अस्पताल के भारी-भरकम बिलों के पीछे का कड़वा सच
जब भी कोई आम इंसान अपने किसी परिजन के इलाज के लिए अस्पताल की चौखट पर कदम रखता है, तो उसे डॉक्टर की फीस और दवाइयों के पर्चे के अलावा एक और भारी भरकम खर्च का सामना करना पड़ता है। यह खर्च होता है इलाज के दौरान इस्तेमाल होने वाले विभिन्न मेडिकल उपकरणों और डिस्पोजेबल सामानों का। अक्सर जब इलाज पूरा होने के बाद डिस्चार्ज का समय आता है, तो अंतिम बिल देखकर मरीज और उसके परिजनों के होश उड़ जाते हैं। कई बार यह समझ पाना मुश्किल होता है कि जिस साधारण सी दिखने वाली मेडिकल सामग्री या उपकरण का बिल में जिक्र है, उसकी वास्तविक कीमत बाजार में क्या रही होगी और अस्पताल ने इसके लिए कितनी बड़ी रकम वसूल ली है।
यही वह सवाल है जो लंबे समय से देश के आम नागरिकों के मन में उठता रहा है, लेकिन हाल ही में जब इस पर गहराई से पड़ताल शुरू हुई, तो जो आंकड़े सामने आए उन्होंने स्वास्थ्य व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। मेडिकल डिवाइसेस की खरीद कीमत और मरीजों से वसूले जाने वाले अंतिम मूल्य के बीच का यह अंतर इतना बड़ा है कि इसे लेकर अब नीति निर्माताओं और स्वास्थ्य विशेषज्ञों के बीच तीखी बहस छिड़ गई है। इसी को ध्यान में रखते हुए अब एक नई मूल्य निर्धारण व्यवस्था लाने की बात जोर पकड़ रही है, जिसे ट्रेड मार्जिन रेशनलाइजेशन यानी TMR कहा जा रहा है।
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क्या है TMR और कैसे काम करती है यह व्यवस्था?
आम भाषा में समझें तो ट्रेड मार्जिन रेशनलाइजेशन (TMR) एक ऐसी प्रस्तावित नियामक व्यवस्था है जिसके जरिए किसी भी उत्पाद की खरीद लागत और उपभोक्ता या मरीज से ली जाने वाली अंतिम कीमत के अंतर को सीमित करने का प्रयास किया जाता है। मान लीजिए कि किसी मेडिकल डिवाइस या सर्जिकल कंज्यूमर को अस्पताल या स्वास्थ्य संस्थान ने थोक में बेहद कम दाम यानी सौ रुपये में खरीदा है, लेकिन मरीज को बिल थमाते समय उसी सामान के चार सौ या पांच सौ रुपये वसूल लिए जाते हैं।
यह जो भारी-भरकम अंतर बीच में बचता है, उसी पर लगाम लगाने के लिए TMR के प्रावधानों पर विचार किया जा रहा है। इस व्यवस्था के लागू होने के बाद, निर्माताओं और अस्पतालों द्वारा मनमाने तरीके से दाम तय करने की छूट खत्म हो जाएगी। हालांकि, इस बात पर अभी भी चर्चा जारी है कि सरकार इस मार्जिन की सीमा तय करने में कितना प्रतिशत स्वीकार्य मानती है, ताकि न तो अस्पताल घाटे में रहें और न ही मरीजों का शोषण किया जा सके।
राज्य स्तर की जांच में सामने आए चौंकाने वाले आंकड़े
इस पूरे मामले ने तब तूल पकड़ा जब कुछ समय पहले स्वास्थ्य से जुड़े नियामकों और जांच एजेंसियों ने बाजार में बिकने वाले चिकित्सा उपकरणों के दामों का बारीकी से अध्ययन किया। विशेष तौर पर महाराष्ट्र फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (FDA) की एक गहन जांच के दौरान ऐसे कई तथ्य उजागर हुए जिन पर यकीन करना आम आदमी के लिए बेहद कठिन था। जांच में पाया गया कि कई जीवन रक्षक और सामान्य मेडिकल डिवाइसेस की खरीद लागत और उन पर अंकित अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) के बीच कई गुना का भारी अंतर था।
विभिन्न उत्पादों के आंकड़ों पर नजर डालें तो पता चला कि कुछ खास मेडिकल उत्पादों पर न्यूनतम 150 प्रतिशत से लेकर अधिकतम 2,841 प्रतिशत तक का मुनाफा कमाया जा रहा है। जब इतनी बड़ी तादाद में मार्जिन की बात सामने आई, तो स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े अर्थशास्त्रियों और उपभोक्ता अधिकारों के जानकारों ने इस पर गहरी चिंता जताई। उनका मानना है कि गंभीर बीमारियों के इलाज के दौरान पहले से ही टूटा हुआ परिवार इन छिपे हुए शुल्कों और महंगी मेडिकल सामग्री के बोझ तले पूरी तरह से दब जाता है।
अस्पतालों का पक्ष और उनके अपने तर्क
दूसरी तरफ, जब इस बेहिसाब मुनाफे को लेकर देश के निजी अस्पतालों और स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं से सवाल किए गए, तो उन्होंने अपनी दलीलें सामने रखीं। अस्पतालों का कहना है कि मेडिकल सामान के खरीद मूल्य और मरीज से ली गई कीमत के बीच का पूरा अंतर केवल उनका शुद्ध मुनाफा या कमाई नहीं होता है। स्वास्थ्य संस्थानों का तर्क है कि उन्हें अपने यहां आने वाले मरीजों को विश्व स्तर की सुविधाएं देने के लिए कई तरह के भारी-भरकम अप्रत्यक्ष खर्च उठाने पड़ते हैं, जिनका सीधा असर बिल पर पड़ता है।
अस्पतालों के प्रबंधन का यह भी कहना है कि वे केवल अपने संचालन के खर्चे ही नहीं निकालते, बल्कि उन्हें मरीजों की सुरक्षा, अत्याधुनिक मशीनों के रख-रखाव, 24 घंटे चलने वाली इमरजेंसी सेवाओं और कुशल डॉक्टरों तथा नर्सिंग स्टाफ के वेतन का भी भुगतान करना होता है। इसके अलावा, कई बार मेडिकल उपकरणों का जो एमआरपी होता है, वह सीधे तौर पर उपकरण बनाने वाली निर्माता कंपनियां तय करती हैं, न कि स्थानीय अस्पताल।
"मेडिकल उपकरणों पर अत्यधिक मार्जिन और खरीद मूल्य का भारी अंतर सीधे तौर पर आम मरीजों की जेब पर डाका डालने जैसा है, जिस पर एक निश्चित कानूनी सीमा तय होनी ही चाहिए।"— स्वास्थ्य अधिकार कार्यकर्ता
नियमों के कड़े होने से आम जनता को कितनी राहत मिलेगी?
वर्तमान समय में देश के भीतर स्वास्थ्य सेवाओं के खर्चे लगातार आसमान छू रहे हैं। मध्यम वर्ग और गरीब परिवार जब एक बार किसी बड़े अस्पताल में भर्ती होते हैं, तो उनका पूरा जीवनभर का बचाया हुआ धन इलाज के बिल चुकाने में खर्च हो जाता है। यदि TMR जैसे नियमों को सख्ती से लागू किया जाता है, तो आने वाले समय में स्टेंट, इम्प्लांट, सिरिंज और अन्य सर्जिकल उपकरणों के दामों में भारी कमी देखने को मिल सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार को इस दिशा में बिना किसी देरी के एक पारदर्शी नीति का ऐलान करना चाहिए। ड्रग्स प्राइस कंट्रोल ऑर्डर (DPCO) की तर्ज पर ही मेडिकल उपकरणों के लिए भी एक मजबूत मूल्य नियंत्रण तंत्र का होना बेहद जरूरी है, ताकि मुनाफाखोरी की इस दौड़ पर विराम लगाया जा सके और देश के हर नागरिक को किफायती दरों पर बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं मिल सकें।




