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चुनाव आयोग के भीतर बढ़ी आंतरिक कलह: मतदाता सूची पुनरीक्षण पर दो निर्वाचन आयुक्तों ने उठाए गंभीर सवाल

भारत निर्वाचन आयोग के भीतर विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया को लेकर गंभीर मतभेद सामने आए हैं। मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों के बीच फैसलों को लेकर असहमति और आपत्तियों ने लोकतांत्रिक व्यवस्था की पारदर्शिता पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।
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24 सितंबर 2026 • अपडेटेड
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चुनाव आयोग के भीतर बढ़ी आंतरिक कलह: मतदाता सूची पुनरीक्षण पर दो निर्वाचन आयुक्तों ने उठाए गंभीर सवाल
📷 चुनाव आयोग के भीतर बढ़ी आंतरिक कलह: मतदाता सूची पुनरीक्षण पर दो निर्वाचन आयुक्तों ने उठाए गंभीर सवाल — मुख्य घटनाक्रमफोटो साभार: रॉयटर्स / एजेंसीज़ / सोशल मीडिया

खबर की बड़ी बातें (Key Highlights)

  • भारत निर्वाचन आयोग के भीतर विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया को लेकर गंभीर मतभेद सामने आए हैं। मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों के बीच फैसलों को लेकर असहमति और आपत्तियों ने लोकतांत्रिक व्यवस्था की पारदर्शिता पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।
  • इस खबर से जुड़े सभी पहलुओं की जांच और निगरानी संबंधित विभागों द्वारा की जा रही है।
  • विशेषज्ञों के अनुसार इस घटनाक्रम का आम जनता पर सीधा असर पड़ सकता है।
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चुनाव आयोग के भीतर आंतरिक मतभेद और फैसलों पर सवाल

भारत के लोकतांत्रिक ढांचे की रीढ़ माने जाने वाले निर्वाचन आयोग के भीतर इन दिनों सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की प्रक्रिया को लेकर आयोग के शीर्ष अधिकारियों के बीच ही गहरे मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं। मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व में उठाए गए कदमों पर खुद आयोग के भीतर से ही सवाल खड़े किए जा रहे हैं। नागरिक समाज और विपक्षी दलों के अलावा अब निर्वाचन आयुक्तों ने भी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर गंभीर चिंता जताई है।

हालिया खुलासों से यह साफ हो गया है कि आयोग के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया में भारी असंगतियां थीं। कई ऐसे अहम फैसले लिए गए, जिनकी जानकारी अन्य निर्वाचन आयुक्तों को समय पर नहीं दी गई। इस स्थिति ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या देश की सबसे बड़ी स्वतंत्र संवैधानिक संस्था अपनी मूल प्राथमिकताओं से भटक रही है, और क्या इसके कामकाज में मनमानेपन की गुंजाइश बढ़ गई है?

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निर्वाचन आयुक्तों की कड़ी आपत्तियां और नियमों की अनदेखी

उपलब्ध जानकारियों के मुताबिक, निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने अक्टूबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच विभिन्न प्रशासनिक निर्णयों पर कम-से-कम 14 बार अपनी लिखित और आधिकारिक आपत्ति दर्ज कराई। उनका साफ कहना था कि कई बड़े और दूरगामी परिणाम वाले फैसले उनकी पीठ पीछे और बिना किसी पूर्व जानकारी के लिए गए।

विशेष रूप से फॉर्म 6 में किए गए बदलावों को लेकर तीखा विरोध देखने को मिला। मई महीने के दौरान निर्वाचन आयुक्त श्री जोशी ने स्पष्ट चेतावनी दी थी कि नए मतदाताओं के आवेदन से जुड़े नियमों में सरकार की विधिवत मंजूरी के बिना कोई बदलाव नहीं किया जा सकता। इसके बावजूद, जुलाई में फॉर्म में ऐसे विवादित सवाल जोड़ दिए गए, जिसमें आवेदक या उसके परिजनों के पिछले एसआईआर डेटाबेस में होने की अनिवार्यता पर सवाल थे। इसे श्री संधू ने सीधे तौर पर “अनधिकृत और अवैध” करार दिया था।

केंद्रीय डेटाबेस का केंद्रीकरण और मैदानी अधिकारियों के अधिकारों में कटौती

मतदाता सूची के डिजिटलीकरण और डेटाबेस के केंद्रीय स्तर पर नियंत्रण को लेकर भी गंभीर प्रशासनिक खामियां उजागर हुई हैं। फील्ड स्तर के चुनाव अधिकारियों और स्थानीय निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों के पास ‘ईआरओनेट’ पोर्टल की पूरी पहुंच नहीं होने की शिकायतें लंबे समय से आ रही थीं।

जानकारों का मानना है कि वैधानिक तौर पर मतदाताओं की पात्रता तय करने का पूरा अधिकार स्थानीय चुनाव अधिकारियों का होता है। हालांकि, केंद्रीय डेटाबेस स्तर पर किए गए कई बड़े संशोधनों के कारण स्थानीय अधिकारियों के इन संवैधानिक अधिकारों को गौण कर दिया गया। इस सेंट्रलाइज्ड कंट्रोल ने न केवल प्रक्रिया को जटिल बनाया, बल्कि जमीनी स्तर पर बड़े पैमाने पर नाम कटने की अनचाही स्थिति भी पैदा कर दी।

पश्चिम बंगाल में बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम हटने का विवाद

इस पूरी कवायद के सबसे बुरे परिणाम पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में देखने को मिले। एक ओर जहां सॉफ्टवेयर जनित तथाकथित “तार्किक विसंगतियों” के आधार पर करीब 60 लाख मतदाताओं को संदिग्ध श्रेणी में चिह्नित कर दिया गया, वहीं दूसरी ओर बिना पुख्ता सत्यापन के 27 लाख से अधिक नाम सूची से बाहर कर दिए गए।

स्थिति तब और हास्यास्पद और चिंताजनक हो गई जब ट्रिब्यूनल के समक्ष लंबित अपीलों का विश्लेषण किया गया। नाम हटाने के खिलाफ दायर अपीलों में से अधिकांश मामलों में न्यायपालिका और ट्रिब्यूनल ने यह पाया कि जिन मतदाताओं के नाम काटे गए थे, वे वास्तव में पूरी तरह पात्र और वैध नागरिक थे। न्यायिक निर्णयों ने साबित कर दिया कि जल्दबाजी में चलाई गई इस प्रक्रिया ने लाखों असली मतदाताओं के मताधिकार पर सीधा प्रहार किया है।

"देश के चुनाव आयोग की निष्पक्षता और स्वायत्तता पर किसी भी तरह का संदेह लोकतंत्र की सेहत के लिए खतरनाक है। नागरिकों के मौलिक मताधिकार से खिलवाड़ करने वाली किसी भी प्रशासनिक प्रक्रिया की गहन जांच और तुरंत सुधार की आवश्यकता है।" — वरिष्ठ कानूनी विशेषज्ञ एवं विश्लेषक

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियां और चयन प्रक्रिया पर उठते सवाल

हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय की एक बेंच में सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति दीपंकर दत्त ने चुनाव आयोग के शीर्ष नेतृत्व के चयन पर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की। उन्होंने रेखांकित किया कि साल 2023 के अधिनियम के तहत चयन पैनल से मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) को हटाकर एक केंद्रीय मंत्री को शामिल किया जाना “धारणा की कसौटी” पर पूरी तरह खरा नहीं उतरता है। इसी विवादित चयन पैनल ने वर्तमान मुख्य निर्वाचन आयुक्त के नाम की अनुशंसा की थी।

विशेषज्ञों का यह भी तर्क है कि एसआईआर का मूल डिजाइन ही त्रुटिपूर्ण है। यह प्रक्रिया पहले नागरिकों के नाम सूची से बाहर करती है और सत्यापन की औपचारिकता बाद में पूरी करती है। इससे नागरिक की पात्रता साबित करने का पूरा बोझ राज्य की मशीनरी के बजाय सीधे आम आदमी पर आ जाता है, जो भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार की बुनियादी भावना के बिल्कुल विपरीत है।

निष्कर्ष और भविष्य की दिशा

वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए यह अनिवार्य हो गया है कि निर्वाचन आयोग अपनी साख और विश्वसनीयता को बहाल करने के लिए सख्त कदम उठाए। जब तक मतदाता सूची के संपूर्ण डेटाबेस का स्वतंत्र और निष्पक्ष ऑडिट नहीं हो जाता, तब तक और अधिक नाम सूची से हटाने की प्रक्रिया पर तुरंत रोक लगाई जानी चाहिए। यदि समय रहते इन गंभीर प्रशासनिक खामियों को दूर नहीं किया गया, तो यह भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था की एक बड़ी विफलता के रूप में दर्ज किया जाएगा।

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