महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई से लेकर ग्रामीण इलाकों तक सियासी पारा इन दिनों चरम पर है। गूगल ट्रेंड्स में शीर्ष पर चल रहे राज्य के राजनीतिक घटनाक्रम में उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस केंद्र बिंदु बने हुए हैं। एक तरफ जहां राज्य के विधान परिषद यानी एमएलसी चुनाव के दौरान गठबंधन के भीतर खींचतान और एकनाथ शिंदे की नाराजगी की चर्चाएं जोर पकड़ रही हैं, वहीं दूसरी तरफ फडणवीस ने खुलकर इन अटकलों पर अपनी बात रखी है। द फ्रीलान्स की ग्राउंड टीम ने जब सियासी गलियारों और जनता के बीच जाकर पड़ताल की, तो पता चला कि सरकार के भीतर समन्वय बिठाने की पूरी जिम्मेदारी इस वक्त देवेंद्र फडणवीस के कंधों पर ही टिकी हुई है।
राजनीतिक बयानों और कानूनी मोर्चों पर भी फडणवीस काफी आक्रामक नजर आ रहे हैं। हाल ही में वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण के साथ हुए वैचारिक टकराव पर फडणवीस ने बेहद तीखा और चर्चित अंदाज में पलटवार किया है। सोशल मीडिया और राजनीतिक हलकों में उनके इस नए तेवर की काफी चर्चा हो रही है। जानकारों का मानना है कि फडणवीस अपने बयानों के जरिए विरोधियों को कड़ा संदेश दे रहे हैं। हालांकि, इन सियासी बहसों के बीच आम जनता और किसानों के असली मुद्दे कहीं पीछे छूटते नजर आ रहे हैं, जिन्हें लेकर विपक्ष लगातार सरकार को घेरने की कोशिश कर रहा है।
महाराष्ट्र के 305 तालुकों में सूखे का गंभीर संकट
सियासी बयानबाजी से इतर महाराष्ट्र के खेतों की तस्वीर बेहद डरावनी और चिंताजनक है। राज्य के करीब 305 तालुकों में इस वक्त भयंकर सूखा पड़ा है, जिससे किसान बुरी तरह त्रस्त हैं। द फ्रीलान्स की टीम ने मराठवाड़ा और विदर्भ के कुछ सूखा प्रभावित इलाकों का दौरा किया, जहां किसानों ने अपनी बर्बादी की दास्तान सुनाई। लगातार कम बारिश और सिंचाई के साधनों की कमी के कारण खरीफ की फसलें या तो सूख चुकी हैं या उनकी पैदावार बहुत कम हुई है। कर्ज के जाल में फंसे किसानों के सामने इस वक्त परिवार का गुजारा चलाना भी मुश्किल हो गया है, और वे सरकार से तुरंत राहत पैकेज की उम्मीद लगाए बैठे हैं।
किसानों की इस बदहाली पर विपक्ष लगातार सरकार से जवाब मांग रहा है और विशेष आर्थिक मदद की मांग कर रहा है। हालांकि, राज्य सरकार ने दिवाली से पहले किसानों के लिए कुछ राहत योजनाओं और वित्तीय मदद के ऐलान किए हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर ये सहायता अभी तक हर पीड़ित किसान तक पूरी तरह नहीं पहुंच पाई है। प्रशासनिक सुस्ती और कागजी कार्रवाई के चलते किसानों को मिलने वाली मदद में देरी हो रही है, जिससे ग्रामीण इलाकों में सरकार के खिलाफ गुस्सा भी सुलग रहा है।
गन्ना किसानों का आंदोलन और चीनी मिलों की पेराई
सूखे और राजनीतिक तनाव के बीच महाराष्ट्र की अर्थव्यवस्था से जुड़ा एक और बड़ा मुद्दा गरमाया हुआ है। राज्य में गन्ना उत्पादक किसान आंदोलन की राह पर हैं और गन्ने के उचित दाम की मांग कर रहे हैं। इस गंभीर स्थिति को संभालते हुए उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने गन्ना आंदोलनकारियों से सीधी अपील की है। उन्होंने किसान नेताओं से अनुरोध किया है कि वे राज्य की चीनी मिलों में जल्द से जल्द पेराई शुरू होने दें ताकि फसल समय पर कटे और मिलों का संचालन सुचारू रूप से चल सके।
चीनी मिलों के सुचारू संचालन और किसानों को समय पर भुगतान मिलने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बड़ी राहत मिलती है। फडणवीस के इस दखल के बाद कुछ इलाकों में किसान संगठनों के साथ स्थानीय प्रशासन की बातचीत सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ी है। मिल मालिकों और किसानों के बीच मूल्य को लेकर चल रहे गतिरोध को खत्म करने के लिए बैठकों का दौर जारी है। द फ्रीलान्स की पड़ताल बताती है कि अगर इस मामले को जल्द नहीं सुलझाया गया, तो यह आंदोलन राज्य के दूसरे हिस्सों में भी फैल सकता है, जिससे सरकार की मुश्किलें और बढ़ सकती हैं।
गठबंधन की भीतरखाने कलह और भविष्य की राजनीतिक चालें
महाराष्ट्र विधान परिषद के चुनावों के दौरान सहयोगी दलों के बीच आपसी तालमेल को लेकर कई तरह के सवाल खड़े हुए हैं। मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के खेमे की कथित नाराजगी की खबरों ने राजनीतिक बाजार को गर्म कर रखा है। जब इस बारे में देवेंद्र फडणवीस से सवाल किया गया, तो उन्होंने बहुत ही नपे-तुले शब्दों में प्रतिक्रिया दी और गठबंधन में किसी भी तरह के बड़े मतभेद से इनकार किया। उन्होंने साफ किया कि महायुति गठबंधन पूरी तरह मजबूत है और सभी फैसले आपसी सहमति से लिए जा रहे हैं।
इसके बावजूद, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आगामी स्थानीय निकाय चुनावों और विधानसभा की रणनीतियों को लेकर दलों के भीतर सीटों के बंटवारे और वर्चस्व की जंग अभी से शुरू हो चुकी है। देवेंद्र फडणवीस अपनी कुशल कूटनीति के लिए जाने जाते हैं और वे इन सभी अंदरूनी कलह को शांत करने की कोशिश में जुटे हैं। द फ्रीलान्स की अंतिम ग्राउंड रिपोर्ट यही कहती है कि आने वाले दिनों में फडणवीस के सामने सूखे से निपटना, किसानों को राहत देना और गठबंधन को एकजुट रखना सबसे बड़ी और कठिन परीक्षाएं होंगी।







