हाईवे पर दौड़ती एसी स्लीपर बसें बन रही हैं मौत का फंदा
देश के राष्ट्रीय राजमार्गों और आधुनिक एक्सप्रेसवे पर रात के वक्त सफर करना अब यात्रियों के लिए किसी बड़े जोखिम से कम नहीं रह गया है। हाल के दिनों में सामने आए हादसों ने यह साबित कर दिया है कि लंबी दूरी तय करने वाली एसी स्लीपर बसें अचानक आग का गोला बन रही हैं। जब यात्री गहरी नींद में होते हैं, तब शॉर्ट सर्किट या तकनीकी खराबी के चलते ये वाहन कुछ ही मिनटों में राख के ढेर में तब्दील हो जाते हैं। इन जानलेवा त्रासदियों में केवल यात्रियों की गाढ़ी कमाई ही नहीं जलती, बल्कि कई बेकसूर लोगों को अपनी जान से भी हाथ धोना पड़ता है।
सड़क सुरक्षा से जुड़े जानकारों और परिवहन विशेषज्ञों का मानना है कि यह कोई छिटपुट या इत्तेफाक से होने वाली दुर्घटनाएं नहीं हैं, बल्कि एक गंभीर और जानलेवा पैटर्न की ओर इशारा करती हैं। देश के अलग-अलग हिस्सों में हाल के महीनों में हुई भीषण बस दुर्घटनाओं ने इस पूरी व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी है। इसके बावजूद यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के दावों पर अमल होता नजर नहीं आ रहा है, जिससे आम आदमी का सड़क सफर असुरक्षित होता जा रहा है।
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संसद में उठे आंकड़े और लगातार बढ़ती मौतें
हाल ही में संसद के सत्र के दौरान केंद्र सरकार ने एक लिखित जवाब में चौंकाने वाले आंकड़े पेश किए थे। सरकार ने स्वीकार किया कि पिछले तीन वर्षों के भीतर चलती हुई बसों में आग लगने की कम से कम 45 बड़ी घटनाएं दर्ज की जा चुकी हैं। इन भयानक हादसों में 64 से अधिक यात्रियों की तड़प-तड़पकर मौत हो गई, जबकि सैकड़ों लोग गंभीर रूप से झुलस गए। इन आंकड़ों के सामने आने के बाद राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी कड़ा रुख अपनाया है और सभी राज्यों के मुख्य सचिवों को नोटिस जारी कर सुरक्षा मानकों का सख्ती से पालन कराने के निर्देश दिए हैं।
मथुरा के पास घने कोहरे के बीच हुई गाड़ियों की टक्कर हो या फिर आंध्र प्रदेश और राजस्थान के हाईवे पर स्लीपर बसों में अचानक लगी आग, हर जगह मंजर बेहद डरावना रहा है। कई मामलों में तो टक्कर के बिना ही गाड़ी के अंदर से धुआं उठने लगा और देखते ही देखते पूरी बस आग की चपेट में आ गई। इन घटनाओं के बाद से यात्रियों के मन में रात के सफर को लेकर एक स्वाभाविक डर बैठ गया है, क्योंकि उन्हें नहीं पता कि उनका यह सफर सुरक्षित मंजिल तक पहुंचेगा या नहीं।
लोकल बॉडी बिल्डिंग और घटिया वायरिंग का खतरनाक खेल
आखिर इन लग्जरी एसी स्लीपर बसों में अचानक आग लगने की मुख्य वजह क्या है? इस सवाल का जवाब तलाशने पर परिवहन क्षेत्र की कई चौंकाने वाली असलियत सामने आती है। ऑटोमोबाइल विशेषज्ञों के अनुसार, मूल निर्माता कंपनियों द्वारा बनाई जाने वाली स्टैंडर्ड बसें काफी महंगी होती हैं। इन स्टैंडर्ड गाड़ियों की कीमत लगभग दो करोड़ रुपये तक होती है। इस भारी-भरकम खर्च से बचने के लिए कई ऑपरेटर साधारण और कम कीमत वाले चेसिस खरीदते हैं और उन्हें स्थानीय स्तर पर कस्टमाइज कराकर स्लीपर बस में बदलवा लेते हैं।
लोकल स्तर पर तैयार होने वाली इन बसों की लागत आधी से भी कम आती है, लेकिन इसमें सुरक्षा मानकों की भारी अनदेखी की जाती है। इन बसों में लगातार 14 से 15 घंटे तक एसी, तेज लाइटिंग और मोबाइल चार्जिंग पॉइंट चलते रहते हैं, जिससे तारों पर अत्यधिक इलेक्ट्रिकल लोड पड़ता है। मल्टीप्लेक्स वायरिंग की जगह सस्ते और घटिया क्वालिटी के तारों का इस्तेमाल किया जाता है, जो थोड़ा सा भी लोड बढ़ने पर गर्म होकर पिघलने लगते हैं। यही चिंगारी देखते ही देखते विकराल आग का रूप धारण कर लेती है।
अंदरूनी तंग लेआउट और सुरक्षा उपकरणों का अभाव
तकनीकी गड़बड़ी के अलावा इन बसों का अंदरूनी ढांचा भी किसी मौत के जाल से कम नहीं होता है। अधिक से अधिक यात्रियों को बैठाने के चक्कर में ऑपरेटर बस के भीतर सीटों और बर्थ की संख्या बहुत बढ़ा देते हैं। इसके कारण अंदर की गलियां इतनी संकरी हो जाती हैं कि आपात स्थिति में दो लोग एक साथ बाहर नहीं निकल सकते। नियमों के विपरीत कई बार आपातकालीन द्वारों को भी सीटों से पैक कर दिया जाता है या वे जाम मिलते हैं।
"देश के हाईवे पर दौड़ रही अनगिनत कस्टमाइज्ड स्लीपर बसें तकनीकी और सुरक्षा पैमानों पर खरी नहीं उतरती हैं। जब तक लोकल रेट्रोफिटिंग और अवैध संशोधनों पर पूरी तरह रोक नहीं लगाई जाती, तब तक ऐसे दर्दनाक हादसों को रोक पाना बेहद मुश्किल होगा।" — सड़क सुरक्षा विशेषज्ञ
इसके अलावा, इन बसों के अंदर इस्तेमाल होने वाला फोम और फैब्रिक बेहद ज्वलनशील होता है, जो आग को कुछ ही पलों में पूरी बस में फैला देता है। अधिकांश बसों में आग बुझाने वाले यंत्र (फायर एक्सटिंग्विशर) या आपातकालीन स्थिति में कांच तोड़ने के लिए हथौड़े तक मौजूद नहीं होते हैं। नतीजा यह होता है कि जब तक यात्री संभल पाते हैं, तब तक आग इतनी बेकाबू हो जाती है कि किसी को भी बचा पाना मुमकिन नहीं रहता।
नियमों की कागजी औपचारिकता और आगे की राह
देश में सड़क परिवहन और वाहनों के डिजाइन के लिए कड़े नियम बनाए गए हैं, लेकिन इनका जमीन पर क्रियान्वयन बेहद कमजोर है। आरटीओ स्तर पर तकनीकी रूप से प्रशिक्षित अधिकारियों और इंजीनियरों की भारी कमी के कारण गाड़ियों का सही फिजिकल वेरिफिकेशन नहीं हो पाता है। कई बार ऑपरेटर टैक्स और नियमों की सख्ती से बचने के लिए ऐसे राज्यों से बसों का रजिस्ट्रेशन करवा लेते हैं, जहां जांच की प्रक्रिया काफी ढीली होती है। इसके बाद वे उन गाड़ियों को देश भर के व्यस्त हाईवे पर धड़ल्ले से चलाते हैं।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई देशों ने इस तरह के जोखिमों को भांपते हुए कड़े कदम उठाए हैं। उदाहरण के लिए, चीन ने एक दशक पहले इसी तरह के जानलेवा हादसों के बाद स्लीपर बसों के संचालन पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया था। अब भारत सरकार भी केवल मूल निर्माता कंपनियों द्वारा निर्मित और प्रमाणित बसों को ही अनुमति देने पर विचार कर रही है। जब तक परिवहन विभाग सख्ती से इन नियमों का पालन नहीं कराता और अवैध संशोधनों पर लगाम नहीं लगती, तब तक आम जनता का यह सफर यूं ही जानलेवा बना रहेगा।








