भारत की विविधता और उसकी साझी संस्कृति समय-समय पर ऐसी मिसालें पेश करती हैं, जो देश के ताने-बाने को मजबूत करती हैं। संगम नगरी की ऐतिहासिक रामलीलाओं की तैयारियां जब उरूज पर होती हैं, तब मंच को भव्य बनाने के पीछे कई ऐसे कलाकारों की मेहनत छिपी होती है जो मजहब की सीमाओं से परे जाकर कला को ही अपनी इबादत मानते हैं। ऐसी ही एक अनूठी कहानी मुस्लिम कारीगर निसार अहमद की है, जो अपनी कला के जरिए समाज में प्रेम और सौहार्द का संदेश दे रहे हैं।
मोहर्रम की अकीदत से लेकर रामलीला की सेवा तक
दशहरे और नवरात्रि के करीब आते ही ऐतिहासिक श्री पथरचट्टी रामलीला कमेटी के मंचन के लिए तैयारियां तेज हो जाती हैं। इस भव्य मंचन में इस्तेमाल होने वाले पारंपरिक अस्त्र-शस्त्र जैसे धनुष-बाण, गदा, तलवार, त्रिशूल और रथों को आकर्षक रूप देने का जिम्मा निसार अहमद संभालते हैं। हैरान करने वाली बात यह है कि निसार ऐसे परिवार से ताल्लुक रखते हैं जिसकी पहचान मोहर्रम के दौरान खूबसूरत ताजिए तैयार करने के लिए भी है।
जब मुहर्रम के महीने में यह परिवार अकीदत के साथ ताजिए बनाता है, तो वही हाथ दशहरे के दिनों में पूरी श्रद्धा के साथ भगवान राम की लीला के लिए रथ और अस्त्र-शस्त्र सजाने में जुट जाते हैं। निसार बताते हैं कि उनके दादा और पिता भी इसी रामलीला से जुड़े रहे हैं, और यह हुनर उन्हें विरासत में मिला है जिसे वह अपनी तीसरी पीढ़ी के रूप में आगे बढ़ा रहे हैं।
पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा और आपसी सौहार्द
निसार अहमद का मानना है कि कला का कोई मजहब नहीं होता। उन्हें रामलीला के लिए काम करने में अपार शांति और खुशी मिलती है। उनके मुताबिक, परिवार, रिश्तेदारों और मोहल्ले के लोगों ने कभी इस काम को लेकर कोई आपत्ति नहीं जताई, बल्कि हमेशा उनके इस काम को सराहा है। रामानंद सागर की 'रामायण' देखने वाले निसार भगवान राम के किरदार से बेहद प्रभावित हैं और इस सेवा को वह अपनी जिंदगी का अहम हिस्सा मानते हैं।
गंगा-जमुनी तहजीब की जिंदा मिसाल
आज के दौर में जब हर तरफ दूरियां बढ़ाने की कोशिशें होती हैं, तब निसार अहमद जैसी शख्सियतें साबित करती हैं कि इंसानियत और कला मजहब की दीवारों से बहुत ऊपर हैं। मोहर्रम के ताजियों से लेकर रामलीला के रथों तक का यह सफर इस बात का गवाह है कि भारत की असल ताकत उसकी साझा विरासत और आपसी भाईचारे में ही बसती है।
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