23 महीने पहले जिस बच्चे के लिए अस्पताल का एक कमरा ही उसकी पूरी दुनिया बन गया था, जब उसी कमरे से उसकी विदाई की तैयारी हुई तो डॉक्टर और नर्सों की आंखें नम थीं। एक तरफ केक रखा था तो दूसरी तरफ मिठाइयां। डॉक्टर और नर्सिंग स्टाफ बच्चे के आसपास खड़े थे और मां की आंखों में आंसू थे, लेकिन इस बार इन आंसुओं में डर नहीं, बल्कि अपने जिगर के टुकड़े के घर लौटने की खुशी थी।
दो साल तक पीआईसीयू की चार दीवारों में सिमटी रही दुनिया
जिस 8 साल के बच्चे को 5 अक्टूबर को बेहोशी की हालत में तेज बुखार और हाथ-पैरों के काम न करने की स्थिति में अस्पताल लाया गया था, वह करीब 23 महीने तक पैलिएटिव और पीडियाट्रिक आईसीयू (PICU) में जिंदगी की जंग लड़ता रहा। उसे लंबे समय तक वेंटिलेटर और 100 प्रतिशत ऑक्सीजन सपोर्ट की जरूरत पड़ी। इन दो सालों में बच्चा सिर्फ बीमारी से नहीं लड़ रहा था, बल्कि उसका पूरा परिवार एक अलग ही इम्तहान से गुजर रहा था। मां ने बेटे का सिरहाना नहीं छोड़ा, तो पिता ने अपनी आजीविका यानी टैक्सी चलाना छोड़ दिया। जिस अस्पताल को वे इलाज के लिए आए थे, वह धीरे-धीरे उनका दूसरा घर बन गया।
डॉक्टर और नर्स बन गए परिवार का हिस्सा
इतने लंबे समय तक किसी मरीज के साथ रहना सिर्फ परिवार के लिए कठिन नहीं होता, बल्कि अस्पताल का स्टाफ भी भावनात्मक रूप से उससे जुड़ जाता है। नर्सिंग स्टाफ के मुताबिक, धीरे-धीरे वह बच्चा मरीज से ज्यादा उनके घर के सदस्य जैसा हो गया। परिवार के पास अस्पताल में कोई सामान्य जीवन नहीं था, इसलिए स्टाफ ने उसकी हर छोटी-खुशी को साझा किया। बच्चे का जन्मदिन वार्ड में ही मनाया गया, जहां डॉक्टर और नर्स मिलकर केक काटते और माता-पिता को कुछ पलों के लिए ही सही, लेकिन चिंता भुलाने का मौका देते।
सरकारी अस्पताल और डॉक्टरों का देवदूत जैसा रूप
बच्चे के पिता सोमबीर दहिया, जो दिल्ली में टैक्सी चलाते हैं और परिवार के इकलौते कमाने वाले हैं, ने कहा कि अगर यह इलाज किसी निजी अस्पताल में चलता तो उनका परिवार पूरी तरह आर्थिक रूप से बर्बाद हो जाता। उन्होंने डॉ. कुंदन मित्तल और उनकी पूरी टीम को भगवान का दर्जा देते हुए कहा कि सरकारी अस्पताल और वहां के स्टाफ ने जिस तरह उनके बेटे की दो साल तक देखभाल की, उसका कर्ज वे कभी नहीं चुका सकते।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और विभिन्न रिपोर्ट्स के आधार पर तैयार इस खबर के दावों की सत्यता की 'The Freelance' स्वतंत्र रूप से पुष्टि करता है। यह मामला मेडिकल जगत में संवेदनशीलता और मानवीय जज्बे की एक मिसाल के रूप में चर्चा में है। साभार: संबंधित मीडिया रिपोर्ट्स / अस्पताल प्रशासन।
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