द फ्रीलान्स ग्राउंड ब्यूरो — शिक्षा का अधिकार यानी आरटीई कानून के तहत गरीब बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य पढ़ाई का हक मिलना चाहिए। लेकिन कई निजी स्कूल इस नियम की लगातार अनदेखी कर रहे हैं। हाल ही में ऐसा ही एक गंभीर मामला सामने आया जहां नियम तोड़ने वाले दो स्कूलों पर शिक्षा विभाग ने एक-एक लाख रुपये का भारी जुर्माना लगाया है। विभाग ने साफ निर्देश दिया है कि सात दिन के भीतर आदेश का पालन नहीं हुआ तो स्कूल की मान्यता रद्द करने की बड़ी कार्रवाई की जाएगी। यह कदम उन तमाम स्कूलों के लिए एक कड़ी चेतावनी है जो आरटीई के नियमों को ताक पर रखकर गरीब बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं।
जमीनी स्तर पर इस योजना की क्या स्थिति है, इसकी पड़ताल करने पर मिले आंकड़े राहत देने वाले हैं। उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले से आई ताजा रिपोर्ट के अनुसार, आरटीई योजना ने वहां के 6,339 बच्चों की जिंदगी बदल दी है। इन बच्चों को जिले के विभिन्न निजी स्कूलों में मुफ्त दाखिला मिला है और वे अपनी पढ़ाई जारी रख पा रहे हैं। स्थानीय स्तर पर अभिभावकों का कहना है कि अगर प्रशासन ऐसे ही सख्ती बनाए रखे, तो हर गरीब बच्चे को अच्छे स्कूल में पढ़ने का सपना सच हो सकता है। प्रशासनिक अधिकारी लगातार इन मामलों पर नजर बनाए हुए हैं ताकि किसी भी पात्र बच्चे का हक न मारा जाए।
फीस प्रतिपूर्ति और आर्थिक प्रबंधन का नया दौर
दूसरी तरफ मध्य प्रदेश सरकार ने भी इस दिशा में बड़ा कदम उठाया है। मुख्यमंत्री मोहन यादव ने आरटीई के तहत पढ़ाने वाले निजी स्कूलों को राहत देते हुए 502 करोड़ रुपये की फीस प्रतिपूर्ति राशि ट्रांसफर करने का फैसला लिया है। सरकार का यह कदम स्कूलों के खातों में सीधे पैसे भेजने के लिए है ताकि स्कूल प्रबंधन आर्थिक तंगी का हवाला देकर गरीब बच्चों के दाखिले से मना न करें। जानकारों का मानना है कि समय पर पैसे मिलने से स्कूल भी उत्साह के साथ आरटीई के तहत बच्चों को प्रवेश देंगे और किसी तरह का बहाना नहीं बना पाएंगे।
शिक्षा विभाग के आंतरिक तंत्र को सुधारने के लिए भी लगातार नए आदेश जारी किए जा रहे हैं। हाल ही में बुलंदशहर से खबर आई है कि अब शिक्षकों के अंतरजनपदीय तबादले भी आरटीई के तय मानकों के आधार पर ही किए जाएंगे। इसका सीधा मतलब यह है कि हर स्कूल में छात्र और शिक्षक का अनुपात बिल्कुल सही होना चाहिए ताकि पढ़ाई की गुणवत्ता पर कोई असर न पड़े। सरकार की यह कोशिश है कि कागजी कार्रवाई से लेकर जमीनी क्रियान्वयन तक, हर स्तर पर नियमों का कड़ाई से पालन हो सके।
ऑनलाइन नशे के कारोबार पर भी उठी गंभीर आवाजें
शिक्षा और बच्चों के भविष्य से जुड़े इस संवेदनशील माहौल के बीच अन्य मोर्चों पर भी बच्चों की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंताएं जताई जा रही हैं। मध्य प्रदेश में एक कार्यक्रम के दौरान पूर्व मंत्री जालम सिंह ने मुख्यमंत्री के सामने बड़ा मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि राज्य में ऑनलाइन माध्यम से नशा बेचा जा रहा है और कुछ बाहरी ताकतें सोची-समझी साजिश के तहत बच्चों को नशे के दलदल में धकेल रही हैं। इस तरह के बयान यह साबित करते हैं कि बच्चों को केवल स्कूल में दाखिला दिलाना ही काफी नहीं है, बल्कि उन्हें समाज में फैल रहे दूसरे गंभीर खतरों से बचाना भी प्रशासन और समाज की उतनी ही बड़ी जिम्मेदारी है।
इन तमाम खबरों और जमीनी रिपोर्टों से यह साफ हो जाता है कि शिक्षा का अधिकार कानून देश के दूर-दराज इलाकों में असर दिखा रहा है। हालांकि, कागजों पर बनी नीतियों को जमीन पर उतारने के लिए प्रशासन को हर रोज नई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। कभी स्कूलों की मनमानी के खिलाफ भारी जुर्माना लगाना पड़ता है, तो कभी समय पर फंड जारी करके व्यवस्था को चलाना पड़ता है। द फ्रीलान्स की टीम इस मामले में आगे भी नजर बनाए रखेगी ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि देश के हर बच्चे को उसका बुनियादी हक बिना किसी रुकावट के मिलता रहे।







