दिल्ली की सियासत इन दिनों गरमाई हुई है, जहां राजनीतिक दलों और विभिन्न संगठनों द्वारा प्रदर्शनों का दौर जारी है। किसी भी राजनीतिक दल, संगठन या नागरिक समूह को प्रदर्शन करने से पहले प्रशासनिक अनुमति लेनी होती है। हालांकि संविधान नागरिकों को शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखने का अधिकार देता है, लेकिन सार्वजनिक जगहों पर सभा या मार्च के लिए प्रशासन द्वारा तय किए गए नियमों का पालन करना कानूनी रूप से जरूरी होता है। सुप्रीम कोर्ट भी यह स्पष्ट कर चुका है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन का मौलिक अधिकार आम लोगों की आवाजाही, सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था के साथ संतुलित होना चाहिए।
पुलिस को पहले जानकारी और अनुमति क्यों है जरूरी?
आयोजकों को पुलिस को कार्यक्रम के बारे में पहले से लिखित जानकारी देनी होती है ताकि कानून-व्यवस्था, ट्रैफिक और सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए जा सकें। दिल्ली पुलिस के स्टैंडिंग ऑर्डर और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार, जंतर-मंतर या अन्य निर्धारित स्थलों पर प्रदर्शन के लिए कम से कम 10 दिन पहले डीसीपी के पास औपचारिक आवेदन देना होता है। इस आवेदन में प्रदर्शन का उद्देश्य, समय, आयोजकों के नाम और अनुमानित भीड़ का पूरा ब्योरा देना अनिवार्य है। केवल पत्र जमा कर देने भर से प्रदर्शन की मंजूरी नहीं मिल जाती, बल्कि खुफिया और स्थानीय एजेंसियां सुरक्षा जोखिमों का आकलन करने के बाद ही अनुमति पर अंतिम मुहर लगाती हैं।
भीड़ के हिसाब से तय हैं प्रदर्शन की तीन लोकेशन
राष्ट्रीय राजधानी में भीड़ की क्षमता के आधार पर प्रदर्शन स्थलों का स्पष्ट वर्गीकरण किया गया है। 1,000 तक की सीमित संख्या वाले प्रदर्शनों के लिए जंतर-मंतर को चिह्नित किया गया है। यदि किसी आंदोलन में 1,000 से 50,000 तक लोग शामिल होने वाले हों, तो उसके लिए सेंट्रल दिल्ली का रामलीला मैदान तय किया गया है। वहीं, 50,000 से अधिक की विशाल जनसभा या प्रदर्शन के लिए बाहरी दिल्ली स्थित बुराड़ी ग्राउंड को निर्धारित स्थल माना गया है। इसके अलावा, संसद और सेंट्रल विस्टा के आसपास के संवेदनशील इलाकों—जैसे इंडिया गेट, कर्तव्य पथ, मानसिंह रोड और जनपथ—पर हर तरह के धरना-प्रदर्शन और पैदल मार्च पर पूरी तरह प्रतिबंध है।
बिना परमिशन प्रदर्शन करने पर क्या हो सकता है एक्शन?
यदि कोई संगठन पूर्व सूचना और औपचारिक अनुमति के बिना प्रदर्शन करता है, तो पुलिस के पास उसे रोकने के पूरे कानूनी अधिकार होते हैं। ऐसे मामलों में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 लागू की जा सकती है। अनुमति के बिना जुटने वाली भीड़ को गैर-कानूनी घोषित कर प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया जा सकता है और आयोजकों पर सरकारी आदेशों के उल्लंघन का मामला दर्ज किया जा सकता है। राजधानी की संवेदनशीलता को देखते हुए यह प्रक्रिया शांति और सुरक्षा बनाए रखने के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है।
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