वहां की सांस्कृतिक आबोहवा से उनका सामना होता है।

गांव के ठीक नजदीक एक बहुत पुराना और घना जंगल है, जिसके बारे में सदियों से यह चेतावनी दी जाती रही है कि सूर्यास्त के बाद वहां कदम रखना खतरे से खाली नहीं है। स्थानीय लोगों की आस्था वन देवी से जुड़ी है और वे उस जंगल को पवित्र और रहस्यमयी मानते हैं। ऋषि इस बात पर यकीन नहीं करता और जब वह आधुनिक विकास के नाम पर उस सीमा को लांघता है, तब जंगल की अलौकिक ताकतें जाग उठती हैं।

यही वह मोड़ है जहां से फिल्म अपनी असली रफ्तार पकड़ती है। गांव का सीधा-साधा परिवेश, आपसी रिश्ते और हल्का-फुल्का हास्य मिलकर पर्दे पर एक दिलचस्प माहौल तैयार करते हैं, जो दर्शकों को अपनी ओर खींचता है।

बिहार की लोककथा और रहस्य के ताने-बाने पर बुनी गई 'द वन', जंगल के बीच क्या है असली राज?
📷 फिल्म के एक दृश्य में नजर आते मुख्य कलाकार
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कलाकारों का अभिनय और किरदारों की गहराई

फिल्म में मुख्य भूमिका निभा रहे सिद्धार्थ मल्होत्रा ने ऋषि के किरदार को संजीदगी से निभाया है। एक अविश्वासी शहरी युवक से लेकर परिस्थितियों के आगे झुकने और आस्था को अपनाने तक के सफर को उन्होंने अपने एक्शन और भावों के जरिए प्रभावी बनाया है। उनके किरदार के इस अंदरूनी बदलाव को अगर थोड़ा और समय मिलता, तो इसका प्रभाव और अधिक गहरा हो सकता था।

वहीं, तमन्ना भाटिया ने ममता की भूमिका को बड़ी सहजता से निभाया है। सिद्धार्थ के साथ उनकी केमिस्ट्री इस फैंटेसी ड्रामा को एक मानवीय आधार प्रदान करती है। इसके अलावा, सुनील ग्रोवर फिल्म के सबसे बड़े सरप्राइज के रूप में सामने आते हैं। उनका गंभीर और अलग अंदाज दर्शकों को हैरान करता है और जैसे-जैसे उनकी बैकस्टोरी खुलती है, फिल्म के प्रति उत्सुकता और बढ़ जाती है।

मनीष पॉल पहले हिस्से में कॉमेडी का तड़का लगाते हैं, जबकि श्वेता तिवारी और अनूप सोनी जैसे अनुभवी कलाकार भी अपने-अपने किरदारों में पूरी तरह फिट बैठते हैं।

"हम जब अपनी जड़ों और लोक कथाओं को सिनेमा के जरिए नए रूप में पेश करते हैं, तो दर्शक उससे बहुत जल्दी जुड़ाव महसूस करते हैं। यह फिल्म केवल डर या फैंटेसी नहीं, बल्कि आस्था और प्रकृति के संतुलन की बात करती है।" — फिल्म समीक्षक

छठी मइया की आस्था और सांस्कृतिक जुड़ाव

इस पूरी सिनेमैटिक यात्रा का सबसे बड़ा भावनात्मक हिस्सा छठी मइया की आस्था और उससे जुड़े अनुष्ठान हैं। फिल्म में दिखाए गए छठ के घाट, सूर्य को अर्घ्य देने की परंपरा और भक्ति का माहौल इसे सीधे तौर पर भारतीय संस्कृति के करीब ले आता है। हालांकि, फिल्म ने अपनी कहानी की मांग के अनुसार कुछ सिनेमैटिक स्वतंत्रता भी ली है, जिसके कारण दृश्यों में थोड़ा नाटकीयपन नजर आता है, लेकिन इसका मूल भाव बना रहता है।

फिल्म का संगीत भी इसके मूड के अनुकूल है। 'समझो ना' गाना जहां कहानी के रोमांटिक और कोमल पक्ष को सामने लाता है, वहीं 'ठुमक ठुमक' गीत माहौल में जीवंतता भरता है। लोक संस्कृति के इन तत्वों ने फिल्म के फिक्शन आधार को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई है।

सिनेमैटोग्राफी, वीएफएक्स और मेकिंग का स्केल

इस फैंटेसी एडवेंचर की सबसे बड़ी ताकत इसकी सिनेमैटोग्राफी है। कैमरे के जरिए जंगल के हरे-भरे पेड़ों, धुंध, अंधेरे और रोशनी के अद्भुत खेल को इस तरह दिखाया गया है कि जंगल खुद कहानी का एक मुख्य पात्र प्रतीत होता है। वीएफएक्स और प्रोडक्शन डिजाइन के मामले में भी बड़े पैमाने पर काम किया गया है।

रहस्यमयी जीवों और प्राचीन कथाओं को समझाने के लिए इस्तेमाल किए गए एनिमेशन के टुकड़े फिल्म को एक अलग ही स्तर पर ले जाते हैं। हालांकि कुछ जगहों पर कंप्यूटर जनित दृश्य थोड़े कमजोर महसूस होते हैं, लेकिन बड़े पर्दे पर इस तरह के देसी फैंटेसी जॉनर का प्रयोग अपने आप में एक सराहनीय कदम है।

निष्कर्ष

कुल मिलाकर, 'द वन' एक ऐसा सिनेमाई अनुभव है जो आपको एक अलग ही काल्पनिक और रहस्यमयी दुनिया में ले जाता है। भले ही फिल्म के दूसरे हिस्से में कहानी कुछ जानी-पहचानी और तेज रफ्तार राह पकड़ लेती है, लेकिन अपनी मिट्टी से जुड़े होने का अहसास और इसका भव्य पैमाना इसे देखने लायक बनाता है। अगर आप एक अलग जॉनर की फिल्म देखना पसंद करते हैं, तो यह सिनेमाई सफर आपके लिए एक नया अनुभव साबित हो सकता है।

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