जर्मनी की राजनीति में इस समय हलचल काफी तेज हो चुकी है। देश की राजधानी बर्लिन और उत्तर-पूर्वी राज्य मेक्लेनबुर्ग-वेस्टर्न पोमेरेनिया में विधानसभा चुनावों के लिए मतदान प्रक्रिया जारी है। यूं तो ये दोनों क्षेत्रीय चुनाव हैं, लेकिन इनका राजनीतिक प्रभाव पूरे देश और विशेष रूप से संघीय सरकार की स्थिरता पर पड़ने वाला है। जर्मनी के वर्तमान चांसलर फ्रीडरिष मैर्त्स की राजनीतिक लोकप्रियता पिछले कुछ हफ्तों में तेजी से नीचे आई है, जिसके चलते उन्हें अपनी कुर्सी और पार्टी की साख बचाने के लिए कड़ी मशक्कत करनी पड़ रही है।
विश्लेषकों का मानना है कि इन चुनावों के परिणाम आगामी राष्ट्रीय राजनीति की दिशा तय करेंगे। यदि चांसलर मैर्त्स के नेतृत्व वाली कंजर्वेटिव पार्टी सीडीयू का प्रदर्शन इन चुनावों में निराशाजनक रहता है, तो संघीय सरकार पर जनता का दबाव और अधिक बढ़ जाएगा। हाल ही में सैक्सनी-अनहाल्ट राज्य में हुए चुनावों में सीडीयू को बड़ा झटका लग चुका है, जिससे पार्टी की मुश्किलें और बढ़ गई हैं।
सैक्सनी-अनहाल्ट की हार का असर और चांसलर मैर्त्स की चुनौतियां
चांसलर फ्रीडरिष मैर्त्स के सामने वर्तमान राजनीतिक संकट अचानक नहीं आया है। इसके पीछे कई क्षेत्रीय चुनाव और जनता के बीच बढ़ती नाराजगी मुख्य वजहें हैं। सबसे बड़ा झटका उन्हें तब लगा जब सैक्सनी-अनहाल्ट राज्य में उनकी सेंटर-राइट पार्टी 'क्रिश्चियन डेमोक्रैटिक यूनियन (सीडीयू)' को करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा। इस चुनाव में धुर-दक्षिणपंथी पार्टी 'ऑल्टरनेटिव फॉर जर्मनी (एएफडी)' ने करीब 44 फीसदी वोट हासिल कर सबको चौंका दिया और सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी।
इस हार के बाद से ही चांसलर मैर्त्स की नीतियों और उनकी पार्टी के कामकाज पर सवाल उठने लगे हैं। बर्लिन और मेक्लेनबुर्ग-वेस्टर्न पोमेरेनिया के चुनाव उनके लिए अग्निपरीक्षा से कम नहीं हैं। यदि इन राज्यों में भी उनकी पार्टी बेहतर प्रदर्शन करने में नाकाम रहती है, तो पार्टी के भीतर भी उनके नेतृत्व को चुनौती मिल सकती है। विपक्षी दल इस स्थिति का पूरा फायदा उठाने की फिराक में हैं।
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बर्लिन में सत्ताधारी सीडीयू और वामपंथी डी लिंके के बीच कड़ी टक्कर
जर्मनी की राजधानी बर्लिन में मुकाबला बेहद दिलचस्प और कड़ा बना हुआ है। यहां सत्ताधारी सीडीयू और वामपंथी पार्टी 'डी लिंके' के बीच कांटे की टक्कर है। बर्लिन देश के 16 राज्यों में से एक होने के साथ-साथ राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र भी है। ताजा सर्वे के अनुसार, दोनों ही दलों को लगभग 20 से 23 फीसदी तक जनसमर्थन मिलता दिख रहा है, जबकि धुर-दक्षिणपंथी एएफडी यहां तीसरे स्थान पर बनी हुई है। बर्लिन चुनाव में कुल 17 राजनीतिक दल अपनी किस्मत आजमा रहे हैं।
बर्लिन में चुनाव प्रचार के दौरान मुख्य मुकाबला डी लिंके और चांसलर मैर्त्स की पार्टी के बीच ही सिमटता नजर आया है। चुनाव मैदान में डी लिंके की ओर से एलिफ एराल्प पहली बार मुख्य उम्मीदवार के रूप में पार्टी का नेतृत्व कर रही हैं। म्यूनिख में जन्मी एलिफ एराल्प को लेकर राजनीतिक गलियारों में खासी चर्चा है। बर्लिन के मौजूदा मुख्यमंत्री काई वेगनर के चुनावी दौड़ से हटने के बाद श्टेफान एवर्स सीडीयू के मुख्य चेहरे के रूप में मैदान में हैं, जो बर्लिन के मौजूदा वित्त मंत्री भी हैं।
आवास संकट और महंगाई बने बर्लिन चुनाव के सबसे बड़े मुद्दे
बर्लिन के मतदाताओं के लिए इस बार सबसे बड़ा मुद्दा आम जीवन से जुड़ा हुआ है। जर्मन राजधानी इस समय गंभीर आवास संकट से जूझ रही है। आंकड़ों के मुताबिक, इस शहर में करीब 85 फीसदी लोग किराए के मकानों में रहने को मजबूर हैं। यही वजह है कि मकान और किराए का बढ़ता खर्च आम जनता की सबसे बड़ी चिंता बन चुका है। साल 2014 के बाद से बर्लिन में विज्ञापित किराए दोगुने से ज्यादा हो चुके हैं, और अनुमान है कि साल 2040 तक शहर को दो लाख से अधिक नए घरों की जरूरत होगी।
"बर्लिन के नागरिकों को लगातार महंगे होते किराए और आवास की भारी कमी से जूझना पड़ रहा है, जिसे हल करना हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता है। शहर के लोगों को किफायती घर उपलब्ध कराना ही इस चुनाव का सबसे बड़ा संदेश है।" — एलिफ एराल्प, मुख्य उम्मीदवार, डी लिंके
राजनीतिक दलों ने भी इस मुद्दे को अपने घोषणापत्र के केंद्र में रखा है। वामपंथी पार्टी डी लिंके एकमात्र ऐसा बड़ा दल रही है जिसने साल 2021 के एक जनमत संग्रह पर ठोस कार्रवाई करने का वादा किया है। उस जनमत संग्रह में बर्लिन के 59 प्रतिशत निवासियों ने किराए को नियंत्रित करने के लिए बड़े मकान मालिकों के अपार्टमेंट्स को सरकारी नियंत्रण में लेने के पक्ष में मतदान किया था। दूसरी ओर, एएफडी इस आवासीय संकट को अप्रवासन यानी इमिग्रेशन से जोड़कर अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने में जुटी है।
मेक्लेनबुर्ग-वेस्टर्न पोमेरेनिया में एसपीडी और एएफडी के बीच कड़ा मुकाबला
उत्तर-पूर्वी राज्य मेक्लेनबुर्ग-वेस्टर्न पोमेरेनिया में चुनावी समीकरण बर्लिन से थोड़े अलग हैं। यह जर्मनी का सबसे कम आमदनी और सबसे कम जनसंख्या घनत्व वाला राज्य माना जाता है, जो कभी पूर्वी जर्मनी का हिस्सा हुआ करता था। इस राज्य में साल 1998 से लगातार सोशल डेमोक्रैटिक पार्टी (एसपीडी) के नेतृत्व में सरकारें बनती रही हैं। मौजूदा मुख्यमंत्री मानुएला श्वेजिष यहां की एक लोकप्रिय राजनेता हैं और अपनी पार्टी की तरफ से मुख्यमंत्री पद की सबसे मजबूत दावेदार हैं।
हालांकि, इस राज्य में भी धुर-दक्षिणपंथी पार्टी एएफडी ने अपनी जड़ें काफी गहरी कर ली हैं। चुनाव प्रचार के दौरान शुरुआती हफ्तों में एएफडी बढ़त बनाए हुए थी, लेकिन ताजा सर्वे बताते हैं कि एसपीडी लगभग 37 फीसदी समर्थन के साथ एएफडी से महज एक फीसदी आगे निकल गई है। लाइफ-एरिक होल्म इस राज्य में एएफडी की ओर से मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार हैं, जो पार्टी के संस्थापक सदस्यों में शामिल हैं।
क्या एएफडी को मिल पाएगी सत्ता की चाबी?
मेक्लेनबुर्ग-वेस्टर्न पोमेरेनिया में यदि एएफडी चुनाव जीत भी जाती है, तब भी यह बिल्कुल तय नहीं है कि वह राज्य में सरकार बना पाएगी या नहीं। जर्मन संसदीय लोकतंत्र की प्रणाली के तहत किसी भी दल को सरकार बनाने के लिए विधानसभा में स्पष्ट बहुमत या मजबूत गठबंधन सहयोगियों की आवश्यकता होती है। जर्मनी की अन्य प्रमुख पार्टियों ने एक सख्त राजनीतिक 'फायरवॉल' नीति अपना रखी है, जिसके तहत वे किसी भी स्थिति में धुर-दक्षिणपंथी एएफडी के साथ गठबंधन करने से साफ इनकार करती रही हैं।
यदि अन्य दल एएफडी के साथ सहयोग करने से पूरी तरह से पीछे हटते हैं, तो सबसे आगे रहने के बावजूद एएफडी सत्ता से बाहर रह सकती है। इन चुनावों के नतीजे आने वाले दिनों में जर्मन राजनीति के भविष्य की नई इबारत लिखेंगे, जिस पर पूरे यूरोप की नजरें टिकी हुई हैं।





