नींद की आगोश में जाते ही क्यों महसूस होता है खाई में गिरने का झटका?
रात के सन्नाटे में जब आंखें मूंदकर आप गहरी नींद में उतरने की तैयारी कर रहे होते हैं, तो कई बार अचानक शरीर में एक जोरदार झटका लगता है। ऐसा लगता है मानो आप किसी ऊंचे पहाड़ या सीढ़ी से नीचे की तरफ लुढ़क रहे हों। इस तीव्र अहसास के साथ ही आंखें फौरन खुल जाती हैं, दिल तेजी से धड़कने लगता है और आप कुछ पलों के लिए भ्रम की स्थिति में आ जाते हैं। क्या आपके साथ भी कभी ऐसा हुआ है? यदि हां, तो आपको यह जानकर राहत मिलेगी कि इस अनुभव से गुजरने वाले आप अकेले नहीं हैं। दुनिया भर में करोड़ों लोग इस अजीबोगरीब शारीरिक अनुभव का सामना करते हैं।
चिकित्सा विज्ञान और न्यूरोलॉजी की भाषा में इस परिघटना को 'हाइपनिक जर्क' (Hypnic Jerk) के नाम से जाना जाता है। इसे कई जगहों पर 'हिप्नागॉजिक जर्क', 'स्लीप स्टार्ट' या 'नाइट स्टार्ट' भी कहा जाता है। यह मुख्य रूप से तब होता है जब शरीर जागृत अवस्था से निकलकर पूरी तरह से नींद की शुरुआती अवस्था में प्रवेश कर रहा होता है। इस दौरान मांसपेशियां अनैच्छिक रूप से तेजी से सिकुड़ती हैं, जिसके कारण शरीर को एक जोरदार झटका महसूस होता है। कई लोगों को इसके साथ ही सपने जैसा अहसास भी होता है कि वे किसी गड्ढे में गिर गए हैं या उनका पैर अचानक फिसल गया है।
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मस्तिष्क और मांसपेशियों के बीच असमंजस की स्थिति
वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं ने इस विषय पर कई तरह के अध्ययन किए हैं, हालांकि इसके सटीक और अंतिम कारणों को लेकर अभी भी पूरी तरह से सहमति नहीं बन पाई है। क्लीवलैंड क्लिनिक और अन्य प्रमुख स्वास्थ्य संस्थानों के विशेषज्ञों के अनुसार, इसके पीछे सबसे प्रमुख सिद्धांत यह है कि जब इंसान सोने की कोशिश करता है, तो उसकी मांसपेशियां धीरे-धीरे आराम की मुद्रा यानी रिलैक्स होने लगती हैं। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान दिमाग शरीर की बदलती हुई अवस्था और कम होती हलचल को गलत तरीके से इंटरप्रेट कर सकता है।
इसे एक बेहद सरल उदाहरण के जरिए समझा जा सकता है। कल्पना कीजिए कि आप किसी सीढ़ी पर चढ़ रहे हैं और अचानक आपका पैर थोड़ा सा डगमगा जाता है। ऐसी स्थिति में आपका मस्तिष्क तुरंत हरकत में आता है और शरीर का संतुलन बनाए रखने के लिए मांसपेशियों को कसने का निर्देश देता है ताकि आप गिरें नहीं। ठीक इसी प्रकार, जब बिस्तर पर लेटे-लेटे शरीर तेजी से रिलैक्स होता है, तो दिमाग को लगता है कि शरीर का संतुलन बिगड़ रहा है और आप कहीं गिर रहे हैं। खुद को बचाने की इसी आंतरिक और तात्कालिक प्रतिक्रिया के तहत दिमाग मांसपेशियों को अचानक एक्टिव कर देता है, जिससे पूरे शरीर में एक तेज झटका महसूस होता है।
नर्वस सिस्टम का 'मिसफायर' और स्लीप-वेक ट्रांजिशन
स्लीप फाउंडेशन की रिपोर्ट्स बताती हैं कि हाइपनिक जर्क और इस श्रेणी की अन्य मांसपेशी प्रतिक्रियाएं दिमाग के उस हिस्से से जुड़ी होती हैं जो 'स्टार्टल रिस्पॉन्स' यानी अचानक चौंक जाने पर शरीर की प्रतिक्रिया को नियंत्रित करता है। जब हम सोने की प्रक्रिया में होते हैं, तो नर्वस सिस्टम में लगातार बदलाव हो रहे होते हैं। इस ट्रांजिशन फेज के दौरान न्यूरोट्रांसमीटर और मस्तिष्क के तंत्रिका तंत्र में संकेतों का आदान-प्रदान हो रहा होता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस दौरान कभी-कभार रेटिक्युलर ब्रेनस्टेम की नसों के बीच एक तरह का 'मिसफायर' हो सकता है। इस तकनीकी गड़बड़ी की वजह से मांसपेशियों को अचानक सक्रिय होने का गलत संदेश मिल जाता है। परिणाम यह होता है कि हाथ, पैर या पूरा शरीर एक सेकंड के हजारवें हिस्से में झटके से हिल उठता है। यह पूरी तरह से न्यूरोलॉजिकल बदलावों का परिणाम है जो नींद के शुरुआती क्षणों में घटित होते हैं। हालांकि यह सुनने में थोड़ा डरावना लग सकता है, लेकिन चिकित्सा जगत इसे एक सामान्य शारीरिक गतिविधि मानता है जिससे किसी भी प्रकार के स्थायी नुकसान का खतरा नहीं होता है।
विकासवादी सिद्धांत: क्या यह पूर्वजों की कोई पुरानी याद है?
हाइपनिक जर्क को समझने के लिए वैज्ञानिकों द्वारा एक बेहद दिलचस्प इवोल्यूशनरी यानी विकासवादी थ्योरी भी दी जाती है। इस वैचारिक दृष्टिकोण के अनुसार, हमारे बहुत प्राचीन पूर्वज यानी आदिमानव पेड़ों पर सोते थे या खुले में रात गुजारते थे। उस दौर में सोते समय शरीर का अचानक पूरी तरह से ढीला पड़ जाना किसी पेड़ की डाल से नीचे गिरने के बड़े जोखिम को आमंत्रित कर सकता था।
"विकास के लंबे सफर के दौरान मानव मस्तिष्क ने ऐसी सुरक्षा प्रणालियां विकसित की होंगी जो नींद में शरीर के संतुलन बिगड़ने पर उसे तुरंत सतर्क कर सकें। यही कारण है कि मांसपेशियों के रिलैक्स होने को दिमाग ने संभावित खतरे के रूप में पहचानना सीखा होगा ताकि व्यक्ति जागकर खुद को संभाल सके।" — डॉ. आलोक शर्मा, वरिष्ठ न्यूरोलॉजिस्ट
यद्यपि यह सिर्फ एक विकासवादी परिकल्पना है और इसे अकाट्य वैज्ञानिक प्रमाण के रूप में स्थापित नहीं किया गया है, फिर भी यह थ्योरी इस बात को काफी हद तक तार्किक रूप से समझाती है कि क्यों हमारा शरीर जरा सी हलचल या रिलैक्सेशन पर भी इतनी तेजी से प्रतिक्रिया देता है। हमारे भीतर आज भी वो प्राचीन रक्षात्मक प्रणालियां किसी न किसी रूप में सक्रिय रहती हैं।
किन कारणों से बढ़ जाती है इस झटके की आवृत्ति?
यूं तो हाइपनिक जर्क किसी को भी और कभी भी आ सकता है, लेकिन कुछ खास जीवनशैली और स्वास्थ्य से जुड़ी आदतें इस तरह की घटनाओं की आवृत्ति को काफी हद तक बढ़ा सकती हैं। यदि कोई व्यक्ति अत्यधिक मानसिक तनाव, एंग्जाइटी या डिप्रेशन से जूझ रहा है, तो उसके मस्तिष्क में न्यूरोलॉजिकल गतिविधियां अधिक होती हैं, जिसके कारण रात को ऐसे झटके अधिक महसूस हो सकते हैं।
इसके अलावा, जो लोग सोने से ठीक पहले अत्यधिक मात्रा में कैफीन यानी कॉफी या चाय का सेवन करते हैं, उनका नर्वस सिस्टम लंबे समय तक उत्तेजित रहता है। इसके साथ ही शारीरिक थकान, नींद का अनियमित चक्र और शाम के वक्त भारी कसरत करना भी इस तरह के स्लीप जर्क को ट्रिगर कर सकता है। यदि आप भी चाहते हैं कि आपको रात में सुकून भरी नींद मिले और ऐसे झटकों से मुक्ति मिले, तो अपने सोने के समय को नियमित करें और बिस्तर पर जाने से कम से कम दो घंटे पहले किसी भी तरह के कैफीन युक्त पेय पदार्थों से दूरी बना लें।







