उत्तर प्रदेश की राजनीति में गठबंधन की सुगबुगाहट और बढ़ती दूरियां
उत्तर प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में साल 2027 के विधानसभा चुनावों को लेकर अभी से सुगबुगाहट तेज हो चुकी है। राज्य के दो प्रमुख विपक्षी दल, समाजवादी पार्टी और कांग्रेस, एक बार फिर साथ मिलकर चुनाव लड़ने की तैयारियों में जुटे हैं, लेकिन सीटों के बंटवारे के फॉर्मूले पर दोनों दलों के बीच अंदरखाने खींचतान शुरू हो चुकी है। कांग्रेस पार्टी ने आगामी चुनाव में कम से कम 150 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने की इच्छा जताई है। कांग्रेस का तर्क है कि वह राज्य में अपनी पुरानी जमीन को दोबारा हासिल करना चाहती है और इसके लिए उसे सम्मानजनक सीटों की दरकार है। हालांकि, कांग्रेस की इस बड़ी मांग ने उसके मुख्य सहयोगी दल समाजवादी पार्टी के नेताओं को असहज कर दिया है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उत्तर प्रदेश जैसे अहम राज्य में विपक्ष का गठबंधन भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ एक मजबूत चुनौती पेश कर सकता है, बशर्ते दोनों दल आपसी तालमेल बिठाने में सफल रहें। लोकसभा चुनाव 2024 के दौरान दोनों दलों के बीच हुआ गठबंधन काफी हद तक सफल रहा था और इसने एनडीए को राज्य में बड़ा झटका दिया था। उसी सफलता से उत्साहित कांग्रेस इस बार विधानसभा चुनाव में अपनी हिस्सेदारी काफी ज्यादा चाहती है। लेकिन क्षेत्रीय दल होने के नाते समाजवादी पार्टी राज्य की अधिकांश सीटों पर खुद चुनाव लड़कर अपनी पार्टी का दायरा बढ़ाना चाहती है, जिससे सीटों के गणित पर पेच फंसता नजर आ रहा है।
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सपा नेताओं की दो टूक: 'कांग्रेस को अपनी हैसियत के हिसाब से मांगनी चाहिए सीटें'
कांग्रेस की तरफ से 150 सीटों की मांग सामने आते ही समाजवादी पार्टी के नेताओं की तीखी प्रतिक्रियाएं भी आनी शुरू हो गईं हैं। सपा के वरिष्ठ नेताओं और सांसदों ने कांग्रेस पार्टी को उसकी जमीनी हकीकत याद दिलाना शुरू कर दिया है। सपा नेताओं का कहना है कि गठबंधन का आधार हमेशा से दलों की जमीनी ताकत, स्थानीय विधायकों और सांसदों की संख्या तथा कार्यकर्ताओं के सक्रिय नेटवर्क पर होना चाहिए। बिना संगठन की मजबूती के इतनी बड़ी संख्या में सीटों की मांग करना व्यावहारिक नहीं है।
सपा नेताओं ने पिछले विधानसभा और लोकसभा चुनावों के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि कांग्रेस को अपनी राजनीतिक ताकत का सही आकलन करना चाहिए। उनका दावा है कि पिछले चुनाव में यदि समाजवादी पार्टी का साथ नहीं मिलता, तो कांग्रेस के लिए लोकसभा चुनावों में दहाई का आंकड़ा छूना भी मुश्किल हो जाता। सपा नेताओं की इस दो टूक बयानबाजी से यह साफ जाहिर होता है कि आने वाले समय में सीट शेयरिंग का फॉर्मूला तय करना दोनों दलों के शीर्ष नेतृत्व के लिए एक बड़ी चुनौती साबित होने वाला है।
"गठबंधन में सीटों का बंटवारा पार्टियों की राजनीतिक हैसियत, विधायकों-सांसदों की संख्या और संगठन की ताकत को देखकर होना चाहिए। 150 सीट तो दूर की बात है, कांग्रेस को 50 सीट देना भी बहुत बड़ी बात होगी।" — एसपी सिंह पटेल, सांसद, समाजवादी पार्टी
रायबरेली और राहुल गांधी के चुनावी सफर पर छिड़ी सियासी बहस
सपा और कांग्रेस के बीच चल रही इस जुबानी जंग में पुराने चुनावी किस्से और अंदरखाने की चर्चाएं भी बाहर आने लगी हैं। समाजवादी पार्टी के नेताओं ने दावा किया है कि पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान राहुल गांधी के रायबरेली से चुनाव लड़ने को लेकर पार्टी के भीतर काफी माथापच्ची और हिचकिचाहट थी। सपा नेतृत्व के समझाने और राजनीतिक समीकरण स्पष्ट करने के बाद ही उन्होंने वहां से मैदान में उतरने का फैसला किया था। इस तरह के बयानों से दोनों दलों के बीच भले ही सार्वजनिक तौर पर सब कुछ ठीक दिखाने की कोशिश की जा रही हो, लेकिन अंदरखाने अविश्वास के बादल मंडराने लगे हैं।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि इस तरह के बयानों से गठबंधन की सेहत पर बुरा असर पड़ सकता है। विपक्षी दलों के भीतर यदि सेकंड लाइन के नेता इस तरह के बयानबाजी करते रहेंगे, तो जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं के बीच गलत संदेश जाएगा। भाजपा के खिलाफ एकजुट होकर लड़ने का दावा करने वाले इन दलों को पहले अपनी आंतरिक कलह को शांत करना होगा, अन्यथा इसका सीधा फायदा सत्ता पक्ष को मिल सकता है।
इमरान मसूद को प्रमोशन देकर कांग्रेस का मास्टरस्ट्रोक या दबाव की राजनीति?
एक तरफ जहां सीटों के बंटवारे को लेकर खींचतान जारी है, वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस पार्टी ने अपनी संगठन क्षमता को धार देने के लिए बड़े संगठनात्मक बदलाव भी किए हैं। पार्टी ने तेज-तर्रार नेता और सांसद इमरान मसूद को उत्तर प्रदेश कांग्रेस का कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त किया है। इस नियुक्ति को राजनीतिक गलियारों में एक सोची-समझी बड़ी रणनीति के रूप में देखा जा रहा है। इमरान मसूद की पकड़ पश्चिमी उत्तर प्रदेश और विशेषकर मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में काफी मजबूत मानी जाती है।
कांग्रेस इस कदम के जरिए अपने पारंपरिक वोटर बेस को फिर से पार्टी के पाले में लाने की कोशिश कर रही है। पश्चिमी यूपी में मुस्लिम मतदाताओं की बड़ी संख्या को साधने के लिए कांग्रेस ने यह तुरुप का पत्ता चला है। जानकारों का यह भी मानना है कि कांग्रेस संगठन में इस तरह के बदलाव करके समाजवादी पार्टी पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाना चाहती है ताकि सीट शेयरिंग की बातचीत में उसे मजबूत मोलभाव करने का मौका मिल सके। अब देखना यह होगा कि सपा इस राजनीतिक रणनीति का क्या जवाब देती है और क्या दोनों दल आपसी सहमति से 2027 के रण में उतरेंगे या फिर राहें जुदा होंगी।






