देश की सर्वोच्च अदालत के मुख्य न्यायाधीश ने विपक्षी गठबंधन 'INDIA' ब्लॉक के सांसदों से व्यक्तिगत रूप से मिलने के अनुरोध को अस्वीकार कर दिया है। संसद से लेकर सड़क तक जारी सियासी गहमागहमी के बीच विपक्ष के नेताओं ने मुख्य न्यायाधीश से मुलाकात का समय मांगा था। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने साफ किया कि उन्होंने लिखित पत्र के माध्यम से सांसदों को मुलाकात संभव न होने के कारणों से अवगत करा दिया है।
मुख्य न्यायाधीश ने सार्वजनिक तौर पर यह स्पष्ट किया कि न्यायपालिका की गरिमा और संवैधानिक प्रक्रिया सर्वोपरि है। उन्होंने कहा कि देश के हर नागरिक और जनप्रतिनिधि के लिए अदालत के दरवाजे हमेशा खुले हैं, लेकिन किसी भी मुद्दे पर विचार कानूनी रास्ते और याचिकाओं के जरिए ही किया जा सकता है।
'हर नागरिक को अदालत आने का संवैधानिक अधिकार'
विपक्षी सांसदों के प्रतिनिधिमंडल की मांग पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए मुख्य न्यायाधीश ने कहा, 'मुझे रविवार को मुलाकात के अनुरोध को लेकर एक पत्र प्राप्त हुआ था। मैंने उसी रात उस पत्र का औपचारिक जवाब दे दिया था और विस्तार से कारण स्पष्ट कर दिए थे कि मैं यह मुलाकात क्यों नहीं कर पाऊंगा।'
उन्होंने आगे कहा, 'सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे सभी के लिए खुले हैं। किसी भी आम नागरिक या चुने हुए सदन के सदस्य की याचिका का अदालत में पूरा स्वागत है। हर भारतीय नागरिक को अदालत का दरवाजा खटखटाने का अधिकार है। न्यायपालिका उनकी हर शिकायत और चिंता को सुनेगी और कानून के तहत जो भी न्यायसंगत होगा, वह कदम उठाया जाएगा।'
विपक्ष के विरोध प्रदर्शन और विचाराधीन मामलों की पृष्ठभूमि
सूत्रों के अनुसार, विपक्षी दल जिन मामलों और विषयों को लेकर सर्वोच्च अदालत का रुख करना चाहते थे, उनमें से कई मुद्दे पहले से ही अदालत के समक्ष विचाराधीन हैं। न्यायिक परंपराओं के अनुसार विचाराधीन मामलों पर न्यायाधीश व्यक्तिगत मंचों या मुलाकातों में चर्चा नहीं करते हैं। माना जा रहा है कि इसी संवैधानिक मर्यादा का पालन करते हुए यह निर्णय लिया गया।
उल्लेखनीय है कि विपक्षी गठबंधन ने अपनी मांगों को लेकर राष्ट्रीय राजधानी में मार्च निकालने का आह्वान किया था, जिसके चलते सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए थे। मुख्य न्यायाधीश के इस बयान के बाद स्पष्ट संदेश गया है कि किसी भी राजनीतिक विवाद या नीतिगत मुद्दे का समाधान अदालत के विधिसम्मत मंच और याचिकाओं के जरिए ही संभव है।
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