उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) जिस सामाजिक गठजोड़ के सहारे चुनाव दर चुनाव जीत हासिल करती रही है, उस पर अब सियासी संकट के बादल मंडराने लगे हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी (सपा) ने बीजेपी के इसी समीकरण में सेंध लगाकर चुनावी गणित बदल दिया था। अब सपा इसी रणनीति के दम पर आगामी विधानसभा चुनावों को साधने में जुटी है, जिसके जवाब में बीजेपी अपने गैर-यादव ओबीसी और गैर-जाटव दलित समीकरण को दुरुस्त करने की कोशिश कर रही है।
धर्मेंद्र कश्यप के बगावती तेवर और सपा में जाने की अटकलें
राज्यसभा चुनाव के लिए उम्मीदवारों की घोषणा के बाद से ही पार्टी के भीतर सुलग रहा असंतोष अब खुलकर सामने आ गया है। रुहेलखंड क्षेत्र में ओबीसी वर्ग के बड़े चेहरे और आंवला सीट से दो बार सांसद रहे धर्मेंद्र कश्यप के पार्टी छोड़ने के कयास तेज हो गए हैं। हाल ही में उन्होंने सोशल मीडिया पर 'टाटा बाय-बाय' लिखकर और अपने बायो से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीर हटाकर सियासी गलियारों में हलचल मचा दी है।
सूत्रों के अनुसार, धर्मेंद्र कश्यप का समाजवादी पार्टी का दामन थामना लगभग तय माना जा रहा है। चुनाव में हार के बाद से खुद की अनदेखी से नाराज कश्यप पहले भी सपा में रह चुके हैं, ऐसे में इसे उनकी घर वापसी के रूप में देखा जा रहा है। उनके इस कदम से रुहेलखंड से लेकर अवध और पूर्वांचल तक फैले कश्यप, निषाद और मल्लाह वोटबैंक पर सीधा असर पड़ सकता है।
कौशल किशोर की नाराजगी से पासी समाज में हलचल
ओबीसी के बाद अब दलित राजनीति के मोर्चे पर भी बीजेपी की मुश्किलें बढ़ती दिख रही हैं। अवध क्षेत्र के प्रमुख दलित नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री कौशल किशोर के परिवार ने टिकट बंटवारे पर खुलकर असंतोष जताया है। उनके बेटे और भाजपा अनुसूचित मोर्चा के प्रदेश उपाध्यक्ष ने सोशल मीडिया के जरिए अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए तीखी प्रतिक्रिया दी है।
उत्तर प्रदेश में जाटव समुदाय के बाद पासी समाज दलित आबादी का दूसरा सबसे बड़ा (लगभग 16%) हिस्सा है। अवध और बुंदेलखंड क्षेत्रों में इस वोटबैंक की मजबूत पकड़ है। कौशल किशोर के परिवार की यह नाराजगी बीजेपी के लिए चिंता का विषय बन गई है, क्योंकि विपक्ष इस समीकरण को अपने पाले में करने के लिए पूरी ताकत झोंक रहा है।
बीजेपी की सोशल इंजीनियरिंग के सामने बड़ी चुनौती
आगामी चुनावों से ठीक पहले स्थापित नेताओं की यह बगावत बीजेपी की कोर रणनीति को झटका दे सकती है। अति-पिछड़े और दलित समाज के बीच यह संदेश जाना कि पार्टी केवल चुनाव के वक्त उनका उपयोग करती है, चुनावी नुकसान का कारण बन सकता है। यदि पार्टी नेतृत्व ने समय रहते इन क्षत्रपों की नाराजगी को दूर नहीं किया, तो यह अंदरूनी कलह पार्टी के लिए भारी पड़ सकती है।
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