हामिद अंसारी के बयान से गरमाई सियासत, नेहरू के हवाले से दिया था बड़ा बयान
देश की राजनीति में एक बार फिर वैचारिक बयानबाजी तेज हो गई है। हाल ही में नई दिल्ली के इंडिया इस्लामिक कल्चरल सेंटर में आयोजित तीसरे एजी नुरानी मेमोरियल लेक्चर में देश के पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी शामिल हुए थे। इस कार्यक्रम के दौरान उन्होंने देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के एक पुराने बयान को याद किया, जिसके बाद देश के राजनीतिक गलियारों में बहस छिड़ गई है। हामिद अंसारी ने पूर्व विदेश सचिव जगत सिंह गुंडेविया के दस्तावेजों का हवाला देते हुए कहा था कि नेहरू का मानना था कि भारत को असली खतरा कम्युनिज्म से नहीं, बल्कि हिंदू दक्षिणपंथी सांप्रदायिकता से था।
इस बयान के सामने आने के बाद से ही राजनीतिक और धार्मिक हलकों में प्रतिक्रियाओं का दौर शुरू हो गया है। विभिन्न दलों के नेताओं और धार्मिक संगठनों के प्रमुखों ने इस पर अपनी-अपनी राय रखी है। जहां एक ओर इसे लेकर तीखी बयानबाजी हो रही है, वहीं दूसरी ओर सामाजिक स्तर पर भी इस पर चर्चा छिड़ गई है कि क्या इस तरह के बयानों से समाज में ध्रुवीकरण बढ़ता है या फिर वैचारिक बहस के अपने मायने हैं।
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मौलाना साजिद रशीदी की दो टूक: 'मुट्ठी भर लोगों की वजह से सबको बुरा न कहें'
इस पूरे घटनाक्रम के बीच ऑल इंडिया इमाम एसोसिएशन के अध्यक्ष मौलाना साजिद रशीदी का बयान सामने आया है, जिन्होंने हामिद अंसारी के रुख से असहमति जताई है। मौलाना रशीदी ने कहा कि जब हामिद अंसारी देश के उपराष्ट्रपति जैसे संवैधानिक पद पर थे, तब उन्होंने अपने पूरे कार्यकाल के दौरान कभी मुसलमानों के मुद्दों पर खुलकर बात नहीं की, लेकिन पद छोड़ने के बाद वे लगातार इस तरह के बयान दे रहे हैं।
मौलाना रशीदी ने आगे कहा कि किसी भी समुदाय या वर्ग में कुछ लोग ही ऐसे होते हैं जो विवादित हरकतों में शामिल होते हैं। ऐसे में केवल कुछ लोगों की वजह से पूरे समाज को कठघरे में खड़ा करना उचित नहीं है। उन्होंने कहा कि अक्सर यह कहा जाता है कि सभी मुसलमान आतंकवादी हैं या इस्लाम आतंकवाद का समर्थन करता है, जो कि बिल्कुल गलत है। ठीक इसी प्रकार, किसी खास विचारधारा या धर्म के सभी लोगों को एक ही चश्मे से देखना सही नहीं है।
"मेरा ये मानना है कि जो लोग हैं, वो मुट्ठी भर हैं और उनकी वजह से जो अच्छे लोग हैं, उनको भी बुरा भला नहीं कहना चाहिए। सबको एक जैसी श्रेणी में रखना और दोष देना गलत है।" — मौलाना साजिद रशीदी, अध्यक्ष, ऑल इंडिया इमाम एसोसिएशन
केंद्रीय मंत्री किरण रिजिजू और वीएचपी का तीखा हमला
हामिद अंसारी के इस बयान पर केवल धार्मिक संगठनों के नेताओं ने ही नहीं, बल्कि केंद्र सरकार के मंत्रियों ने भी कड़ी आपत्ति जताई है। केंद्रीय मंत्री किरण रिजिजू ने सोशल मीडिया और बयानों के जरिए अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यही देश की सबसे बड़ी विडंबना है। उन्होंने कहा कि ऐसे मंचों से देश की संस्कृति और बहुसंख्यक समाज पर सवाल उठाए जाते हैं, जबकि कट्टरपंथियों, धार्मिक उन्मादियों और अलगाववादियों के कृत्यों पर लोग चुप्पी साध लेते हैं।
उधर, विश्व हिंदू परिषद (VHP) के राष्ट्रीय प्रवक्ता सुरेंद्र जैन ने भी हामिद अंसारी के बयान पर कड़ा एतराज जताया। उन्होंने कहा कि हामिद अंसारी ने एक बार फिर इस महान देश और उसकी प्राचीन परंपराओं का अनादर करने का प्रयास किया है। वीएचपी नेता ने कहा कि यदि हिंदू समाज सचमुच सांप्रदायिक या कट्टरपंथी होता, तो देश में इस प्रकार की खुली बयानबाजी करने की छूट किसी को नहीं मिलती। उन्होंने आरोप लगाया कि इस तरह के बयानों का उद्देश्य केवल समाज में अनावश्यक भ्रम फैलाना और राजनीतिक एजेंडे को साधना है।
एजी नुरानी मेमोरियल लेक्चर और इतिहास की चर्चा
जिस कार्यक्रम में हामिद अंसारी ने यह बयान दिया, वह 'रिमेंबरिंग अ पॉलीमैथ: द लाइफ एंड टाइम्स ऑफ अब्दुल गफूर नूरानी' विषय पर आयोजित किया गया था। इस कार्यक्रम में देश के संविधान, न्यायपालिका और राजनीतिक इतिहास से जुड़े कई वरिष्ठ लोग शामिल हुए थे। कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य मशहूर लेखक और वकील अब्दुल गफूर नूरानी के जीवन और उनके द्वारा लिखे गए वैचारिक लेखों को याद करना था।
हालांकि, कार्यक्रम में वक्ताओं द्वारा रखे गए विचारों के कुछ अंशों को लेकर राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं तेज हो गईं। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में ऐतिहासिक बयानों और दस्तावेजों की अलग-अलग व्याख्याएं होना आम बात है, लेकिन जब संवैधानिक पदों पर रहे लोग इन बयानों को वर्तमान परिप्रेक्ष्य से जोड़ते हैं, तो यह मुख्यधारा की राजनीति का एक अहम हिस्सा बन जाता है और इस पर लंबी बहस चलती है।
निष्कर्ष और भविष्य की राजनीतिक सरगर्मी
हामिद अंसारी के बयान और उस पर मौलाना साजिद रशीदी समेत अन्य हिंदू संगठनों की प्रतिक्रियाओं ने यह साबित कर दिया है कि देश में वैचारिक और सांप्रदायिक मुद्दों पर बहस कितनी संवेदनशील है। एक तरफ जहां ऐसे बयानों को लेकर वैचारिक स्वतंत्रता की दुहाई दी जाती है, वहीं दूसरी तरफ इसे बहुसंख्यक समाज और राष्ट्र की परंपराओं के अपमान के रूप में देखा जाता है। आने वाले दिनों में इस तरह के बयान राजनीतिक मंचों पर बहस का एक बड़ा मुद्दा बने रह सकते हैं, जिससे राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर और तेज होने की संभावना है।


