उत्तराखंड की शिक्षा व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल
पहाड़ी राज्यों में सरकारी शिक्षा व्यवस्था की स्थिति हमेशा से बहस का एक बड़ा मुद्दा रही है। इसी कड़ी में अब उत्तराखंड के प्राथमिक विद्यालयों को लेकर राजनीति गरमाने लगी है। कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) ने प्रदेश की पुष्कर सिंह धामी सरकार के खिलाफ सीधा हमला बोलते हुए राज्य के सरकारी स्कूलों की बदहाली पर सवाल खड़े किए हैं। पार्टी का दावा है कि पिछले कुछ वर्षों में राज्य के भीतर सैकड़ों प्राथमिक विद्यालयों पर ताले लटक चुके हैं, जिससे ग्रामीण इलाकों के बच्चों की शुरुआती शिक्षा पर बड़ा संकट खड़ा हो गया है।
यह मामला केवल एक राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर आम जनता और गरीब परिवारों के बच्चों के भविष्य से जुड़ा हुआ है। जब पहाड़ के दूरदराज के इलाकों में प्राथमिक विद्यालय बंद हो जाते हैं, तो छोटे-छोटे बच्चों को कई किलोमीटर का सफर तय करके दूसरे गांवों के स्कूलों में जाना पड़ता है। ऐसे में माता-पिता की चिंताएं स्वाभाविक रूप से बढ़ जाती हैं और वे अपने बच्चों की सुरक्षा और शिक्षा को लेकर आशंकित रहते हैं।
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826 प्राथमिक विद्यालयों के बंद होने का दावा और सरकार से जवाबतलब
राजधानी देहरादून में आयोजित एक महत्वपूर्ण प्रेस वार्ता के दौरान कॉकरोच जनता पार्टी के उत्तर जोन संयोजक श्रेष्ठ सिंह खेड़ा ने आंकड़े पेश करते हुए सरकार को घेरा। उन्होंने दावा किया कि पिछले पांच वर्षों के अंतराल में उत्तराखंड के विभिन्न जिलों में कुल 826 प्राथमिक विद्यालयों को बंद कर दिया गया है। पार्टी ने सरकार से यह कड़ा सवाल पूछा है कि आखिर इन स्कूलों को बंद करने के पीछे की मुख्य वजह क्या थी और जिन बच्चों का भविष्य इन स्कूलों से जुड़ा था, उनके लिए क्या वैकल्पिक व्यवस्था की गई।
पार्टी का कहना है कि सरकार को केवल कागजी आंकड़े पेश करने के बजाय इस बात का स्पष्ट खुलासा करना चाहिए कि बंद हुए स्कूलों की वर्तमान स्थिति क्या है। क्या इन परिसंपत्तियों का कोई अन्य उपयोग किया जा रहा है या फिर ये इमारतें अब वीरान पड़ी हैं। सीजेपी ने मांग की है कि सरकार को इस पूरे मामले पर एक श्वेत पत्र या विस्तृत रिपोर्ट सार्वजनिक करनी चाहिए ताकि जनता के सामने सच आ सके।
शिक्षकों की भारी कमी और बुनियादी सुविधाओं का अभाव
बंद स्कूलों के अलावा वर्तमान में चल रहे सरकारी विद्यालयों की स्थिति भी चिंताजनक बताई जा रही है। सीजेपी नेताओं ने आरोप लगाया है कि प्रदेश के कई सरकारी स्कूलों में गणित और विज्ञान जैसे महत्वपूर्ण विषयों पढ़ाने के लिए नियमित शिक्षक ही उपलब्ध नहीं हैं। जब शुरुआती कक्षाओं और माध्यमिक स्तर पर ही बुनियादी विषयों के शिक्षक नहीं होंगे, तो छात्र उच्च शिक्षा के लिए कैसे तैयार हो पाएंगे।
इसके अलावा, बुनियादी सुविधाओं की कमी भी एक बहुत बड़ा मुद्दा बनकर उभरी है। पार्टी के दावों के अनुसार, राज्य के लगभग 270 ऐसे सरकारी स्कूल हैं जहां आज भी पीने के साफ पानी की कोई व्यवस्था नहीं है। शौचालय, बिजली और चारदीवारी जैसी मूलभूत सुविधाओं के बिना चल रहे इन विद्यालयों में बच्चों का पढ़ना किसी चुनौती से कम नहीं है। पहाड़ के कठिन भौगोलिक हालातों के बीच यदि शिक्षा जैसे जरूरी क्षेत्र में ऐसी लाचारी देखने को मिले, तो यह व्यवस्था पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगाती है।
दस दिन का अल्टीमेटम और बड़े आंदोलन की चेतावनी
सरकार की कार्यप्रणाली से नाराज कॉकरोच जनता पार्टी ने धामी सरकार को सख्त अल्टीमेटम जारी किया है। पार्टी ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि यदि अगले 10 दिनों के भीतर सरकार की ओर से शिक्षा व्यवस्था को सुधारने के लिए कोई ठोस रोडमैप या सकारात्मक कार्रवाई सामने नहीं आती है, तो तीव्र आंदोलन का रास्ता अपनाया जाएगा।
"उत्तराखंड के पहाड़ के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराने के बजाय यदि सरकार केवल तमाशा देखती रहेगी, तो हम चुप नहीं बैठेंगे। दो अक्टूबर के बाद देहरादून में दिल्ली के जंतर-मंतर की तर्ज पर एक बड़ा और व्यापक आंदोलन शुरू किया जाएगा जिसमें शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग प्रमुख होगी।" — श्रेष्ठ सिंह खेड़ा, उत्तर जोन संयोजक, कॉकरोच जनता पार्टी
पार्टी नेताओं ने यह भी संकेत दिए हैं कि इस आगामी आंदोलन में सीजेपी के राष्ट्रीय प्रमुख अभिजीत दीपके के भी शामिल होने की पूरी संभावना है। इससे यह साफ जाहिर होता है कि पार्टी इस मुद्दे को केवल स्थानीय स्तर पर नहीं बल्कि बड़े राज्यव्यापी अभियान के रूप में भुनाने की तैयारी में है।
स्कूल बचाओ अभियान और आगे की राजनीतिक राह
कॉकरोच जनता पार्टी अब अपने 'स्कूल बचाओ अभियान' को उत्तराखंड के कोने-कोने तक ले जाने की रणनीति पर काम कर रही है। पार्टी कार्यकर्ताओं का कहना है कि वे गांवों में जाकर अभिभावकों को जागरूक करेंगे और सरकारी स्कूलों की बदतर हालत के बारे में बताएंगे। दिल्ली में हुए प्रदर्शनों के बाद अब उत्तराखंड के राजनीतिक गलियारों में इस नए मोर्चे ने सरकार की मुश्किलें बढ़ा दी हैं।
आने वाले दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि धामी सरकार सीजेपी के इन गंभीर आरोपों और 10 दिन के अल्टीमेटम पर क्या प्रतिक्रिया देती है। क्या सरकार इन बंद स्कूलों को दोबारा शुरू करने के लिए कोई विशेष नीति लेकर आती है या फिर आंदोलन की यह चेतावनी आने वाले समय में एक बड़ा राजनीतिक संघर्ष का रूप लेगी। फिलहाल, शिक्षा के मोर्चे पर घिरी सरकार के लिए आने वाले कुछ दिन काफी चुनौतीपूर्ण रहने वाले हैं।




